कश्मीर में इस साल कैसी रहेगी सर्दी? दिसंबर-जनवरी में कम बर्फबारी और ज्यादा तापमान का अलर्ट, मौसम विभाग ने चेताया
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, इस वर्ष कश्मीर घाटी में सर्दियां सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क रह सकती हैं, जिससे ...और पढ़ें

कश्मीर में इस बार सर्दियां रहेंगी फीकी। (फाइल फोटो)
HighLights
एल नीनो से कश्मीर में सर्दियां गर्म और शुष्क रहेंगी।
दिसंबर से फरवरी तक बर्फबारी व बारिश में कमी आएगी।
पानी, कृषि, पर्यटन पर पड़ेगा गंभीर नकारात्मक असर।
जागरण संवाददाता, श्रीनगर। उच्च पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी और निचले इलाकों में हुई ताजा बारिश के बाद घाटी के तापमान में आई गिरावट से ठंड भले ही लोगों को अपना अहसास करा रही है और घाटी के अधिकांश क्षेत्रों में सुबह और शाम ठंडी हो गई। मौसम विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले दिनों में न केवल मौसम आमतौर पर शुष्क रह सकता है, बल्कि सर्दियों के पीक महीनों में तापमान सामान्य से ऊपर रह सकता है और बारिश कम हो सकती है।
मौसम विशेषज्ञों ने इस संभावना को कुछ हद तक एल नीनो के असर के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है। मौसम विभाग श्रीनगर के निदेशक डा. मुख्तार अहमद ने कहा कि वर्ल्ड मौसम संगठन से मिले संकेतों से पता चलता है कि 2026 का आखिरी हिस्सा और 2027 की शुरुआत, विशेषकर सर्दियों का पीक टाइम दिसंबर,जंवरी व फरवरी एल नीनो के असर से ज़्यादा गर्म और सूखा रह सकता है।
एक या दो बार अच्छी खासी बर्फबारी
अहमद ने कहा, 'सर्दियां ज़रूर आएंगी। कभी सर्दियां बहुत ज़्यादा होती हैं और कभी हल्की। पिछले कुछ सालों से हम जो देख रहे हैं यानी सर्दियों के मौसम में कम बर्फबारी व बारिश होना, एेसा ही इस बार भी हो सकता है। लेकिन इस बार एल नीनो के प्रभाव के चलते सर्दियों के पीक महीनों दिसंबर,जनवरी व फरवरी में तापमान सामान्य से ऊपर बना रह सकता है जबकि बारिश व बर्फबारी में और अधिक कमी रह सकती हैं।
हालांकि, उन्होंने कहा कि अगर इलाके में काफ़ी नमी रहती है या यह किसी मज़बूत वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से प्रभावित होता है, तो सर्दियों के पीक महीनों में एक या दो बार अच्छी-खासी बर्फबारी हो सकती है।
घाटी में सर्दियों के पैटर्न में बदलाव
यह चेतावनी घाटी में सर्दियों में बारिश के पैटर्न में लंबे समय से हो रहे बदलाव के संदर्भ में आई है। दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 तक का मुख्य सर्दियों का टाइम लगभग 65 प्रतिशत कम बारिश के साथ खत्म हुआ, जिसमें सामान्य 284.9 मिलीमीटर के मुकाबले 100.6 मिलीमीटर बारिश रिकार्ड की गई।
पिछली सर्दियों में सूखापन खास तौर पर जनवरी में ज़्यादा था, जब चिल्लई कलां के ज़्यादातर समय घाटी में ज़्यादातर बर्फ़ नहीं थी। महीने के पहले आधे हिस्से में कई ज़िलों में बारिश में भारी कमी दर्ज की गई।
अहमद ने कहा कि घाटी में हाल के बसरों में भी ऐसा ही पैटर्न देखा गया है, जिसमें लंबे समय तक सूखा रहता था और बीच-बीच में कभी-कभी बर्फबारी होती थी, जो आमतौर पर उम्मीद से कम होती थी।
उन्होंने कहा कि इस समय लगातार लेकिन कमज़ोर पश्चमी विक्षोभ इस इलाके पर असर डाल रहे हैं, लेकिन इससे मौसम में कोई खास हलचल नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि सर्दियों की शुरुआत या पीक के दौरान एक मज़बूत पश्चमी विक्षोभ, मौसम की तस्वीर को काफी बदल सकता है।
घाटी के कितने समय तक रहती है बर्फ़?
हालांकि, घाटी के लिए, मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं है कि घाटी में बर्फ़ गिरती है या नहीं, बल्कि यह भी है कि वह बर्फ़ कब गिरती है और कितने समय तक रहती है।
अहमद के अनुसार, सर्दियों के पीक महीनों में समय पर बर्फबारी ज़रूरी है क्योंकि कम तापमान बर्फ़ को ज़्यादा देर तक ज़मीन पर रहने देता है और ग्लेशियर रिचार्ज में मदद करता है। फरवरी या मार्च के आखिर में बर्फबारी से पानी के भंडार भी बढ़ सकते हैं, लेकिन गर्म मौसम के कारण यह तेज़ी से पिघल सकता है।
बढ़ते तापमान के कारण, बर्फ़ जल्दी पिघलती
उन्हों ने कहा, बढ़ते तापमान के कारण, बर्फ़ जल्दी पिघलती है। इसलिए हिमालयी इलाके के लिए समय पर बर्फबारी बहुत ज़रूरी है। उन्होंने कहा, इसका असर पर्यटन और सर्दियों में यहां रहने वाले जाने-पहचाने नज़ारों से कहीं ज़्यादा है।
पतली और कम समय तक रहने वाली बर्फ़ वसंत और गर्मियों में पानी की उपलब्धता, खेती, बागवानी, हाइड्रोपावर और धीरे-धीरे बर्फ़ पिघलने पर निर्भर इकोसिस्टम पर असर डाल सकती है।
बता देते हैं कि हाइड्रोलाजिस्ट और क्लाइमेट रिसर्चर पहले भी चेतावनी दे चुके हैं कि गर्म मौसम बर्फ़ और ग्लेशियर के पिघलने को तेज़ कर सकता है, जिससे मौसम की शुरुआत में ज़्यादा पानी मिल सकता है, लेकिन गर्मियों में बाद में लगातार बहाव कम हो सकता है।
किसानों के लिए फ़ायदे और जोखिम दोनों
इधर किसानों के लिए, हल्की सर्दी फ़ायदे और जोखिम दोनों ला सकती है। कम ठंड से कुछ खेती के काम ज़्यादा समय तक चल सकते हैं, लेकिन सर्दियों में कम ठंड और समय से पहले गर्मी से फलों के पेड़ों की कुदरती सुस्ती और फूल आने के चक्र में रुकावट आ सकती है। जल्दी फूल आने से फ़सलें बाद की ठंड के मौसम में ज़्यादा खुली रह सकती हैं।
इसलिए, बागवानी अधिकारी सर्दियों के आने पर तापमान में उतार-चढ़ाव पर कड़ी नज़र रख सकते हैं, खासकर सेब उगाने वाले इलाकों में जहाँ फूल आने और फल लगने का सर्दियों के मौसम से गहरा संबंध होता है।
बदलते सर्दियों के पैटर्न को क्लाइमेट चेंज के बड़े संदर्भ में भी देखा जा रहा है। निदेशक मुख्तार अहमद ने हिमालयी क्षेत्र में बदलते बर्फ़बारी के पैटर्न को बढ़ते तापमान से जोड़ते हुए कहा कि गर्म मौसम बारिश के समय और तरीके दोनों को बदल रहा है। उन्होंने कहा कि घाटी में पिछले चार-पांच सालों से सर्दियों के पीक टाइम में लगातार बर्फबारी नहीं हुई है, जिससे बर्फ़बारी का समय कम हो गया है और सूखा ज़्यादा लंबा हो गया है।
संबंधित विभाग के अनुसार, जम्मू कश्मीर में अभी बारिश की स्थिति कुल मिलाकर सामान्य के करीब है, भले ही महीने-दर-महीने इसमें काफ़ी अंतर हो। जुलाई में लगभग 35 प्रतिशत ज़्यादा बारिश हुई, जबकि अगस्त में लगभग 25 प्रतिशत कम बारिश हुई।
