'जनादेश को यूं रौंदने नहीं देंगे', सज्जाद लोन ने विधायकों के अधिकारों पर बरसे; विधानसभा में उठाया गंभीर मुद्दा
सज्जाद लोन ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों और विकास कार्यों में उनकी उपेक्षा को लेकर प्रदेश सरकार की कड़ी आलोचना की।
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सज्जाद लोन ने विधायकों के अधिकारों पर बरसे। फोटो सोशल मीडिया
HighLights
सज्जाद लोन ने विधायकों के अधिकारों की उपेक्षा पर सरकार को लताड़ा।
विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों की सिफारिशें दरकिनार करने का मुद्दा उठाया।
जनादेश को रौंदने पर सड़क पर उतरने की चेतावनी दी।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में गुरुवार को निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकारों और विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों में उनकी कथित उपेक्षा को लेकर पीपुल्स कान्फ्रेंस के चेयरमैन ने प्रदेश सरकार को जमकर लताड़ा।
उन्होंने कहा कि हम इस सदन और निर्वाचित सरकार की प्रतिष्ठा को नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहते, अन्यथा हम भी लोकभवन और केंद्र सरकार को पत्र लिखकर पूछ सकते हैं कि क्या जम्मू कश्ीमर में विकास कार्याें के लिए भेजी जा रही धनराशि किसी दल विशेष के नेताओं -प्रतिनिधियों या क्षेत्रों तक ही सीमित है।
जम्मू कश्मीर विधानसभा में हंदवाड़ा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे पूर्व मंत्री सज्जाद गनी लोन ने शून्यकाल के दौरान विधायकों की सिफारिशों को कथित तौर पर दरकिनार किए जाने का मुद्दा उठाते हुए सरकार और सदन के सामने कई गंभीर सवाल रखे।
क्या विधायकों के पास कोई अधिकार है?
उन्होंने कहा कि मैं भी कभी मंत्री था,लेकिन कोई विधायक जो आज सत्ता में हैं, नहीं कह सकते कि मैंने उनके द्वारा उनके निर्वाचन क्षेत्र से संबधित सिफारिशों को नजर अंदाज किया हो। मैने हमेशा उनके जन प्रतिनिधि होने का स म्मान किया, लेकिन यहां तो बात ही कुछ और हो चुकी है।
लोन ने सदन में सीधे सवाल किया कि क्या विधायकों के पास कोई अधिकार हैं और क्या उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्रों में विकास कार्यों के चयन का अधिकार प्राप्त है? उन्होंने कहा कि हंदवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में सड़कों से संबंधित कार्यों की सूची उनके द्वारा दी गई थी, लेकिन उनकी सिफारिशों को कथित तौर पर ओवररूल कर अलग फैसले किए गए।
लोन ने बिना किसी मंत्री का नाम लिए आरोप लगाया कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की सिफारिशों के ऊपर मंत्रियों के फैसलों को प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने साफ संकेत दिया कि अपने विधानसभा क्षेत्र से जुड़े मामलों में वह इस तरह के फैसलों को स्वीकार नहीं करेंगे।
सदन के पास क्या प्रभावी उपाय बचेगा?
विधानसभा में लोन के तेवर उस समय और तीखे हो गए जब उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों को कथित तौर पर “कमतर आंकने और अपमानित करने” का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि यदि जनता के जनादेश से चुने गए सदस्यों की बात लगातार अनसुनी की जाती रही तो ऐसी स्थिति में सदन के पास क्या प्रभावी उपाय बचेगा।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हंदवाड़ा से जुड़े मामलों में इस तरह मनमाने फैसले स्वीकार नहीं किए जाएंगे। लोन ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को लगातार नजरअंदाज करना न सिर्फ उनकी भूमिका को कमजोर करना है, बल्कि उनके पीछे खड़े मतदाताओं के जनादेश को भी चुनौती देना है।हम किसी को जनादेश रौदने नहीं देंगे।
लोन ने विशेषाधिकार हनन की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों के पास केंद्र सरकार अथवा उपराज्यपाल से संपर्क करने का विकल्प हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरना भी एक विकल्प हो सकता है।
निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका से जुड़ा व्यापक मुद्दा
उन्होंने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की गरिमा और उनकी वैधता विधानसभा से आती है। ऐसे में सदन के सदस्यों के अधिकारों और विशेषाधिकारों की अनदेखी का सवाल केवल किसी एक विधायक या एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।
लोन के आरोपों को भाजपा विधायक बलवंत सिंह मनकोटिया का भी समर्थन मिला। मनकोटिया ने सदन में कहा कि “यह हर जगह हो रहा है।”
मामले पर विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने लोन से कहा कि यदि उन्हें लगता है कि उनके विशेषाधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत विशेषाधिकार हनन का नोटिस पेश कर सकते हैं। अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि नोटिस मिलने के बाद मामले में नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
