कश्मीर की हरियाली पर मंडराया खतरा, झेलम के किनारे पांच साल में कटे 5.84 लाख पेड़
कश्मीर की हरियाली पर बड़ा संकट मंडरा रहा है, पिछले पांच वर्षों में झेलम नदी और उसकी सहायक धाराओं के किनारे 5.84 लाख से अधिक पेड़ काटे गए हैं।
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पांच साल में झेलम किनारे कटे 5.84 लाख पेड़। फाइल फोटो
HighLights
झेलम किनारे पांच साल में 5.84 लाख पेड़ कटे
154 परियोजनाओं के लिए 82 हजार से अधिक पेड़ काटे गए
करोड़ों पौधे लगे, पर हरियाली पर संकट बरकरार है
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कश्मीर की पहचान उसकी हरी-भरी वादियों, ऊंचे पेड़ों और खूबसूरत नदियों-दरियाओं से है, लेकिन अब इसी हरियाली पर संकट गहराता नजर आ रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में झेलम और उससे जुड़ी जलधाराओं के किनारे 5.84 लाख से अधिक पेड़ काट दिए गए। वहीं, घाटी में 7.47 करोड़ पौधे लगाने का दावा भी है।
सवाल यह है कि जब करोड़ों पौधे लगाए गए, तो घाटी की हरियाली को हुए नुकसान की भरपाई आखिर कितनी हुई? उपलब्ध आंकड़े इस सवाल का पूरा जवाब नहीं देते।
काटे गए 5 लाख से अधिक पेड़
सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग के आरटीआई जवाब के अनुसार, झेलम और उससे जुड़ी जलधाराओं के किनारे 632924 पेड़ों को अतिक्रमण के रूप में चिह्नित किया गया था।
इनमें से 5,84,153 पेड़ काट दिए गए। सबसे अधिक 479074 पेड़ पांजिनारा से बनियारी के बीच चिह्नित किए गए, जबकि संपोरा के निचले हिस्से में संगम गेज हट के पास करीब 90 हजार पेड़ों की पहचान हुई।
पेड़ों की इतनी बड़ी कटाई से मिट्टी के संरक्षण, जैव विविधता और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर कितना असर पड़ा, इसका समग्र आकलन अभी स्पष्ट नहीं है।
154 परियोजनाओं के लिए 82 हजार पेड़ काटे
जम्मू-कश्मीर सरकार की राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल अनुपालन रिपोर्ट के अनुसार, 154 बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए 82511 पेड़ काटे गए।
रिपोर्ट में करीब 49.07 करोड़ रुपये की देनदारी बकाया बताई गई है। इससे पर्यावरणीय नियमों के पालन और क्षतिपूरक भुगतान की निगरानी पर सवाल उठते हैं।
रूसी पॉपलर के 14255 पेड़ भी काटे गए
विधानसभा में पेश सरकारी आंकड़ों के अनुसार, तीन वर्षों में कश्मीर के सात जिलों में 14,255 रूसी पॉपलर पेड़ काटे गए। इनमें बारामूला में सबसे अधिक 9,954 पेड़ शामिल हैं। पुलवामा में 1,648, अनंतनाग में 792, बडगाम में 754, श्रीनगर में 637, गांदरबल में 235 और कुलगाम में भी 235 पेड़ काटे गए।
महिला पॉपलर के रेशों को लेकर यह कार्रवाई हुई। हालांकि, सरकार की समिति को पॉपलर पराग और एलर्जी या अस्थमा के बीच कोई स्थापित वैज्ञानिक संबंध नहीं मिला।
समिति ने फिर भी रेशों से धूल और अन्य कण फैलने की आशंका जताते हुए चरणबद्ध कटाई और रुई-रहित किस्मों को बढ़ावा देने की सिफारिश की।
7.47 करोड़ पौधे लगे, लेकिन कितने बचे?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2010 से अब तक सीएएमपीए के तहत 7.47 करोड़ पौधे लगाए गए और 1.06 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में वनीकरण कार्य हुआ।
इसके बावजूद पौधों के जीवित रहने की दर करीब 50 से 60 प्रतिशत बताई गई है। मार्च 2024 तक जम्मू-कश्मीर सीएएमपीए के पास 851.65 करोड़ रुपये उपलब्ध थे, जिनमें से 727.66 करोड़ रुपये खर्च नहीं हुए थे।
अवैध कटाई, जमीन पर अतिक्रमण, अनधिकृत निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव भी हरियाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि, इन सभी कारणों से हुए कुल नुकसान का एकीकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
पौधे लगाना ही नहीं, उन्हें बचाना भी जरूरी
कश्मीर के स्वयंसेवी मुस्तफा नजीर ने कहा कि हरियाली बचाने की असली कसौटी केवल कटे पेड़ों और लगाए गए पौधों की संख्या नहीं है। एक पुराना पेड़ मिट्टी को थामने, जीव-जंतुओं को आश्रय देने और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसलिए जरूरी है कि लगाए गए पौधों के जीवित रहने, पुराने पेड़ों के नुकसान की भरपाई और प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण सुधार का नियमित हिसाब सार्वजनिक किया जाए। तभी पता चलेगा कि कश्मीर की खोती हरियाली वास्तव में लौट रही है या नहीं।
