श्रीनगर, नवीन नवाज। Jammu And Kashmir: जम्मू-कश्मीर में जेहाद की आड़ में आतंक की खेती करने वाला पाकिस्‍तान भले ही लाख प्रलाप करे लेकिन इरफान रमजान, राकेश और विक्रमजीत सिंह का शौर्य उसे आईना दिखा देता है। यह कोई फौजी या सुरक्षाकर्मी नहीं हैं, यह आम नागरिक हैं, जिन्होंने मौका आने पर न केवल आतंक से लोहा लिया और उन्‍हें सबक सिखाया कि उनके लिए अपनी जान से ज्यादा राष्ट्रीय एकता, जम्मू-कश्मीर में शांति और आम लोगों की जिंदगी अधिक अहम है। इनकी इसी भावना ने इन्हें राष्ट्रपति ने शौर्य चक्र से नवाजा। इरफान रमजान शेख को जब शौर्य चक्र मिला था तो वह उस समय नाबालिग था। महज 14 साल की उम्र में वह निहत्था ही छह हथियारबंद आतंकियों से भिड़ गया था।

आतंकियों का गढ़ कहलाने वाले शोपियां के हामनू इलाके में रहने वाले इरफान रमजान शेख के पिता मोहम्मद रमजान शेख पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के क्षेत्रीय प्रधान और गांव के पूर्व सरपंच थे। वह वर्ष 2013 में भी आतंकी हमले में बाल-बाल बचे थे। तीन साल पहले 16 अक्टूबर, 2017 की रात पूरा परिवार एक कमरे में बैठकर टीवी देख रहा था। अचानक एक फोन आया। फोन करने वाले ने कहा कि दरवाजा खोलो, मेहमान आए हैं। मोहम्मद रमजान शेख समझ गए कि कुछ बुरा होने वाला है। उन्होंने जैसे ही दरवाजा खोला, इस्लाम के नाम पर खून बहाने वाले छह आतंकियों में से तीन भीतर घुस आए। आतंकियों ने रमजान शेख को अगवा करने का प्रयास किया। विरोध करने पर उसे गोली मार दी।

अपने पिता को जमीन पर गिरते देख 14 वर्षीय इरफान का खून खौल उठा और वह आतंकियों से भिड़ गया। एक आतंकी की राइफल को छीनकर उसने गोली चलाई। इसमें एक आतंकी मारा गया। इसके बाद अन्य आतंकी दुम दबाकर भाग निकले। उसके पिता इस हमले में मारे गए, लेकिन परिवार के अन्य सदस्य बच गए। इरफान को बीते साल राष्ट्रपति ने शौर्य चक्र से सम्मानित किया। सिर्फ शोपियां में ही नहीं, पूरे कश्मीर में आज भी इरफान के चर्चे होते हैं और उसके बाद से कभी उसके गांव या उसके गांव के आसपास आतंकी नहीं घुसे।

राकेश और विक्रमजीत की बहादुरी है केस स्टडी 

आतंकियों के बीच फंसने और फिर उन्हें मजा चखाने के लिए आम नागरिकों को तैयार करने में अकसर राकेश और विक्रमजीत सिंह के शौर्य को केस स्टडी के तौर पर पेश किया जाता है। यह दोनों बहनोई-साला हैं। पांच साल पहले श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर बीएसएफ के काफिले पर लश्कर-ए-तैयबा के आत्मघाती हमले के दौरान वह चर्चा में आए थे। ऊधमपुर से कुछ दूर हाईवे पर स्थित नरसू, समरोली में पांच अगस्त, 2015 की सुबह लश्कर के आतंकियों ने बीएसएफ के काफिले पर हमला किया। बीएसएफ कर्मियाें की जवाबी कार्रवाई में एक आत्मघाती हमलावर मारा गया, जबकि दूसरा आतंकी नवीद मैदान छोड़ भागा। वह हाईवे के साथ सटे जंगल से होता हुआ चिरडी गांव की तरफ गया, जहां उसने राकेश व विक्रमजीत सिंह को हथियार के बल पर बंधक बनाया। वह दोनों को बंधक बनाकर वहां से निकलना चाहता था।

पहले यकीन दिलाया और फिर दबोच लिया

राकेश व विक्रमजीत सिंह ने उसकी हर बात मानी और उसे यह यकीन दिलाने में सफल रहे कि वह उसे सही जगह ले जा रहे हैं। रास्ते में उन्होंने मौका पाकर पाकिस्तानी आतंकी नवीद से उसका हथियार छीन लिया और उसे पकड़ लिया। इसके बाद उन्होंने उसे रस्सी से बांधकर जिंदा ही पुलिस के हवाले कर दिया। उनकी बहादुरी और सूझबूझ के चलते न सिर्फ चिरडी के कई ग्रामीणों की जान बची, बल्कि पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर नंगा करने के लिए एक और जिंदा सुबूत भारत के हाथ लगा। नवीद आज भी जम्‍मू की सेंट्रल जेल में बंद है। राकेश और विक्रमजीत दोनों को आठ मई 2016 को तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. प्रणब मुखर्जी ने शौर्य चक्र प्रदान किया था।

एक नहीं, बल्कि सैकड़ों इरफान, राकेश व विक्रमजीत हैं कश्मीर में

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ अहमद अली कहते हैं कि कश्मीर में एक नहीं, बल्कि सैकड़ों इरफान, राकेश और विक्रमजीत सिंह हैं। आप पुलिस रिकार्ड देखें तो पता चलेगा। हां, यह सही बात है कि सबको शौर्य चक्र नहीं मिलता, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सिर्फ इन्होंने ही जिहादियों को सबक सिखाया है। यहां पाकिस्तान के भेजे जिहादियों से लडऩे वाले, पत्थरबाजों से निपटने वाले कई हैं और कई ने बलिदान दिया है। 

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