कश्मीर की साझा संस्कृति को सहेजेगा हब्बा खातून इंस्टीट्यूट, एक छत के नीचे दिखेगा इतिहास; सभी धर्मों का योगदान होगा दर्ज
श्रीनगर में हब्बा खातून मेमोरियल-कम-रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थापित करने का प्रस्ताव है, जिसका उद्देश्य कश्मीर की सदियों पुरानी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना है।

कश्मीर की साझा संस्कृति को सहेजेगा हब्बा खातून इंस्टीट्यूट। फोटो सोशल मीडिया
HighLights
हब्बा खातून मेमोरियल-कम-रिसर्च इंस्टीट्यूट श्रीनगर में स्थापित होगा।
कश्मीर की साहित्यिक, सांस्कृतिक विरासत और इतिहास का संरक्षण।
जस्टिस मार्कंडेय काटजू के संरक्षण में यह पहल होगी।
नवीन नवाज, श्रीनगर। कश्मीर की सदियों पुरानी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेजों, स्मृतियों और आधुनिक शोध से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। हब्बा खातून एसोसिएशन ने श्रीनगर में ‘हब्बा खातून मेमोरियल-कम-रिसर्च इंस्टीट्यूट’ स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है।
प्रस्तावित संस्थान 16वीं सदी की प्रसिद्ध कश्मीरी कवयित्री हब्बा खातून की साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ कश्मीर के इतिहास, भाषा, साहित्य और साझा सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन का स्थायी केंद्र बनने की परिकल्पना पर आधारित है।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू के संरक्षण में प्रस्तावित इस संस्थान में स्मारक के साथ शोध केंद्र, विशेष पुस्तकालय, अभिलेखागार और संग्रहालय विकसित करने की योजना है। यहां हब्बा खातून से जुड़े दस्तावेजों के अलावा कश्मीर के साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विकास से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री को एकत्र कर संरक्षित किया जाएगा।
मुस्लिम-हिंदू के योगदान को समान रूप से रेखांकित किया जाएगा
एसोसिएशन के अनुसार, संस्थान में दुर्लभ पांडुलिपियां, पुस्तकें, अनुवाद, पुराने चित्र, आडियो रिकार्डिंग और मौखिक इतिहास को संकलित किया जाएगा। इसके साथ हब्बा खातून और कश्मीर के अन्य महत्वपूर्ण साहित्यकारों एवं ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर व्यवस्थित शोध को प्रोत्साहित किया जाएगा।
प्रस्तावित संग्रहालय की अवधारणा भी व्यापक रखी गई है। इसमें विभिन्न कालखंडों और समुदायों से जुड़े उन प्रमुख कश्मीरियों को स्थान देने की योजना है, जिन्होंने क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया। एसोसिएशन का कहना है कि कश्मीर के इतिहास में मुस्लिम, हिंदू, सिख और अन्य समुदायों के योगदान को समान रूप से रेखांकित किया जाएगा।
योजना के तहत डिजिटल आर्काइव तैयार करने, कश्मीरी साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद एवं प्रकाशन कराने और शोध परियोजनाओं, व्याख्यान, सम्मेलनों, प्रदर्शनियों, मुशायरों तथा संगीत कार्यक्रमों के आयोजन का भी प्रस्ताव है।
हब्बा खातून के जीवन पर शोध होगा विशेष केंद्र बिंदु
एसोसिएशन ने हब्बा खातून के जीवन और उनके समय पर व्यवस्थित एवं प्रमाण आधारित शोध को परियोजना का प्रमुख उद्देश्य बताया है। संगठन के अनुसार, हब्बा खातून का साहित्यिक योगदान व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, लेकिन उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंग मौखिक परंपराओं और लोककथाओं के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुंचे हैं। प्रस्तावित संस्थान में पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रकाशित शोध सामग्री को एक मंच पर लाकर इस विषय में नए अकादमिक अध्ययन का आधार तैयार किया जाएगा।
यह पहल कश्मीर के बाहर बसे कश्मीरी समुदाय, विशेषकर नई पीढ़ी, को अपनी भाषा, साहित्य और इतिहास से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की परिकल्पना करती है।
एसोसिएशन ने इतिहासकारों, शोधकर्ताओं, लेखकों, कवियों, कलाकारों, संगीतकारों, अभिलेख विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, छात्रों और कश्मीरी प्रवासियों से इस पहल से जुड़ने का आह्वान किया है। विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, संग्रहालयों और सांस्कृतिक संस्थानों के साथ सहयोग की भी योजना है।
जिन परिवारों या व्यक्तियों के पास हब्बा खातून अथवा कश्मीर के सांस्कृतिक इतिहास से संबंधित दुर्लभ पांडुलिपियां, पुरानी पुस्तकें, तस्वीरें, पत्र, रिकॉर्डिंग या अन्य ऐतिहासिक सामग्री मौजूद है, उनसे भी इन्हें साझा करने की अपील की गई है।
एसोसिएशन के संरक्षक जस्टिस मार्कंडेय काटजू
एसोसिएशन के संरक्षक जस्टिस मार्कंडेय काटजू हैं, जबकि कश्मीरी-अमेरिकी साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और हार्वर्ड के पूर्व छात्र तसव्वर जलाली इसके अध्यक्ष हैं। राज्यसभा सदस्य एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा, वैज्ञानिक डा आमिर राशिद खान, नई दिल्ली स्थित ईरानी कल्चरल हाउस के डा हैदर जाबेत और पंजाब के एक सिख कारोबारी, जिन्होंने अपने शुरुआती वर्ष कश्मीर में बिताए हैं, उपाध्यक्षों में शामिल हैं। श्रीनगर के इमामिया हाई स्कूल की प्रिंसिपल सदफ मीर को महासचिव बनाया गया है।
एसोसिएशन के मुताबिक संस्थान की स्थापना, संग्रह निर्माण, शोध गतिविधियों और दीर्घकालीन संचालन के लिए वित्तीय एवं संस्थागत सहयोग की आवश्यकता होगी। संगठन को सोसायटी या ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत करने की योजना है और पारदर्शी लेखा व्यवस्था तथा संस्थागत संचालन का आश्वासन दिया गया है।
आयोजकों के अनुसार यह पहल गैर-राजनीतिक, गैर-सांप्रदायिक और विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक स्वरूप की होगी। इसका लक्ष्य कश्मीर की साहित्यिक और बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखना, उसका वैज्ञानिक अध्ययन करना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।
