श्रीनगर, राज्य ब्यूरो।  गुलाम कश्मीर से आई दुल्हन पहले तो सरपंच बनी। अब ब्लॉक विकास परिषद (बीडीसी) के चेयरमैन का चुनाव लड़ रही है। वह कहती है कि जब मैं मायके में थी तो सुनती थी कि कश्मीर में लोग हिंदुस्तान के खिलाफ हैं। कश्मीर में जम्हूरियत नहीं है। यहां आकर पता चला कि जिसे आजाद कश्मीर कहते हैं, वहां तो सही मायनों में गुलामी है। अगर जम्हूरियत और आजादी है तो वह हिंदुस्तान में है।

उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे जिला बारामुला के अंतर्गत उड़ी ब्लॉक के कुंडीबरजाला पंचायत के अंतर्गत परनपीला गांव में गुलाम कश्मीर से दुल्हन बनकर आई आसिफा तबस्सुम मीर ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह कभी कश्मीर में सरपंच बनेगी, लेकिन अब वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बीडीसी के चेयरमैन का भी चुनाव लड़ रही है।

गौरतलब है कि राज्य में बीडीसी के चेयरमैन का चुनाव 24 अक्टूबर को होने जा रहा है। आसिफा की उम्मीदवारी इसलिए भी हैरान करती है, क्योंकि उसका मायका गुलाम कश्मीर में है, जहां जिहादियों के ट्रेनिंग कैंप है। उसका पति मंजूर अहमद 1990 के दशक में कई बार गुलाम कश्मीर गया था। मुजफ्फराबाद के पास स्थित चिनारी गांव में ही दोनों के बीच मुलाकात हुई और उन्होंने शादी कर ली, लेकिन मंजूर ने बंदूक नहीं उठाई थी।

मंजूर ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग से संपर्क किया और वर्ष 2005 में अपनी पत्नी को लेकर परनपीला गांव में अपने घर पहुंच गया। मंजूर ने दर्जी की दुकान शुरू की और आसिफा ने गृहस्थी संभाली। दोनों के छह बच्चे हैं। आसिफा का वोटरकार्ड, आधार कार्ड व अन्य सभी दस्तावेज भी हैं।

महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है हमारा इलाका

आसिफा ने कहा कि पिछले साल जब चुनाव हुए तो हमारा इलाका महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित था। सभी ने मेरा नाम तय किया और मैं चुनाव जीत गई। अब लोगों ने मुझे बीडीसी चेयरमैन का चुनाव लड़ने के लिए कहा है। हिंदुस्तान ही मेरा मुल्क आसिफा ने कहा हिंदुस्तान ही मेरा मुल्क है। जो मेरे शौहर का वतन है वही मेरा वतन है। वतन से मुहब्बत करना एक इबादत है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर आसिफा के पति मंजूर ने कहा कि हिंदुस्तान ने यह अच्छा काम किया है। हमें अब बेहतरी की दुआ करनी चाहिए।

हम लोगों के लिए भी बंकर होने चाहिए

आसिफा ने बताया कि वह अपने इलाके में सभी मौलिक सुविधाएं चाहती है। यहां अच्छी सड़कें, स्कूल और अस्पताल चाहिए। हम लोग यहां बॉर्डर पर रहते हैं, जहां गोलाबारी होती रहती है। इसलिए हम लोगों के लिए बंकर होने चाहिए। एक बंकर बनाने में करीब एक से तीन लाख रुपये खर्च आता है।

आरिफा से शादी कर नेपाल के रास्ते कश्मीर आया

कुपवाड़ा जिले में खुमिरयाल बी पंचायत की सरपंच आरिफा भी गुलाम कश्मीर की रहने वाली है। उसका पति गुलाम मोहम्मद मीर वर्ष 2001 में आतंकी बनने गुलाम कश्मीर गया था। वहां उसने आतंकवाद से नाता तोड़ ऑटो रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। इसी दौरान पलांदरी गांव की रहने वाली आरिफा से उसने शादी कर ली। वर्ष 2010 में वह उसे लेकर नेपाल के रास्ते कश्मीर चला आया। कश्मीर लौटने पर वह कुछ समय जेल में भी रहा। अब वह टैक्सी चालक है और भाजपा से ताल्लुक रखता है।

आतंकवाद को गुडबाय कर दिलशादा को लेकर घर लौटा कुपवाड़ा जिले के परांगरु  गांव में पंच चुनी गई दिलशादा बेगम मुजफ्फराबाद में पैदा हुई। उसकी पढ़ाई लिखाई रावलपिंडी में हुई और उसने 2004 में मोहम्मद यूसुफ बट से शादी की। मोहम्मद यूसुफ भी जिहादी बनने गुलाम कश्मीर गया था, लेकिन उसने आतंकवाद को गुडबाय कर दिलशादा को लेकर जून 2012 में नेपाल के रास्ते लौट आया। दोनों के पांच बच्चे हैं। यूसुफ बट आज अपने गांव में किराने की दुकान चला रहा है, जबकि दिलशादा गांव की तरक्की के लिए प्रयास कर रही है।

Posted By: Preeti jha

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप