विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

'क्या स्टेटहुड का फैसला पाकिस्तान करेगा?...', उमर का केंद्र से तीखा सवाल; 370-35A पर भी साफ किया अपना रुख

By Naveen NawazEdited By: Dallu Slathia
Published: Mon, 28 Sep 2026 04:33 PM (IST)

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के समय पर स्पष्टता मांगी। ...और पढ़ें

राज्य का दर्जा बहाल करने पर उमर अब्दुल्ला ने केंद्र से मांगी टाइमलाइन।

राज्य का दर्जा बहाल करने पर उमर अब्दुल्ला ने केंद्र से मांगी टाइमलाइन।

HighLights

  1. उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य दर्जे पर स्पष्टता मांगी।

  2. आतंकवाद से राज्य का दर्जा जोड़ना इस्लामाबाद को शक्ति देना है।

  3. पुनर्गठन से पहले की संवैधानिक स्थिति बहाल करने की मांग की।

नवीन नवाज, श्रीनगर। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार को केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किए जाने के समय को लेकर स्पष्टता मांगी। विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाले प्रस्ताव पर बहस के दौरान उन्होंने सवाल उठाया कि 'जितनी जल्दी संभव हो' राज्य का दर्जा बहाल करने के आश्वासन का आखिर मतलब क्या है।

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि केंद्र सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वह राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए 'उचित समय' किसे मानती है।

उन्होंने कहा, 'मैं हर संभव मंच पर केंद्र से पूछता हूं कि हमें बताइए, राज्य का दर्जा मांगने का उचित समय क्या है?'

मुख्यमंत्री ने राज्य का दर्जा बहाल करने को सुरक्षा स्थिति या आतंकवाद से जोड़ने की किसी भी कोशिश पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि ऐसी शर्त लगाने का मतलब होगा कि इस फैसले पर नई दिल्ली का नियंत्रण नहीं रहेगा।

उन्होंने कहा, 'अगर आप कह रहे हैं कि जब तक आतंकवाद खत्म नहीं होता, तब तक राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तो आप प्रभावी रूप से यह कह रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे का फैसला नई दिल्ली में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद में है।'

स्टेटहुड को पाकिस्तान से क्यों जोड़ रहे?

पाकिस्तान की भूमिका और उरी तथा पुलवामा जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने सवाल किया कि क्या राज्य का दर्जा बहाल करने को पाकिस्तान द्वारा हिंसा समाप्त करने की शर्त से जोड़ दिया गया है।

उन्होंने कहा, 'क्या आप यह फैसला पाकिस्तान के हाथों में छोड़ रहे हैं? आप कह रहे हैं कि जब वे बंदूक चलाना बंद करेंगे, तब आप हमें राज्य का दर्जा देंगे।'

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर ने यह स्वीकार किया है कि राज्य का दर्जा बहाल करने का फैसला नई दिल्ली के हाथ में है। उन्होंने सवाल किया कि फिर केंद्र की प्रतिबद्धता के साथ शर्तें क्यों जोड़ी जा रही हैं।

उन्होंने कहा, 'अगर आपने पहले ही तय कर लिया है कि आपके प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान हमें राज्य का दर्जा नहीं देंगे, तो यह बेहद अफसोस की बात है।'

‘370 और 35A को जानबूझकर प्रस्ताव से बाहर रखा गया’

प्रस्ताव के शब्दों का बचाव करते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सरकार ने जानबूझकर अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35A और विशेष दर्जे का उल्लेख नहीं किया है, ताकि प्रस्ताव का ध्यान केवल राज्य का दर्जा बहाल करने पर केंद्रित रहे।

उन्होंने कहा, 'प्रस्ताव पढ़िए और बताइए कि इसमें हम 370, 35A या विशेष दर्जे पर मतदान की मांग कहां कर रहे हैं।'
मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ विधायकों ने ऐसे संशोधन पेश किए हैं, जिनके जरिए इन मुद्दों को प्रस्ताव में शामिल करने की कोशिश की गई। उनके अनुसार, इससे सदन की कार्यवाही बाधित करने का अवसर मिल सकता है।

उन्होंने कहा, 'मेरे कुछ सहयोगी उस जाल में फंस गए हैं। जब वे इसमें 370 और 35A जोड़ते हैं, तो वे उन्हें एक अवसर दे देते हैं।'

उन्होंने कहा कि विधानसभा पहले ही विशेष दर्जे से संबंधित प्रस्ताव पारित कर चुकी है, जिसमें वर्ष 2000 में फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान पारित प्रस्ताव भी शामिल है।

उमर ने कहा, 'सदन ने विशेष दर्जे पर एक बार नहीं, बल्कि दो बार प्रस्ताव पारित किया है। इनमें से एक 2000 में फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व में पारित हुआ था।' मुख्यमंत्री ने कहा कि मौजूदा मांग केवल उस संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति को बहाल करने तक सीमित है, जो पुनर्गठन से पहले जम्मू-कश्मीर के पास थी।

उन्होंने कहा, 'हम कह रहे हैं कि हमें वह स्थिति वापस दीजिए जो हमारे पास थी और जो दूसरों के पास नहीं थी। हम केंद्र से बस इतना ही मांग रहे हैं।'

‘राज्य का दर्जा जनता का है, किसी राजनीतिक दल का नहीं’

उमर अब्दुल्ला ने इस तर्क को खारिज किया कि राज्य का दर्जा बहाल होने से किसी विशेष राजनीतिक दल को फायदा या नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर के लोगों से जुड़ा है।

उन्होंने कहा, 'ऐसा नहीं है कि राज्य मेरा, मेरे परिवार या किसी राजनीतिक दल का है। यह जनता का है।' उन्होंने कहा कि पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं होने से निर्वाचित सरकार और प्रशासन के कामकाज पर असर पड़ता है।

उमर ने कहा, 'कहीं न कहीं हर दिन इसका असर होगा, क्योंकि हमारे पास राज्य का दर्जा नहीं है।'

मुख्यमंत्री ने उठाए सवाल

मुख्यमंत्री ने केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था के तहत निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के बीच शक्तियों के बंटवारे पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने सवाल किया कि राजस्व विभाग को निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर क्यों रखा गया है। उन्होंने कहा, “हमें बताया जाता है कि केंद्र शासित प्रदेश में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था उनके पास है, जबकि बाकी हमारे पास है। फिर राजस्व विभाग को हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर क्यों रखा गया है?”

उमर ने जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषाओं अकादमी का भी उल्लेख किया और सवाल किया कि उसका सुरक्षा या कानून-व्यवस्था से क्या संबंध है।

उन्होंने विश्वविद्यालयों का मुद्दा भी उठाया, जिसमें इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) और बाबा गुलाम शाह बादशाह विश्वविद्यालय शामिल हैं। उन्होंने सवाल किया कि उपराज्यपाल के कुलाधिपति के रूप में कार्य करने के दौरान मुख्यमंत्री की भूमिका को क्यों सीमित किया गया है।

‘करीब दो साल बीत गए, बिजनेस रूल्स अब तक मंजूर नहीं’

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सरकार ने करीब दो साल पहले अपने बिजनेस रूल्स केंद्र को भेजे थे, लेकिन अभी तक उनकी मंजूरी का इंतजार है।

उन्होंने कहा, “करीब दो साल बीत चुके हैं जब हमने बिजनेस रूल्स केंद्र को भेजे थे। उन्हें अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।”
मुख्यमंत्री के अनुसार, इस देरी ने केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था में कार्यकारी शक्तियों के बंटवारे और उनके इस्तेमाल को लेकर अनिश्चितता बढ़ाई है।

एडवोकेट जनरल की नियुक्ति में देरी पर उमर ने उठाया सवाल

मुख्यमंत्री ने जम्मू-कश्मीर के लिए एडवोकेट जनरल की नियुक्ति का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा, “हमारी सरकार बने करीब दो साल हो गए हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में अभी तक एडवोकेट जनरल नहीं है।”

उमर ने कहा कि सरकार अपना प्रस्ताव पहले ही भेज चुकी है और मामला कैबिनेट के स्तर से गुजरने के बाद विचार के लिए आगे भेजा गया था। उन्होंने सवाल किया कि इसके बावजूद नियुक्ति अब तक क्यों नहीं हो पाई।

‘केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा ही ऐसी स्थितियों का कारण है’

उमर ने कहा कि निर्वाचित सरकार के सामने आने वाली कई समस्याएं जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे का परिणाम हैं।

उन्होंने कहा, “मुझे बताइए, देश के किस राज्य में ऐसा होता है? मुख्यमंत्री एक प्रस्ताव लाता है और कानून सचिव उस पर राय देता है। ऐसा केवल केंद्र शासित प्रदेश में ही हो सकता है।”

उन्होंने यह भी सवाल किया कि निर्वाचित सरकार से जुड़े कानूनी मामलों पर राजनीतिक कार्यपालिका से पर्याप्त परामर्श किए बिना कानूनी राय क्यों जारी की जा रही है।

उमर ने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब मुख्यमंत्री और कानून मंत्री दोनों पदों पर रहते हुए उन्हें खुद कानून विभाग की एक राय की जानकारी नहीं थी, जबकि उस मामले की जानकारी कहीं और पहले ही भेजी जा चुकी थी।

उन्होंने कहा, “कानून मंत्री और मुख्यमंत्री के तौर पर मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन आपको पत्र मिल चुका है। यह केंद्र शासित प्रदेश होने का सीधा परिणाम है।”

‘हम जानना चाहते हैं कि हमारे अधिकारों के साथ क्या हुआ’

उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े ऐतिहासिक संवैधानिक ढांचे का भी उल्लेख किया, जिसमें महाराजा हरि सिंह से संबंधित व्यवस्थाएं और राज्य के निवासियों के लिए मौजूद संरक्षण शामिल थे।

उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद तत्कालीन राज्य से जुड़े संवैधानिक और कानूनी ढांचे में बदलाव किए गए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने कई मुद्दों पर समितियां गठित की हैं, लेकिन उनकी रिपोर्ट अभी प्रतीक्षित है। उमर ने कहा, “हमें अपमानित किया गया है। हम इसका हिसाब चाहते हैं। हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं।”

उन्होंने दोहराया कि विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करके अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर की विधानसभा केंद्र से राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रही है।”