विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जम्मू-कश्मीर में उमर सरकार के 2 साल, अधूरे वादे, अपनों की नाराजगी और दिल्ली के साथ खींचतान; कहां फंस गई सियासत?

Published: Thu, 15 Oct 2026 04:40 PM (GMT+05:30)

जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के दो साल के कार्यकाल पर सवाल उठ रहे हैं, जिसमें अधूरे वादे और संगठन ...और पढ़ें

जिन वादों पर मिली सत्ता, उन्हीं पर क्यों घिर रहे सीएम? (फाइल फोटो)

जिन वादों पर मिली सत्ता, उन्हीं पर क्यों घिर रहे सीएम? (फाइल फोटो)

HighLights

  1. अधूरे चुनावी वादे और जनता की उम्मीदें।

  2. नेशनल कॉन्फ्रेंस संगठन में बढ़ता आंतरिक असंतोष।

  3. दिल्ली से रिश्तों और संवैधानिक सीमाओं पर सवाल।

नवीन नवाज, श्रीनगर। 16 अक्टूबर 2024 को शपथ ग्रहण कर जम्मू कश्मीर की कश्मीर की सत्ता में लौटने के दो साल बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार के सामने जनता की उम्मीदों और चुनावी वादों को पूरा करने की चुनौती है। नेशनल कान्फ्रेंस को मिले जनादेश में रोजगार, राजनीतिक अधिकारों की बहाली और बदलाव की आकांक्षा शामिल थी, लेकिन अब सरकार की उपलब्धियों से अधिक अधूरे वादों, सीमित अधिकारों और संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष पर चर्चा हो रही है। उमर संवैधानिक सीमाओं को अपनी मजबूरी बताते हैं, जबकि विपक्ष पूछ रहा है कि चुनावी गारंटियां कब पूरी होंगी।

यह सफर उमर के नेतृत्व, राजनीतिक रणनीति और दिल्ली से रिश्तों की भी परीक्षा बन गया है। पंचायत चुनावों के बारे में उनका जवाब- ‘जब राइट टाइम होगा, बताएंगे’ और बडगाम उपचुनाव में पार्टी की हार ने सवाल बढ़ाए हैं।

विपक्ष के अलावा उनकी पार्टी के सांसद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी की मुखर नाराजगी भी नेतृत्व के लिए चुनौती है। सवाल है कि क्या उमर शेष कार्यकाल में जनता की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे या अधूरे वादे और आंतरिक असंतोष सरकार पर दबाव बनाए रखेंगे?

अनुभव के बावजूद संगठन में असंतोष थामने की चुनौती

उमर अब्दुल्ला केंद्रशासित जम्मू-कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री पद संभालने, संगठन का नेतृत्व करने और विरोधियों से निपटने का उन्हें पुराना अनुभव है। फिर भी, बीते दो वर्षों में वह संगठन में उठते असंतोष को शांत करने और विरोधियों के सवालों का जवाब देने में सफल नहीं दिखे।

पार्टी के कुछ नेताओं का आरोप है कि वह दिल्ली के सामने झुक गए हैं और संगठन का नेतृत्व करने में कमजोर साबित हो रहे हैं। वे बडगाम उपचुनाव में हार और आगा सैयद रुहुल्ला की नाराजगी का उदाहरण देते हैं।

पूर्ण राज्य के दर्जे के मुद्दे पर उमर के रुख से उठे सवाल

कश्मीर मामलों के जानकार रशीद राही के अनुसार, हाल के विधानसभा सत्र से मुख्यमंत्री उमर ने पूर्ण राज्य के दर्जे के मुद्दे को स्वायत्तता और विशेष दर्जे की बहाली से जोड़ने की कोशिश करते हुए जिस तरह संबधित प्रस्ताव पर मुख्य सचिव अटल डुल्लू और विधि सचिव के स्पीकर को लिखे पत्र के संदर्भ में बात की, उससे उन्होंने खुद को असहाय साबित किया।

उमर के मुताबिक, दोनों अधिकारियों ने उनके कार्यालय को दरकिनार किया। विधानसभा अध्यक्ष राथर ने इसे विधायिका के अधिकार क्षेत्र में 'अभूतपूर्व नौकरशाही हस्तक्षेप' बताया।

एक लाख नौकरियों का वादा कहां गया?

विश्लेषक तरुण उपाध्याय का कहना है कि मौजूदा हालात में उमर के लिए राजनीतिक प्राथमिकताएं तय करना कठिन है। उनके मुताबिक, आम लोग और विरोधी मानते हैं कि मुख्यमंत्री दिल्ली के एजेंडे के प्रति संवेदनशील हैं और पार्टी के घोषणापत्र से पीछे हट रहे हैं।

उपाध्याय ने नेशनल कान्फ्रेंस की 12 गारंटियों का हवाला देते हुए पूछा कि एक लाख नौकरियां कहां हैं। सिलिंडर का वादा आधा-अधूरा पूरा हुआ है, जबकि बिजली-पानी की व्यवस्था खराब है और अस्पतालों में डाक्टरों की कमी है।

कैदियों की रिहाई, पीएसए और पाकिस्तान से बातचीत जैसे मुद्दों पर उमर यह कहते हैं कि ये उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं और पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने पर ही इन पर बात होगी।

मंत्रिमंडल का विस्तार क्यों टल रहा?

उपाध्याय के अनुसार, संगठन में कमजोर पकड़ के कारण मंत्रिमंडल का विस्तार भी टल रहा है। रुहुल्ला ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व, सरकार के कामकाज और पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाए हैं, जिससे उमर की छवि प्रभावित हुई है।

पीपुल्स कान्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक वहीद उर रहमान परा भी घोषणापत्र के वादों पर सवाल करते हैं। उनका आरोप है कि उमर दिल्ली को खुश करने में लगे हैं और पांच अगस्त 2019 के केंद्र सरकार के फैसले को सामान्य बना चुके हैं।

नेशनल कान्फ्रेंस ने गिनाईं अपनी उपलब्धियां

नेशनल कान्फ्रेंस के प्रवक्ता तनवीर सादिक का कहना है कि वादे पूरे करने के लिए सरकार के पास अभी तीन साल हैं। पार्टी अंत्योदय अन्न योजना परिवारों को सालाना छह मुफ्त एलपीजी सिलिंडर, वृद्धावस्था और विधवा पेंशन बढ़ाकर 3,000 रुपये करने तथा महिलाओं के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन को उपलब्धि बताती है।

हालांकि, घोषणापत्र में ईडब्ल्यूएस परिवारों को सालाना 12 सिलिंडर देने का वादा था। सरकार ने नवंबर 2024 में संवैधानिक अधिकारों और सितंबर 2026 में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव पारित किए। पार्टी नेताओं का कहना है कि सरकार राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन केंद्रशासित प्रदेश की सीमित शक्तियां घोषणापत्र के वादे पूरे करने में बाधा हैं।