श्रीनगर में बाढ़-सुरक्षा वाली जमीन पर क्यों बन रहा ₹104 करोड़ का इंडस्ट्रियल पार्क? 2019 में थी रोक, अब उठे सवाल
श्रीनगर के नौगाम में प्रस्तावित 104.02 करोड़ रुपये के औद्योगिक पार्क पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि 2019 में इस क्षेत्र को बाढ़-सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना गया था।

श्रीनगर के नौगाम में औद्योगिक पार्क पर उठे सवाल। (फाइल फोटो)
HighLights
नौगाम में 104 करोड़ के औद्योगिक पार्क पर सवाल।
2019 में यह क्षेत्र बाढ़-सुरक्षा हेतु आरक्षित था।
वैज्ञानिक अध्ययन और नीतिगत बदलाव की मांग।
नवीन नवाज, श्रीनगर। लालचौक से लगभग 11 किलोमीटर दूर नौगाम में प्रस्तावित 104.02 करोड़ रुपये का औद्योगिक पार्क अब सिर्फ औद्योगिक विकास की परियोजना नहीं रह गया है। इसके साथ 2019 में लिए गए उस सरकारी फैसले का सवाल भी जुड़ गया है, जिसके तहत इसी क्षेत्र को श्रीनगर की बाढ़-सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा मानते हुए निर्माण गतिविधियों से दूर रखने की नीति बनाई गई थी। सात वर्ष में नीति में आए इस बदलाव पर पर्यावरण संगठनों ने सवाल उठाए हैं। उनकी मांग है कि सरकार बताए कि बाढ़ क्षेत्र में निर्माण की अनुमति किस वैज्ञानिक और कानूनी आधार पर दी गई।
उपलब्ध दस्तावेजों और परियोजना से जुड़ी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में राज्य प्रशासनिक परिषद ने श्रीनगर मास्टर प्लान-2035 को मंजूरी दी थी। इसमें पंथाचौक से नौगाम तक बाईपास के किनारे बाढ़-अवशोषण बेसिन वाले क्षेत्र में निर्माण और विकास गतिविधियों पर रोक का प्रावधान किया गया था। यानी उस समय सरकारी नजर में यह जमीन महज खाली भूखंड नहीं थी, बल्कि श्रीनगर में बाढ़ के अतिरिक्त पानी को रोकने और उसके दबाव को कम करने वाली प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा थी।
अब तस्वीर बदल गई है। इसी क्षेत्र में औद्योगिक पार्क प्रस्तावित है और परियोजना को केंद्र की भारत औद्योगिक विकास योजना (भव्य) के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रशासन स्तर पर डीपीआर की तकनीकी जांच, भूमि संबंधी औपचारिकताओं और जरूरी मंजूरियों की प्रक्रिया पर काम चल रहा है।
फाइल बदली या जमीन की भूमिका?
नौगाम परियोजना का सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2019 और 2026 के बीच आखिर ऐसा क्या बदला? क्या जमीन की भौगोलिक स्थिति बदल गई? क्या बाढ़ का खतरा कम हुआ? क्या कोई नया हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन हुआ, जिसने इस क्षेत्र को बाढ़-अवशोषण बेसिन से अलग कर दिया? अथवा भूमि उपयोग को लेकर सरकारी नीति में बदलाव किया गया? यदि नीति बदली है तो उसका आदेश क्या है और उसके पीछे वैज्ञानिक आधार क्या है? यही वह जानकारी है, जिस पर अब परियोजना को लेकर उठ रही आपत्तियां केंद्रित हैं।
2014 की बाढ़ का भूला हुआ सबक?
हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञ और समाजसेवी एजाज रसूल के अनुसार, 2014 की बाढ़ ने श्रीनगर की प्राकृतिक जल-निकासी और जल-भंडारण व्यवस्था की संवेदनशीलता सामने ला दी थी। उनका कहना है कि नौगाम और दक्षिणी श्रीनगर के निचले क्षेत्रों में पानी के ठहराव और निकासी की भूमिका को देखते हुए यहां बड़े पैमाने पर निर्माण से पहले वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
उनके मुताबिक मूल सवाल यह है कि जिस भू-भाग को कभी बाढ़ के पानी के लिए प्राकृतिक जगह माना गया था, उसकी भूमिका अब किस वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर बदली गई है।
विरोध उद्योग का नहीं, जगह का
पर्यावरण संगठनों की आपत्ति भी इसी बिंदु पर है। पर्यावरण नीति समूह ने परियोजना की वैधानिक और न्यायिक जांच की मांग की है। पीपुल्स एनवायरनमेंट काउंसिल और नगीन झील संरक्षण संगठन ने प्रस्तावित स्थल की बहु-विषयक समीक्षा की मांग उठाई है।संगठनों का कहना है कि वे औद्योगिक निवेश या रोजगार के खिलाफ नहीं हैं।
उनकी मांग है कि पहले यह सार्वजनिक किया जाए कि प्रस्तावित पार्क की सीमा, खसरा नंबर, भौगोलिक निर्देशांक, जमीन की ऊंचाई और मौजूदा भूमि उपयोग क्या है। साथ ही 2014 की बाढ़, नौगाम झील, आर्द्रभूमियों, प्राकृतिक जल-मार्गों और झेलम के बाढ़ मैदान को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन कराया जाए।
50 एकड़ पर सिर्फ फैक्ट्रियां नहीं
पर्यावरणविद् डा. राजा मुजफ्फर बट का कहना है कि 50 एकड़ में औद्योगिक पार्क विकसित होने का मतलब केवल फैक्ट्रियां खड़ी करना नहीं है। इसके साथ सड़कें, औद्योगिक भूखंड, गोदाम, उपयोगिता सेवाएं और अन्य पक्के ढांचे भी आएंगे। इससे बारिश और बाढ़ के पानी के प्राकृतिक फैलाव, जमीन में पानी के समाने तथा जल-निकासी की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि 2019 में बाढ़-सुरक्षा के लिए बचाई गई जमीन सात साल बाद किस आधार पर सुरक्षित मानी गई? क्या नया वैज्ञानिक अध्ययन हुआ है और क्या उसने यह प्रमाणित किया है कि औद्योगिक निर्माण से श्रीनगर की बाढ़-भंडारण और जल-निकासी क्षमता प्रभावित नहीं होगी?
सरकार के लिए 104.02 करोड़ रुपये का निवेश औद्योगिक विकास और रोजगार का अवसर है। लेकिन नौगाम की जमीन का सवाल इससे आगे जाता है। यदि यह क्षेत्र वास्तव में बाढ़-अवशोषण व्यवस्था का हिस्सा है तो उसके उपयोग में बदलाव का असर केवल परियोजना स्थल तक सीमित नहीं रहेगा।
फिलहाल प्रशासन डीपीआर और तकनीकी मंजूरियों की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है। वहीं उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं में 2019 के बाढ़-अवशोषण संबंधी प्रावधान और मौजूदा औद्योगिक परियोजना के बीच के बदलाव का विस्तृत वैज्ञानिक आधार सामने नहीं आया है।
