श्रीनगर, [राज्य ब्यूरो]। केंद्र ने राज्य सरकार के साथ मिलकर स्थानीय आतंकियों के लिए एक नई सरेंडर नीति तैयार करने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। इस नीति का मकसद आतंकी संगठनों में भर्ती युवकों को मुख्यधारा में वापस लाने और उन्हें राज्य में शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनाना है। प्रस्तावित नीति का प्रारूप तैयार करते हुए अतीत में बनी ऐसी सभी योजनाओं के अनुभव और आत्मसमर्पण कर चुके, सरहद पार से सपरिवार आए आतंकियों के अनुभव ध्यान में रखे जाएंगे। 

गौरतलब है कि 2004 में भी राज्य सरकार ने केंद्र की मदद से आतंकियों के लिए सरेंडर नीति बनाई थी। उसके बाद करीब छह साल पहले नेशनल कांफ्रेंस व कांग्रेस गठबंधन सरकार ने भी सरहद पार बैठे राज्य के युवकों के लिए राहत एवं पुनर्वास नीति का एलान किया था। केंद्र ने 1990 के दशक में भी सरेंडर नीति बनाई थी। इसके तहत कई कश्मीरी आतंकियों को सरेंडर करने पर सीआरपीएफ, बीएसएफ और सेना में भर्ती भी किया था।संबंधित अधिकारियों ने बताया कि राज्य में इस समय आतंकियों को सरेंडर करने के लिए प्रेरित करने में पूरी तरह समर्थ कोई भी सरेंडर नीति नहीं है। इसलिए बीते कुछ वर्षों के दौरान हथियार डालने वाले सक्रिय आतंकियों की संख्या नगण्य ही है। जनवरी 2016 से नवंबर 2017 के पहले सप्ताह तक पूरे राज्य में आत्मसमर्पण करने वाले आतकियों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुंच पाई है।

सूत्रों ने बताया कि 2007 के बाद से राज्य में आत्मसमर्पण करने वाले स्थानीय आतंकियों की संख्या लगातार घटी है। बीते एक साल के दौरान सुरक्षाबलों ने कई बार स्थानीय आतंकियों को सरेंडर के लिए मनाने का प्रयास किया, मुठभेड़ के दौरान भी उन्हें मौका दिया गया, लेकिन उन्होंने हथियार छोड़ने के बजाय मरना बेहतर समझा।

 

Posted By: Preeti jha

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