कोकरनाग के ब्रेंगी नाले में नया सिंकहोल दिखा, 2022 की घटना वाली जगह से 1.5km नीचे की ओर मिला गड्ढा; लोगों में दहशत
दक्षिणी कश्मीर के कोकरनाग में ब्रेंगी नाला के कैचमेंट एरिया में एक नया सिंकहोल देखा गया है, जिससे झेलम की ...और पढ़ें

कोकरनाग में 2022 की घटना के बाद नया सिंकहोल देख बढ़ी चिंता। (फाइल फोटो)
HighLights
दक्षिणी कश्मीर के कोकरनाग में ब्रेंगी नाले में नया सिंकहोल मिला।
चूना-पत्थर क्षेत्र में ज़मीन की स्थिरता पर चिंताएं फिर बढ़ीं।
2022 के बड़े सिंकहोल के बाद यह पहली नई घटना है।
जागरण संवाददाता, श्रीनगर। दक्षिणी कश्मीर कोकरनाग में ब्रेंगी नाला के कैचमेंट एरिया में एक नया सिंकहोल (ज़मीन में अचानक बना गड्ढा) देखा गया है। इससे झेलम की मुख्य सहायक नदी ब्रेंगी के चूना-पत्थर (लाइमस्टोन) वाले इलाके में ज़मीन की स्थिरता को लेकर चिंता फिर से बढ़ गई है। यह गड्ढा 27 सितंबर को गोहिहार्ड में देखा गया, जो 11 फरवरी 2022 को वांडेवलगाम में हुई ज़मीन धंसने की घटना वाली जगह से लगभग 1.5 किलोमीटर नीचे की ओर है।
अधिकारियों ने ब्रेंगी नदी के बहाव का रास्ता बदल दिया और गड्ढे को रेत और बजरी से भर दिया, जिसके बाद नदी का बहाव फिर से सुचारू रूप से चलने लगा।
बता देते हैं कि ब्रेंगी नदी में 1995 और 2022 में भी सिंकहोल बनने की घटनाएं देखी गई थीं। वांडेवलगाम में ज़मीन धंसने की बड़ी घटना के बाद से कैचमेंट एरिया में यह पहला सिंकहोल है, जिसके बारे में पता चला है। 2022 की घटना के बाद हाइड्रोजियोलाजिस्ट रियाज़ अहमद मीर और उनके साथियों ने इस पर विस्तृत जांच की, जिसकी रिपोर्ट 2023 में स्प्रिंगर नेचर के 'एनवायरनमेंट, डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित हुई।
भूजल के बहाव और कटाव ने बढ़ाई कमजोरी
शोधकर्ताओं ने वांडेवलगाम वाली घटना को कोलैप्स सिंकहोल की श्रेणी में रखा। उन्होंने बताया कि यह घटना कम अम्लीय नदी के पानी और भूजल के बहाव के कारण लंबे समय तक चूना-पत्थर के घुलने और भौतिक कटाव से कमज़ोर हुई ट्राइएसिक लाइमस्टोन की गुफा की छत के ढहने से हुई थी। इस चूना-पत्थर में बड़ी संरचनात्मक दरारें और कार्स्ट संरचनाएं मौजूद हैं।
जमीन धंसने से पहले वहां लगभग 80 क्यूबिक मीटर पानी जमा हो गया था, जबकि जियोफिजिकल सर्वे से पता चला कि गुफाएं नदी के बहाव की दिशा में लगभग 100 मीटर तक फैली हुई थीं।
सिंकहोल ने ब्रेंगी नदी के पूरे बहाव को अपने अंदर समा लिया; कई हफ़्तों तक प्रति सेकंड लगभग 15.03 क्यूबिक मीटर पानी ज़मीन के नीचे गायब होता रहा, जिससे नदी का 20 किलोमीटर से ज़्यादा निचला हिस्सा सूख गया।
इस पानी के नुकसान से जलीय जीवन पर असर पड़ा और घरेलू जलापूर्ति, सिंचाई, खेती और बागवानी बाधित हुई। ट्रेसर टेस्ट से पता चला कि गायब हुआ पानी ज़मीन के नीचे 16 किलोमीटर का सफ़र तय करके अछबल स्प्रिंग्स (झरनों) तक पहुंचा, जिसकी औसत गति लगभग 1.3 किलोमीटर प्रति घंटा थी।
सिंकहोल से झरने तक पांच घंटे में पहुंचा नदी का पानी
एनआईटी श्रीनगर की एक अलग जांच में पाया गया कि जमा हुए पानी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अछबल में एक आउटलेट से बाहर निकलता था। 11 फरवरी, 2022 को हुए धंसाव के 29 दिन बाद, 12 मार्च को अचबल बाटनिकल गार्डन के झरनों में अचानक पानी का बहाव बढ़ गया।
बाद में किए गए एक डायवर्जन टेस्ट में, एनआईटी के रिसर्चर्स ने देखा कि जब ब्रेंगी नदी के पानी को सिंकहोल की ओर मोड़ा गया, तो उसके लगभग पांच घंटे बाद झरने से निकलने वाले पानी की मात्रा बढ़ गई; और जब पानी का बहाव रोकना बंद किया गया, तो यह मात्रा फिर से कम हो गई।
कई और सिंकहोल होने की चेतावनी
जांच में मुख्य धंसाव वाली जगह के ऊपर और नीचे की ओर पांच छोटे सिंकहोल भी पाए गए। इनका लगभग सीधा पैटर्न' ज़मीन के नीचे मौजूद गुहाओं और पानी के बहाव वाले रास्तों के एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता था। इस स्टडी में धंसाव वाली जगह से नीचे की ओर 77.15 वर्ग किलोमीटर के इलाके को ज़्यादा जोखिम वाला क्षेत्र बताया गया, इसमें लगभग 58 प्रतिशत खेती और बागवानी वाली ज़मीन, 25 प्रतिशत पेड़-पौधों वाला इलाका और 10 प्रतिशत बना हुआ इलाका (इमारतें वगैरह) शामिल था।
शौधकर्ताओं ने वांडेवलगाम और गोहिहार्ड सिंकहोल को इस इलाके की कार्स्ट टोपोग्राफी (चूना-पत्थर वाली ज़मीन की बनावट) का एक हिस्सा और खास विशेषता बताया। साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि इस इलाके में कई और सिंकहोल हो सकते हैं, लेकिन वे तभी सामने आते हैं जब वे पूरी तरह से धंस जाते हैं।
उन्होंने सिंकहोल बनने की संभावना और उससे जुड़े खतरों के आकलन पर एक विस्तृत अध्ययन के साथ-साथ स्थानीय भूजल संसाधनों और कार्स्ट झरनों की लंबे समय तक निगरानी और बेहतर प्रबंधन की मांग की।
2026 का नया छेद 2022 के मुकाबले काफी छोटा
गोहिहार्ड में हाल ही में बनी गुहा (कैविटी) 2022 में बने छेद की तुलना में काफी छोटी थी। इसे भरने से पहले पानी के बहाव में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया।
अब तक किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन में 2026 में बने छेद का संबंध उस गुहा या वांडेवालगम में ज़मीन धंसने के बाद दर्ज किए गए 16 किलोमीटर लंबे भूमिगत रास्ते से नहीं जोड़ा गया है।
