नवीन नवाज, श्रीनगर

सत्यपाल मलिक नई जिम्मेदारी संभालने के लिए बुधवार को ग्रीष्मकालीन राजधानी पहुंच गए। वीरवार सुबह रियासत के 13वें राज्यपाल के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे। इसके साथ ही राज्य के समक्ष चुनौतियां उनकी राजनीतिक कार्यकुशलता और सूझबूझ की परीक्षा लेना शुरू कर देंगी। उन्हें आतंकवाद के मोर्चे से लेकर राज्य में लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक मजबूत बनाने के साथ राज्य के तीनों संभागों के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक व आíथक आकाक्षाओं को पूरा करने के मोर्चे पर जूझना है।

सत्यपाल मलिक धुर राजनीतिक माने जाते हैं लेकिन राजनीतिक, सामाजिक व सामरिक रूप से संवेदनशील जम्मू कश्मीर में प्रशासनिक बागडोर संभालते ही उन्हें धारा 35ए पर पैदा हुए विवाद को हल करना है। धारा 35ए के मुद्दे पर जम्मू कश्मीर में लोग दो ध्रुवों में बंट चुके हैं। हालांकि यह मामला अदालत में विचाराधीन है, लेकिन फैसला अगर धारा 35ए के खिलाफ जाएगा तो कश्मीर में हालात बिगड़ने से कोई इन्कार नहीं कर सकता। हालात बिगड़ने का असर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की सियासत पर नजर आएगा। सर्वाेच्च न्यायालय में इस मामले पर 27 अगस्त को सुनवाई होगी। अलगाववादियों ने 26-27 अगस्त को कश्मीर बंद का आह्वान किया है। इस मामले से वह खुद कैसे अलग रखेंगे और हालात को सामान्य बनाए रखते हैं, इसे सभी टकटकी लगाए देख रहे हैं।

राज्यपाल शासन लागू होने के कारण जम्मू कश्मीर के प्रशासक की जिम्मेदारी को अंजाम देते हुए उन्होंने कश्मीर में शांति बहाली और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए जमीन तैयार करना, अलगाववादी खेमे को बातचीत की मेज पर लाना और आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाना भी उनके लिए बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही राज्य में प्रस्तावित स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों को संपन्न कराने के साथ साथ वर्ष 2019 के संसदीय चुनावों का माहौल बनाना और मौजूदा विधानसभा जो निलंबित है, को फिर से बहाल करना या भंग कर नए चुनाव कराना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती है।

सत्यपाल मलिक को आतंकी संगठनों में बढ़ रही स्थानीय युवकों की भर्ती को रोकना, आतंकियों के सरेंडर को यकीनी बनाना, सेना समेत सभी पुलिस व अर्धसैनिकबलों के बीच समन्वय बनाए रखते हुए आतंकवाद व घुसपैठ से निपटना और राज्य में सियासी हथियार बन चुकी नौकरशाही को पूरी तरह जनता के प्रति जवाबदेह बनाना और उसके कामकाज में पारदर्शिता लाना भी उनके लिए एक कड़ा इम्तिहान साबित होगा। -सत्यपाल मलिक की नियुक्ति के मायने

केंद्र ने सत्यपाल मलिक को जम्मू कश्मीर का राज्यपाल सोची समझी रणनीति के तहत ही नियुक्त किया है। बीते 51 साल में वह जम्मू कश्मीर के ऐसे पहले राज्यपाल हैं, जो नौकरशाही, सेना या खुफिया ब्यूरो की पृष्ठभूमि नहीं रखते। सत्यपाल मलिक एक फुलटाइम सियासतदां हैं, जो छात्र जीवन से ही सियासत में रहे हैं। कश्मीर मामलों के कई विशेषज्ञ ही नहीं कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ भी अकसर इस बात पर जोर देते रहे हैं कि केंद्र हमेशा किसी ब्यूरोक्रेट या सेना के जनरल को जम्मू कश्मीर में राज्यपाल बनाकर भेजती है, जो हर मुद्दे को नौकरशाही या सैन्य दृष्टि से देखते हैं। जबकि जम्मू कश्मीर को एक सियासी नजरिए से ही देखे जाने और हल करने की जरूरत है। मौजूदा परिस्थितियों में जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू है और अगर किसी सियासतदां को राज्यपाल बनाया जाता है तो वह स्थानीय सियासी समीकरणों को समझते हुए आगे बढे़गा, जो कश्मीर में हालात सामान्य बनाने की दिशा में सहायक साबित होगा। इसके अलावा सत्यपाल मलिक आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं हैं। वह समाजवादी राजनीतिक पृष्ठभूमि से हैं। वह कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला, कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद व कई अन्य दिग्गज नेताओं के साथ अच्छे संबंध रखते हैं। आरएसएस की पृष्ठभूमि से न होने के कारण कश्मीर में उन पर आरएसएस का एजेंट होने या आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने का भी आरोप नहीं लगेगा। अलगाववादी तत्व भी उनकी नियुक्ति को सहज लेंगे और हंगामा नहीं करेंगे। इसके अलावा वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कश्मीर मसले को गाली और गोली से नहीं, कश्मीरियों को गले लगाकर हल करने की नीति को सियासी तरीके से जमीनी स्तर पर लागू करने में किसी पुराने ब्यूरोक्रेट या सेना के जनरल से कहीं ज्यादा बेहतर साबित हो सकते हैं।

Posted By: Jagran