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93% को मिला काम, 100 दिन का रोजगार सिर्फ 2% को; मनरेगा पर कैग की रिपोर्ट ने खोली जम्मू-कश्मीर की तस्वीर

Published: Thu, 01 Oct 2026 01:24 PM (IST)

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में मनरेगा के तहत 93% परिवारों को काम मिला, लेकिन 2% ही 100 दिन ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर में सिर्फ 77,512 परिवारों को मिला पूरा काम। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर में सिर्फ 77,512 परिवारों को मिला पूरा काम। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. 93% परिवारों को काम मिला, पर 100 दिन सिर्फ 2% को।

  2. मनरेगा में ₹704 करोड़ से अधिक की देनदारियां लंबित।

  3. जम्मू-कश्मीर में 74% मनरेगा कार्य अधूरे पाए गए।

नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के तहत रोजगार मांगने वाले अधिकांश परिवारों को काम तो मिला, लेकिन निर्धारित 100 दिनों के रोजगार की गारंटी तक पहुंचने वाले परिवारों की संख्या बेहद कम रही।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की अनुपालन लेखा-परीक्षा रिपोर्ट ने योजना के क्रियान्वयन में रोजगार उपलब्ध कराने, मजदूरी भुगतान, अधूरी परिसंपत्तियों, मानव संसाधन और निगरानी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण कमियां सामने रखी हैं।यह रिपोर्ट कृषि एवं सहकारिता मंत्री जावेद अहमद डार ने सदन में बुधवार को रखी है।

मनरेगा में 100 दिन के रोजगार तक पहुंच बेहद कम

वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच जम्मू-कश्मीर में 37,82,594 जाब कार्डधारी परिवारों ने रोजगार की मांग की। इनमें से 34,99,449 परिवार, यानी करीब 93 प्रतिशत, को रोजगार उपलब्ध कराया गया।

हालांकि, इसी अवधि में केवल 77,512 परिवार, यानी लगभग 2 प्रतिशत, ही मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार हासिल कर सके।

यह आंकड़ा योजना के दो अलग-अलग पहलुओं को सामने लाता है। बड़ी संख्या में परिवारों को रोजगार मिला, लेकिन 100 दिनों की वैधानिक रोजगार गारंटी तक पहुंचने वाले परिवारों का अनुपात बेहद कम रहा। कैग ने इसके पीछे स्थानीय स्तर पर श्रम मांग का पर्याप्त आकलन न होने और योजना निर्माण में कमियों की ओर संकेत किया है।

आडिट में पाया गया कि विभाग ने घर-घर जाकर रोजगार की मांग का सर्वेक्षण नहीं किया, जबकि परिचालन दिशा-निर्देशों में इसकी अपेक्षा की गई थी। जिलों के लिए परिप्रेक्ष्य योजनाओं के अभाव ने भी मांग आधारित योजना निर्माण को प्रभावित किया।

704 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी

मनरेगा के क्रियान्वयन में दूसरा बड़ा सवाल मजदूरी और अन्य भुगतान से जुड़ा है। मार्च 2024 तक जम्मू-कश्मीर में कुल 704.39 करोड़ रुपये की देनदारियां लंबित थीं।

इनमें 49.19 करोड़ रुपये अकुशल मजदूरी, 646.92 करोड़ रुपये कुशल एवं अर्द्धकुशल मजदूरी तथा सामग्री और 8.28 करोड़ रुपये प्रशासनिक खर्च से संबंधित थे।

वर्ष 2019-20 से 2023-24 के दौरान सामग्री तथा कुशल और अर्द्धकुशल मजदूरी पर 1,333.25 करोड़ रुपये खर्च दर्ज हुआ। इसमें से 646.92 करोड़ रुपये, यानी करीब 49 प्रतिशत, मार्च 2024 तक लंबित थे। कैग के अनुसार कुछ भुगतान एक से पांच वर्ष तक लंबित रहे।

मजदूरी में देरी का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए केवल रोजगार योजना नहीं, बल्कि आय और सामाजिक सुरक्षा का माध्यम भी है। कैग ने विलंबित मजदूरी, पात्र श्रमिकों को बेरोजगारी भत्ता न मिलने और विलंबित भुगतान के मुआवजे से संबंधित मामलों की ओर भी ध्यान दिलाया।

74 प्रतिशत कार्य अधूरे

वर्ष 2019-20 से 2023-24 के दौरान जम्मू-कश्मीर में मनरेगा के तहत 27.14 लाख कार्यों को लेने की योजना बनाई गई थी। इनमें से 20.16 लाख कार्य क्रियान्वयन के लिए लिए गए, लेकिन केवल 5.34 लाख, यानी करीब 26 प्रतिशत, ही पूरे हो सके।

इसके विपरीत 14.82 लाख कार्य, यानी क्रियान्वयन के लिए लिए गए कार्यों का करीब 74 प्रतिशत, मार्च 2024 तक अधूरे थे। इन अधूरे कार्यों पर तब तक 1,897.10 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे।

इसका असर केवल सरकारी अभिलेखों पर नहीं पड़ता। तालाब, जल संरक्षण ढांचा, ग्रामीण सड़क, सामुदायिक भवन या अन्य परिसंपत्ति अधूरी रहने का सीधा अर्थ है कि ग्रामीण समुदाय को उसका अपेक्षित लाभ समय पर नहीं मिल सका।

यहीं संचालन एवं रखरखाव (आपरेशन एंड मेंटेनेंस—आेएंडएम) का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी परिसंपत्ति का निर्माण पूरा होने के बाद उसका नियमित संचालन, रखरखाव और मरम्मत सुनिश्चित नहीं हो तो उस पर किया गया खर्च अपेक्षित दीर्घकालिक लाभ में पूरी तरह परिवर्तित नहीं हो पाता।

आंगनवाड़ी निर्माण में भी बड़ी कमी

मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं के बीच समेकित क्रियान्वयन का उदाहरण आंगनवाड़ी केंद्रों के निर्माण में भी सामने आया।चार जिलों में वर्ष 2017 से 2024 के दौरान 144 आंगनवाड़ी केंद्रों को निर्माण के लिए लिया गया। इनकी स्वीकृत लागत 932.54 लाख रुपये थी। इनमें से 104 केंद्र, यानी करीब 72 प्रतिशत, मार्च 2024 तक अधूरे थे। इन पर 242.29 लाख रुपये खर्च हो चुके थे।

विभाग ने कुछ मामलों में भूमि विवाद, स्थानीय समस्याओं और धनराशि जारी करने में देरी को कारण बताया। कैग ने जिला स्तर पर निरीक्षण और निगरानी की कमी को भी महत्वपूर्ण समस्या माना।

मानव संसाधन और भुगतान व्यवस्था में खामियां

कैग ने कार्यक्रम अधिकारियों, लेखा सहायकों, तकनीकी सहायकों और ग्राम रोजगार सहायकों के रिक्त पदों तथा जिलों में मानव संसाधन के असमान वितरण को भी रेखांकित किया। इससे निगरानी, अभिलेखों के रखरखाव और समय पर सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

मार्च 2024 तक 22.29 लाख श्रमिकों में से 3.33 लाख के खाते आधार आधारित भुगतान व्यवस्था में परिवर्तित नहीं हुए थे। पांच नमूना जिलों में आधार से खाते के जुड़ाव की कमी के कारण 67,430 लेनदेन, जिनकी राशि 11.33 करोड़ रुपये थी, अस्वीकृत हुए।

सामाजिक अंकेक्षण और निगरानी व्यवस्था में भी कमियां पाई गईं। राज्य रोजगार गारंटी परिषद की नियमित बैठकों और उसके निर्णयों के क्रियान्वयन में कमी के साथ-साथ सामाजिक अंकेक्षण में उठाई गई आपत्तियों के निपटारे में भी खामियां दर्ज की गईं।

अब चुनौती केवल रोजगार देने की नहीं

 


कैग की रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर में मनरेगा की दोहरी तस्वीर पेश करती है। एक ओर रोजगार मांगने वाले 93 प्रतिशत परिवारों तक काम पहुंचा, लेकिन केवल 2 प्रतिशत परिवार ही 100 दिनों के रोजगार तक पहुंच सके। दूसरी ओर बड़ी संख्या में कार्य अधूरे रहे और सैकड़ों करोड़ रुपये की देनदारियां लंबित रहीं।

कैग ने घर-घर सर्वेक्षण, जॉब कार्डों के अद्यतन, जिला परिप्रेक्ष्य योजनाएं तैयार करने, जागरूकता गतिविधियां बढ़ाने और नियमित रोजगार दिवस आयोजित करने की सिफारिश की है। साथ ही समय पर धनराशि जारी करने, मजदूरी भुगतान में तेजी लाने, बेरोजगारी भत्ते और विलंबित भुगतान के मुआवजे से जुड़े मामलों का निपटारा करने पर जोर दिया गया है।

निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के लिए गुणवत्ता निरीक्षकों, लोकपाल, नागरिक अधिकार-पत्र और सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी बनाने की भी सिफारिश की गई है।

जम्मू-कश्मीर में मनरेगा की अगली कसौटी इसलिए केवल यह नहीं हो सकती कि कितने परिवारों को काम मिला। महत्वपूर्ण यह भी है कि उन्हें कितने दिनों का रोजगार मिला, मजदूरी कितनी जल्दी मिली और जिन परिसंपत्तियों पर पैसा खर्च हुआ, वे कितनी जल्दी पूरी होकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को वास्तविक लाभ दे सकीं।

मनरेगा में 100 दिन के रोजगार तक पहुंच बेहद कम