'अदालतों के ऑब्जर्वेशन और जजमेंट में दिखता है फर्क', CJI की टिप्पणी के बाद महबूबा मुफ्ती ने उठाए सवाल
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने न्यायपालिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अदालती सुनवाई के दौरान की ...और पढ़ें

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती (जागरण फाइल)
HighLights
महबूबा मुफ्ती ने न्यायपालिका के कामकाज पर सवाल उठाए
अदालती टिप्पणियों और अंतिम फैसलों में अंतर बताया
यह टिप्पणी मतदाता सूची पुनरीक्षण के समय आई
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने न्यायपालिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि अदालतों में सुनवाई के दौरान की जाने वाली टिप्पणियां और बाद में आने वाले अंतिम फैसले कई बार एक-दूसरे से काफी अलग होते हैं।
महबूबा की यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग की भूमिका पर चर्चा जारी है।
महबूबा ने यह प्रतिक्रिया भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस टिप्पणी के बाद दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के संशोधित फार्म 6 को मंजूरी नहीं दी है। फार्म 6 मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाला महत्वपूर्ण फॉर्म है।
महबूबा ने एक्स पर किया पोस्ट
सीजेआइ की इस टिप्पणी को लेकर प्रतिक्रिया देते हुए महबूबा ने अपने इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर की गई पोस्ट में न्यायपालिका के कामकाज पर सवाल खड़े किए।
उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक के दौरान न्यायपालिका ने ऐसे कृत्यों को बार-बार सामान्य बना दिया है, जो उनके अनुसार अदालत की अवमानना की श्रेणी में आते हैं।
महबूबा का सबसे बड़ा सवाल अदालत की टिप्पणियों और अंतिम निर्णय के बीच कथित अंतर को लेकर रहा। उनका कहना है कि सुनवाई के दौरान अदालतें कई बार बेहद मजबूत और स्पष्ट टिप्पणियां करती हैं।
इन टिप्पणियों से ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत किसी मुद्दे पर एक खास रुख अपना रही है, लेकिन जब अंतिम फैसला आता है तो उसका रुख उन टिप्पणियों से काफी अलग दिखाई दे सकता है।
ऑब्जर्वेशन और जजमेंट के बीच अंतर: महबूबा मुफ्ती
उनकी टिप्पणी ने न्यायिक प्रक्रिया में ‘ऑब्जर्वेशन’ और ‘जजमेंट’ के बीच अंतर को लेकर एक व्यापक सवाल खड़ा कर दिया है। महबूबा की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मतदाता सूचियों के एसआइआर और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर देशभर में राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है।
ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी ने एक बार फिर अदालत की मौखिक टिप्पणियों, न्यायिक आदेशों और उनके बीच अंतर को लेकर बहस छेड़ दी है।
