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'जम्मू-कश्मीर में पसरी खामोशी सामान्य हालात नहीं, यह डर का नतीजा...', महबूबा मुफ्ती ने केंद्र पर साधा निशाना

Published: Mon, 26 Oct 2026 03:10 PM (IST)

महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर में पसरी खामोशी को डर का नतीजा बताया, न कि सामान्य हालात का संकेत। उन्होंने केंद्र ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर के हालात पर महबूबा की दो टूक। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर के हालात पर महबूबा की दो टूक। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. जम्मू-कश्मीर की खामोशी डर का परिणाम, सामान्य स्थिति नहीं।

  2. केंद्र सरकार पाबंदियों के बजाय राजनीतिक संवाद करे बहाल।

  3. अनुच्छेद 370 हटाने से संवैधानिक अधिकार कमजोर हुए: महबूबा।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में अगर लोग सड़कों पर विरोध नहीं कर रहे, उनकी आवाज पहले जैसी बुलंद नहीं सुनाई दे रही और सार्वजनिक कार्यक्रमों में सन्नाटा पसरा है, तो इसे हालात सामान्य होने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। यह खामोशी डर का नतीजा भी हो सकती है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इन शब्दों के साथ केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक संवाद बहाल करने की मांग की है।

महबूबा ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार लोगों से बातचीत करने के बजाय पाबंदियों, सुरक्षा व्यवस्था और जांच एजेंसियों के सहारे हालात संभालने की कोशिश कर रही है। जम्मू-कश्मीर के लोगों को अब भी संदेह की नजर से देखा जाता है और उन्हें उत्पीड़न तथा अधिकारों पर बंदिशों का सामना करना पड़ रहा है।

80 साल बाद भी दूरियां बरकरार होने का आरोप

एक सभा को संबोधित करते हुए महबूबा ने शेख अब्दुल्ला की हिरासत और उसके बाद हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं का जम्मू-कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों के संबंधों पर गहरा असर पड़ा।

उनका कहना था कि शेख अब्दुल्ला के 1955 में राजनीतिक मुख्यधारा में लौटने और जनमत संग्रह की मांग छोड़ने के बावजूद जम्मू-कश्मीर के लोगों के प्रति संदेह खत्म नहीं हुआ।

उन्होंने कहा कि करीब 80 साल बाद भी यह क्षेत्र मुश्किलों से गुजर रहा है और यहां भारी सैन्य मौजूदगी बनी हुई है। उनके बयान में इस बात पर जोर था कि लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक सवालों का समाधान केवल सुरक्षा उपायों से नहीं निकाला जा सकता।

कश्मीरियों की सुरक्षा और पुलिस कार्रवाई पर सवाल

महबूबा ने केंद्र शासित प्रदेश के बाहर कश्मीरियों पर कथित हमलों की खबरों, खासकर हरियाणा में सामने आए मामलों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने पासपोर्ट संबंधी पाबंदियों, पूर्व आतंकवादियों को पुलिस की ओर से पूछताछ के लिए बुलाए जाने और बार-बार सुरक्षा जांच किए जाने पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने सार्वजनिक सभाओं के आसपास पुलिसकर्मियों की तैनाती पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह लोगों के प्रति अविश्वास को दर्शाता है। उनका आरोप था कि राजनीतिक बातचीत के बजाय जांच एजेंसियों, सुरक्षा बलों और प्रतिबंधों पर निर्भरता बढ़ाई जा रही है।

अनुच्छेद 370 हटाए जाने की आलोचना 

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने की आलोचना करते हुए पीडीपी अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि इस फैसले से जम्मू-कश्मीर के लोगों के संवैधानिक संरक्षण और राजनीतिक अधिकार कमजोर हुए हैं।

लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संवाद की अपील

उन्होंने देश के लोगों से क्षेत्र की परिस्थितियों को समझने और विरोध प्रदर्शनों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगी पाबंदियों को सामान्य स्थिति का प्रमाण न मानने की अपील की।

महबूबा ने कहा कि भाजपा सरकार खामोशी को लोगों की सहमति समझ रही है, जबकि उनके अनुसार यह डर का परिणाम हो सकती है।

पीडीपी प्रधान ने कहा कि उन्हें अब भी देश के लोगों पर भरोसा है। उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों, संवैधानिक सिद्धांतों और सार्थक राजनीतिक संवाद के जरिए जम्मू-कश्मीर की पुरानी चिंताओं का समाधान निकालने की जरूरत बताई।