कश्मीर की झीलों और वेटलैंड्स में उगेगा मखाना, किसानों की बढ़ेगी आमदनी; कमल ककड़ी और सिंघाड़ा को भी बढ़ावा
कश्मीर की झीलों और वेटलैंड्स में मखाना की खेती शुरू करने की तैयारी है, जिसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और नए आजीविका के अवसर पैदा करना है।

HighLights
कश्मीर की झीलों में मखाना खेती से किसानों की आय बढ़ेगी
बांडीपोरा में मखाना उत्पादन पर किसानों को पहला प्रशिक्षण मिला
वेटलैंड्स का वैज्ञानिक उपयोग कर नए आजीविका स्रोत बनेंगे
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कश्मीर की झीलों और वेटलैंड्स को आजीविका के नए अवसरों में बदलने की दिशा में मखाना खेती ने दस्तक दी है।
बिहार में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली इस जलीय फसल की संभावनाओं को अब कश्मीर की स्थानीय परिस्थितियों में परखा जा रहा है।
इसका उद्देश्य केवल एक नई फसल को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि किसानों के लिए आय के वैकल्पिक स्रोत तलाशना और जलीय कृषि के उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग करना है।
इसी दिशा में शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (स्कास्ट-के) के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बांडीपोरा-1 ने मखाना विकास की केंद्रीय क्षेत्र योजना के तहत अपना पहला प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया।
बांदीपोरा के पोतुशाई स्थित केंद्र में आयोजित इस कार्यक्रम में बांदीपोरा और बारामूला के किसानों को मखाना उत्पादन की संभावनाओं, तकनीक और बाजार से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी।
मखाना उत्पादन के लिए उपयुक्त परिस्थितियों की पहचान और स्थानीय स्तर पर इसकी व्यवहार्यता का आकलन इस पहल का अहम हिस्सा है।
केवीके बांडीपोरा-1 ने राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (एनआरसी-मखाना), दरभंगा, बिहार के साथ स्कास्ट-के के समझौता ज्ञापन के बाद जम्मू-कश्मीर में मखाना के परिचय और मूल्यांकन के लिए परीक्षण शुरू किए।
केवीके के प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. तारिक सुल्तान ने किसानों को फसल की स्थापना, प्रबंधन, कटाई, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की तकनीकों के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने कहा कि कमल और सिंघाड़े जैसी जलीय फसलों के साथ मखाना को जोड़कर वेटलैंड्स आधारित आजीविका के नए विकल्प तलाशे जा सकते हैं।
खेत से बाजार तक पूरी शृंखला पर जोर
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और कश्मीर के रखस एवं फार्म विभाग के निदेशक अजब सिंह अजीब ने कहा कि घाटी के आर्द्रभूमि संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग मखाना उत्पादन की संभावनाओं को तलाशने में मदद कर सकता है। उन्होंने फसल विविधीकरण और ग्रामीण आजीविका के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया।
विभाग के सहायक निदेशक फिरोज अहमद शापू ने मखाना को बढ़ावा देने के लिए किसानों के प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय को महत्वपूर्ण बताया।
वैज्ञानिकों डॉ. ताहिर सलीम, डॉ. बिलाल अहमद जरगर और शबनम मुमताज ने किसानों के सवालों के जवाब देते हुए जलीय फसलों की खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी साझा की। किसानों ने रोपण सामग्री, फसल प्रबंधन, कटाई, प्रसंस्करण और विपणन से संबंधित मुद्दे उठाए।
खेतों में चल रहे परीक्षणों से आगे की राह
प्रशिक्षण के व्यावहारिक सत्र में किसानों ने केवीकेे के फार्म का दौरा किया, जहां मखाना, कमल और सिंघाड़े के प्रदर्शन एवं परीक्षण प्लॉट दिखाए गए। वैज्ञानिकों ने स्थानीय परिस्थितियों में इन फसलों की खेती की संभावनाओं और आवश्यक कृषि पद्धतियों की जानकारी दी।
मखाना की राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती पहचान और मूल्य संवर्धित उत्पादों की संभावनाओं के बीच कश्मीर में यह पहल एक महत्वपूर्ण शोध-आधारित प्रयोग है। हालांकि, घाटी में इसकी व्यावसायिक सफलता का आकलन स्थानीय परिस्थितियों में परीक्षणों के नतीजों, उत्पादन क्षमता, प्रसंस्करण सुविधाओं और बाजार तक पहुंच के आधार पर ही किया जा सकेगा।
