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LoC पर सायरन की जगह बजा स्मार्ट बोर्ड का अलार्म, बदली कुपवाड़ा के स्कूलों की तस्वीर

Published: Wed, 23 Sep 2026 11:02 AM (IST)

नियंत्रण रेखा से सटे कुपवाड़ा और उड़ी के स्कूलों में अब बच्चों का बचपन बंकरों की बजाय स्मार्ट बोर्ड और रोबोटिक्स लैब में संवर रहा है।

LoC पर सायरन की जगह बजा स्मार्ट बोर्ड का अलार्म।

LoC पर सायरन की जगह बजा स्मार्ट बोर्ड का अलार्म।

HighLights

  1. कुपवाड़ा-उड़ी के LoC स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड, रोबोटिक्स लैब

  2. 2021 संघर्ष विराम के बाद शिक्षा में बड़ा बदलाव आया

  3. बच्चों के लिए खेल लीग, डिजिटल लर्निंग के अवसर बढ़े

राहुल शर्मा, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) से सटे कुपवाड़ा और उड़ी के सीमावर्ती इलाकों की तस्वीर अब पूरी तरह बदल चुकी है। कभी गोलियों की तड़तड़ाहट और सायरन की आवाज सुनते ही मासूमों का बचपन बंकरों में सिमट जाता था, लेकिन आज उन्हीं स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड और रोबोटिक्स लैब के जरिए बच्चों का भविष्य संवर रहा है। 

कभी यहां स्कूल की घंटी से अधिक अहम सायरन की आवाज होती थी

सायरन बजते ही शिक्षक बच्चों को साथ लेकर बंकर में छिप जाता था। कक्षा की जगह कुछ देर के लिए अंधेरा सुरक्षित ठिकाना बन जाता था। आज उसी सीमावर्ती क्षेत्र के कई स्कूलों में बच्चे स्मार्ट बोर्ड पर विज्ञान के प्रयोग देखते हैं, इंटरनेट से दुनिया की कक्षाओं से जुड़ते हैं और लंच ब्रेक में फुटबाल के मैदान में दौड़ते हैं।

कुपवाड़ा के करनाह, उड़ी के चुरंडा में नियंत्रण रेखा से सटे इलाकों की यह तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, स्कूलों में अब भी सुरक्षा ड्रिल होती है और बंकरों का निरीक्षण किया जाता है, लेकिन पढ़ाई का केंद्र अब बंकर नहीं, क्लासरूम और डिजिटल स्क्रीन बन रहे हैं।

5601 बार टूटी थी पढ़ाई की लय

उड़ी के एक सरकारी स्कूल के वरिष्ठ शिक्षक बताते हैं कि 2022-23 तक हालत ये थे कि फायरिंग शुरू होते ही हम बच्चों को लेकर स्कूल के बंकर में चले जाते थे। पहले पढ़ाई क्यों रुकती थी, इसके आंकड़े गवाही देते हैं।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार 30 नवंबर 2019 से 29 नवंबर 2021 के बीच एलओसी पर 5601 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ। एक समय तो पुंछ के बालाकोट जोन में 84 और राजौरी के नौशहरा में एक दिन में 71 स्कूल बंद हुए।

उड़ी नियंत्रण रेखा से सटे गांव चुरंडा गांव की छात्रा आफिया नाज ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि गोलाबारी के दौरान भी वे बंकर में पढ़ाई जारी रखते थे।

फिर आया 25 फरवरी 2021, जब भारत-पाकिस्तान की सेनाओं ने 2003 के संघर्ष विराम के समझौते को सख्ती से मानने का संयुक्त बयान जारी किया। 24-25 फरवरी की आधी रात से एलओसी और सभी सेक्टरों पर फायरिंग बंद। यहीं से बार्डर के गांवों की जिंदगी ने करवट ली।

अब ब्लैकबोर्ड से स्मार्ट बोर्ड तक

26 जुलाई 2024 को पुंछ के नियंत्रण रेखा के पास नकड़कोट के सरकारी मिडिल स्कूल में भारतीय सेना और ई-विद्यालयों एनजीओ ने डिजिटल क्लासरूम शुरू किया। यहां एलईडी मानिटर और वाई-फाई लगाया गया तथा 10 से 15 वर्ष के बच्चों को आनलाइन पढ़ाने की व्यवस्था की गई।

कुपवाड़ा में भी बदलाव का पैमाना बड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार 259 सरकारी स्कूलों में करीब 330 स्मार्ट बोर्ड और पांच रोबोटिक्स लैब लगाने की पहल हुई। पूरे जम्मू-कश्मीर में यूडीआइएसई (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फारमेशन सिस्टम फार एजुकेशन) 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार 24,228 स्कूल हैं।

वहीं, आर्मी गुडविल स्कूल के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सेना के 45 गुडविल स्कूलों में करीब 17000 विद्यार्थी पढ़ते हैं, जिनमें लगभग 43 प्रतिशत लड़कियां हैं। इन स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल लर्निंग, एआइ और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों पर भी जोर दिया जा रहा है।

अब सायरन नहीं, स्क्रीन है चुनौती

बार्डर के स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था खत्म नहीं हुई है। उड़ी और करनाह जैसे इलाकों में बच्चों को आपात स्थिति में सुरक्षित स्थान तक पहुंचने की नियमित ड्रिल कराई जाती है। उड़ी के सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य मोहम्मद हनीफ ने बताया कि ऐसी ड्रिल इसलिए जरूरी है ताकि बच्चों को आपात स्थिति में पता हो कि कहां जाना है और कैसे सुरक्षित रहना है।

यानी आज की तस्वीर सिर्फ यह नहीं कि बंकर खाली हो गए हैं बल्कि यह है कि सुरक्षा और पढ़ाई दोनों साथ चल रहे हैं। अब उड़ी, कुपवाड़ा के कई बार्डर सरकारी स्कूलों में उसी पैटर्न पर स्मार्ट बोर्ड लगे हैं। एनसीईआरटी की रिपोर्ट कहती है कि पहले आइसीटी इंफ्रास्ट्रक्चर और इंटरनेट ही सबसे बड़ी रुकावट थी। अब वही रुकावट दूर हो रही है।

उड़ी के सरकारी हाई स्कूल की विज्ञान शिक्षिका रफिया बेगम कहती हैं कि अब काफी शांति है। अलर्ट की जगह अटेंडेंस का बटन बजता है। पिछले महीने हमने यूट्यूब पर इसरो का राकेट लान्च लाइव दिखाया, बच्चे उछल पड़े, बोले-मैडम हम भी जाएंगे। वहीं कक्षा 8 का फैसल, जो पहले बंकर में पहाड़ा याद करता था, अब स्मार्ट बोर्ड पर सौरमंडल घुमाता है।

उसका कहना था कि पहले लगता था स्कूल कभी भी बंद हो जाएगा। अब कंप्यूटर पर टाइप करना सीख रहा हूं। एक अन्य छात्र का कहना है कि पहले मैडम कहती थीं, आवाज आए तो बस्ता छोड़ो, बंकर में जाओ। अब मैडम कहती हैं, आवाज आए तो हेडफोन लगाओ, नासा का वीडियो सुनो।

स्कूल का मतलब अब सिर्फ सुरक्षा नहीं

पहले नियंत्रण रेखा से सटे इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल होता था कि अगर गोलाबारी शुरू हुई तो बच्चा स्कूल में सुरक्षित रहेगा या नहीं? जिला कुपवाड़ा के करनाह सेक्टर में नियंत्रण रेखा से सटे सिमारी गांव के रहने वाले मोहम्मद इकबाल ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि वर्ष 2020 में वे गोलाबारी शुरू होते ही अपने बच्चों को स्कूल से लेने के लिए भागते थे।

कई बार लोग घायल हुए। आज माता-पिता की चिंता में पढ़ाई और भविष्य भी शामिल हो रहा है। सीमा से सटे इन इलाकों के बच्चे सामान्य स्कूल, खेल और तकनीक से जुड़ सकें, यह बदलाव परिवारों के लिए सुरक्षा के साथ अवसर का भी बदलाव है। दूसरा बदलाव मैदान में है। पिछले दो वर्षों में ही आपरेशन सद्भावना के तहत सेना ने कुपवाड़ा प्रीमियर फुटबाल लीग, बारामुला गर्ल्स बैडमिंटन लीग, गिंगल वालीबाल लीग जैसे टूर्नामेंट शुरू किए।

कुपवाड़ा में टैलेंट देखकर बच्चों को फुटबाल कप के जरिए चुना जाता है और क्षमता निर्माण टूर पर देश के बड़े शहरों में भेजा जाता है। करीब चार माह पहले बारामुला में जून 2026 में बीएसएफ और साई ने खेलो इंडिया के तहत स्पंदन लीग कराई जिसमें नार्थ कश्मीर के गांवों से आए लड़के-लड़कियों की आठ टीमों के 32 मैच करवाए गए।

जहां कभी टिफिन बंकर में खाया जाता था, वहीं अब लंच ब्रेक में फुटबाल की प्रैक्टिस होती है। यही नहीं शाम होते ही जिस गांव में कर्फ्यू जैसा सन्नाटा होता था, अब वहां फ्लड लाइट में फुटबाल की प्रैक्टिस होती है। करगिल के एक कोच बताते हैं कि अकादमी में अब लड़कियां भी आ रही हैं, जो दो वर्ष पहले घर से निकलने से डरती थीं।