700 साल पुरानी खानकाह से साधु गंगा तक… कुपवाड़ा के 102 विरासत स्थलों की खुली कहानी, 16 के संरक्षण की तैयारी
जम्मू-कश्मीर सरकार ने कुपवाड़ा जिले में 102 ऐतिहासिक, पुरातात्विक और आध्यात्मिक विरासत स्थलों का सर्वेक्षण किया है, जिनमें से 16 को संरक्षण के लिए चिन्हित किया गया है।

कुपवाड़ा के 102 विरासत स्थलों के सर्वेक्षण, संरक्षण की तैयारी। (फाइल फोटो)
HighLights
कुपवाड़ा में 102 विरासत स्थलों का सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण हुआ।
16 स्थलों को संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए चिन्हित किया गया।
461 दुर्लभ पांडुलिपियों का भी सर्वेक्षण किया गया।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कुपवाड़ा को अक्सर पहाड़ों, झीलों और खूबसूरत वादियों के लिए याद किया जाता है, लेकिन इसकी मिट्टी में सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती ही नहीं, बल्कि सदियों पुराना इतिहास भी दफन है। अब सरकार के एक सर्वे ने इस छिपी विरासत की तस्वीर सामने रखी है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने कुपवाड़ा जिले में 102 ऐतिहासिक, पुरातात्विक, स्थापत्य और आध्यात्मिक विरासत स्थलों का सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण किया है। इनमें से 16 स्थलों को संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए चिन्हित किया गया है।
जम्मू-कश्मीर संस्कृति विभाग ने यह जानकारी देते हुए बताया कि इन 102 स्थलों की सूची में कई ऐसी धरोहरें हैं, जिनकी कहानी कश्मीर के लंबे सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ी है।
धार्मिक स्थलों से जुड़ी कुपवाड़ा की पहचान
मावर के शाह नगरी में करीब 700 साल पुरानी भूमिगत खानकाह, यारू में हजरत अरना साहिब की दरगाह, कंडी का साधु गंगा अस्थापन, वाहीपोरा में हजरत हाजी बहराम (आरए) की दरगाह और हिररी में कादिर साहिब क्रालट से जुड़ी ऐतिहासिक लकड़ी की मस्जिद इस विरासत का हिस्सा हैं।
कुपवाड़ा की विरासत केवल पत्थरों और पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं है। इसमें धार्मिक परंपराएं, स्थापत्य कला, स्थानीय स्मृतियां और सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही सांस्कृतिक पहचान भी शामिल है।
पांडुलिपियों में भी छिपा है इतिहास
सरकार ने ज्ञान भारतम कार्यक्रम के तहत कुपवाड़ा में 461 पांडुलिपियों का भी सर्वेक्षण किया। इनमें गमरियाल से मिली 40 पुरानी हस्तलिखित फारसी पांडुलिपियां खास महत्व रखती हैं। ये दस्तावेज उस दौर की भाषा, ज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आया है। पिछले चार वर्षों में कुपवाड़ा जिले के किसी भी विरासत स्थल को जम्मू-कश्मीर प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1977 के तहत राज्य संरक्षित स्मारक या स्थल घोषित नहीं किया गया है।
102 धरोहरों की पहचान के बाद अब संरक्षण की बारी
सरकार के अनुसार 16 चिन्हित स्थलों पर संरक्षण का काम संसाधनों और बजट की उपलब्धता के आधार पर चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। साथ ही संरक्षण को वैज्ञानिक आधार देने के लिए इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आइयूएसटी) और श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी (एसएमवीडीयू) के विशेषज्ञों की मदद लेने के लिए समझौता ज्ञापन की प्रक्रिया भी चल रही है।
सरकार ने बताया कि विरासत स्थलों को जम्मू-कश्मीर में वास्तुकला और विरासत के पुनरुद्धार, संरक्षण और परिरक्षण की योजना के तहत चरणबद्ध तरीके से लिया जा रहा है। ऐसे में अब चुनौती सिर्फ इन 102 स्थलों को सूचीबद्ध करने की नहीं, बल्कि उनकी पहचान को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की है।
