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कश्मीर में धान छोड़ बागवानी की ओर मुड़े किसान, कमाई 10 गुना तक बढ़ी; सेब के साथ नाशपाती-अखरोट की खेती में भी तेजी

Published: Thu, 15 Oct 2026 01:38 PM (IST)

कश्मीर में किसान धान की पारंपरिक खेती छोड़कर बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो ...और पढ़ें

कश्मीर में दो दशक में सेब के बागों का रकबा 60% बढ़ा। (फाइल फोटो)

कश्मीर में दो दशक में सेब के बागों का रकबा 60% बढ़ा। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. किसान धान छोड़ बागवानी अपना रहे, आय बढ़ी।

  2. सेब, अखरोट, आलूबुखारा का रकबा तेजी से बढ़ा।

  3. धान का रकबा घटने से खाद्य सुरक्षा चिंता।

नवीन नवाज, गुंडीबाग/पुलवामा। धान की कटाई के बीच खेत में खड़े शाहिद की निगाहें फसल पर थीं, लेकिन उसके सपने खेत की मेड़ों से आगे निकल चुके थे। दुबई से लौटे शाहिद ने अपने पिता हाजी अब्दुल कबीर से कहा कि धान की खेती में मेहनत बहुत है, समय पर मजदूर नहीं मिलते और लागत निकालने के बाद मुनाफा भी सीमित रह जाता है। परिवार में खेती संभालने वाला कोई दूसरा सदस्य भी नहीं है। ऐसे में क्यों न खेत में सेब या आलूबुखारा का बाग लगाया जाए? बागवानी विभाग से सब्सिडी भी मिल सकती है।

हाजी अब्दुल कबीर ने पहले बेटे की बात चुपचाप सुनी, फिर सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, 'तुम सही कह रहे हो। लागत निकालकर देखें तो धान की खेती अब पहले जैसी मुनाफे वाली नहीं रही। बाग लगाने का विचार ठीक है।'

यह संवाद केवल एक परिवार की बदलती सोच नहीं, बल्कि कश्मीर के कृषि परिदृश्य में आ रहे बड़े बदलाव की तस्वीर है। घाटी में किसान अब पारंपरिक धान की खेती से आगे बढ़कर सेब, अखरोट, नाशपाती और आलूबुखारा जैसे फलों के बागों की ओर रुख कर रहे हैं। उनके लिए खेती अब केवल उपज पैदा करने का जरिया नहीं, बल्कि सीमित जमीन से अधिक आमदनी हासिल करने और कृषि आधारित कारोबार खड़ा करने का अवसर भी बन रही है।

धान के खेतों से बागवानी की ओर बढ़ रहा रुझान

कभी कश्मीर में खेती और बागवानी के क्षेत्र स्पष्ट रूप से बंटे हुए नजर आते थे। करेवा की ऊंची, अपेक्षाकृत समतल पहाड़ियों पर बागवानी होती थी, जबकि निचले और समतल खेत धान की खेती के लिए इस्तेमाल किए जाते थे। अब यह पारंपरिक विभाजन धीरे-धीरे बदल रहा है।

बेहतर बाजार मूल्य, आधुनिक बागवानी तकनीक, सड़कों के विस्तार और परिवहन सुविधाओं ने किसानों को फसल चयन पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया है।

बागवानी में कमाई की उम्मीद

शाहिद का मानना है कि फलदार बाग एक बार स्थापित हो जाए तो लंबे समय तक आमदनी का आधार बन सकता है। उसके अनुसार, 'सेब या दूसरे फलों का अच्छा दाम मिले तो लागत निकालने के बाद भी कमाई की गुंजाइश रहती है। अब सड़क और रेल संपर्क बेहतर हुआ है।

फल दूसरे राज्यों के बाजारों तक पहुंचाना पहले की तुलना में आसान हो सकता है। आगे चलकर मौका मिला तो मैं सेब और आलूबुखारा प्रसंस्करण की फैक्टरी भी शुरू करना चाहूंगा।'

यही सोच कश्मीर की खेती को उत्पादन से आगे बढ़ाकर प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और ग्रामीण उद्यमिता से जोड़ने की संभावनाएं खोल रही है।

दो दशक में सेब के बागों का रकबा 60 प्रतिशत बढ़ा

सरकारी आंकड़े इस बदलाव की व्यापकता को रेखांकित करते हैं। जम्मू-कश्मीर में सेब के बागों का क्षेत्रफल वर्ष 2004-05 में 1,07,930 हेक्टेयर था, जो 2024-25 में बढ़कर 1,73,073 हेक्टेयर हो गया। इस तरह दो दशकों में इसमें लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

अखरोट के बागों का रकबा भी इसी अवधि में 74,890 हेक्टेयर से बढ़कर 86,380 हेक्टेयर पहुंच गया। नाशपाती की खेती का क्षेत्रफल वर्ष 2004-05 के 10,540 हेक्टेयर से बढ़कर 2022-23 में 14,320 हेक्टेयर हो गया। इस दौरान इसका उत्पादन 40,250 टन से बढ़कर 90,500 टन दर्ज किया गया।

आलूबुखारा की खेती में भी विस्तार हुआ। इसका रकबा 3,390 से बढ़कर 4,640 हेक्टेयर पहुंच गया, जबकि उत्पादन 3,710 टन से बढ़कर 17,700 टन हो गया।

ये आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर की बागवानी अब केवल सेब पर निर्भर नहीं रह गई है। अखरोट, नाशपाती और आलूबुखारा जैसे फलों का बढ़ता दायरा फसल विविधीकरण के साथ किसानों के लिए आय के नए विकल्प तैयार कर रहा है।

धान के मुकाबले बागवानी में ज्यादा कमाई का आकर्षण

किसानों के इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण आमदनी का अंतर है। बडगाम के खंदा क्षेत्र के किसान गुलजार अहमद बताते हैं कि नौ कनाल जमीन पर धान की खेती से सालाना लगभग 30 से 50 हजार रुपये की आमदनी होती थी। करीब छह वर्ष पहले उन्होंने हाई डेनसिटी सेब का बाग लगाया। अब उनके अनुसार, एक मौसम में इससे लगभग पांच लाख रुपये की कमाई हो रही है।

ऐसे उदाहरण किसानों को पारंपरिक फसलों के विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सीमित जोत वाले किसान विशेष रूप से ऐसी फसलें अपनाना चाहते हैं, जिनसे प्रति इकाई जमीन अधिक आर्थिक लाभ मिलने की संभावना हो।

बागवानी विभाग के मार्केटिंग एंड प्लानिंग विंग के संयुक्त निदेशक एयाज नतनू के अनुसार, बढ़ती लागत, श्रमिकों की उपलब्धता और पारंपरिक फसलों से सीमित आमदनी किसानों के फसल चयन को प्रभावित कर रही है। किसान अपनी जमीन से अधिक आर्थिक लाभ हासिल करने के लिए बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं।

हालांकि, बागवानी से होने वाली कमाई हर वर्ष एक जैसी नहीं रहती। सेब और अन्य फलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव, ओलावृष्टि, बीमारियां, मौसम में बदलाव और बाजार तक पहुंच की समस्याएं किसानों के मुनाफे को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए बेहतर पौध सामग्री, वैज्ञानिक देखभाल, फसल बीमा, भंडारण और बाजार व्यवस्था का महत्व भी बढ़ जाता है।

एचएडीपी से बागवानी को आधुनिक बनाने की कोशिश

जम्मू-कश्मीर सरकार का होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम (एचएडीपी) कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इसके तहत आधुनिक कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक बागवानी, उत्पादन की गुणवत्ता, मूल्य संवर्धन और कृषि आधारित उद्यमों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है।

इस तरह की पहलों से किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक उत्पादन प्रणालियां अपनाने और अपनी उपज को बाजार की जरूरतों के अनुरूप तैयार करने के अवसर मिल सकते हैं। बागवानी क्षेत्र में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। फलों की छंटाई, ग्रेडिंग, पैकिंग, भंडारण और समय पर बाजार तक पहुंच भी किसानों की वास्तविक कमाई तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कश्मीर में सेब, अखरोट, नाशपाती और अन्य फलों का बड़ा उत्पादन कृषि आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल का आधार उपलब्ध कराता है। फल प्रसंस्करण, जूस, पल्प, जैम, सूखे फलों की पैकिंग और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों से जुड़े उद्योग विकसित होने पर किसानों को अपनी उपज के बेहतर मूल्य हासिल करने के अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। फलों की पैकिंग, ग्रेडिंग, परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण में स्थानीय युवाओं के लिए काम की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। शाहिद जैसे युवाओं का बागवानी से आगे बढ़कर प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने का सपना इसी व्यापक आर्थिक बदलाव की ओर संकेत करता है।

नौ वर्षों में धान का रकबा 15 प्रतिशत घटा

बागवानी का विस्तार जहां किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं पैदा कर रहा है, वहीं धान की खेती का घटता क्षेत्रफल कृषि नीति के सामने एक अहम सवाल भी खड़ा कर रहा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में धान का रकबा वर्ष 2015-16 में 3,04,500 हेक्टेयर था, जो 2024-25 में घटकर 2,58,840 हेक्टेयर रह गया। इस अवधि में 45,660 हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई, जो लगभग 15 प्रतिशत है।

दक्षिण कश्मीर के कुलगाम और पुलवामा जिलों में बागवानी का बढ़ता प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वर्ष 2024-25 में कुलगाम में सेब के बाग 18,255 हेक्टेयर में फैले थे, जबकि धान की खेती 6,951 हेक्टेयर में हुई। पुलवामा में सेब के बागों का क्षेत्रफल 15,928 हेक्टेयर और धान का रकबा 10,990 हेक्टेयर दर्ज किया गया।

हालांकि, धान के रकबे में कमी के पीछे केवल बागवानी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कृषि वैज्ञानिक डॉ. संदीप साहनी के अनुसार, आवासीय कॉलोनियों, सड़कों और बुनियादी ढांचे के विस्तार ने भी कृषि भूमि के इस्तेमाल को प्रभावित किया है।

धान की खेती को अधिक उत्पादक और कम खर्चीला बनाने के लिए वैज्ञानिक भी नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक उन्नत, रोग प्रतिरोधी और जलवायु अनुकूल धान की किस्में विकसित कर रहे हैं। कुछ किस्मों की संभावित उपज 12 टन प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। वहीं, धान की सीधी बिजाई जैसी तकनीकें पानी, श्रम और लागत बचाने में मदद कर सकती हैं।

दो वर्षों में बाहरी राज्यों से चावल की आपूर्ति 30 प्रतिशत बढ़ी

धान की खेती का क्षेत्रफल घटने के साथ जम्मू-कश्मीर में बाहरी राज्यों से आने वाले चावल की आपूर्ति भी बढ़ी है। खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022-23 में बाहरी राज्यों से चावल की आपूर्ति 3.74 लाख टन थी, जो 2024-25 में बढ़कर 4.86 लाख टन हो गई। दो वर्षों में इसमें करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

वर्ष 2024-25 में जम्मू-कश्मीर का चावल उत्पादन लगभग 6.5 लाख टन रहा। कृषि विशेषज्ञों के अनुमानों के अनुसार, यह क्षेत्र की कुल जरूरत का करीब 50 से 55 प्रतिशत है। शेष जरूरत मुख्य रूप से पंजाब और अन्य राज्यों से आने वाले चावल से पूरी होती है।

कश्मीर विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के सह-प्राध्यापक जावेद इकबाल खान के अनुसार, व्यक्तिगत स्तर पर किसान के लिए अधिक लाभ देने वाली फसल अपनाना आर्थिक रूप से उचित हो सकता है, लेकिन सामूहिक रूप से धान की खेती छोड़ने का असर क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। धान की जमीन पर एक बार स्थायी फलदार बाग स्थापित हो जाने के बाद उसे दोबारा धान की खेती के लिए तैयार करना भी कठिन हो सकता है।

यह स्थिति नीति निर्माताओं के सामने संतुलन बनाने की चुनौती पेश करती है। किसानों की आमदनी बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ खाद्यान्न उत्पादन और उपयुक्त कृषि भूमि का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आमदनी भी बढ़े, खाद्य सुरक्षा भी बनी रहे

कृषि मंत्री जावेद अहमद डार के अनुसार, सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने और खाद्यान्न उत्पादन बनाए रखने के लिए उपयुक्त धान भूमि के संरक्षण, आधुनिक सिंचाई, उन्नत बीज और फल प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है। इसी दिशा में कृषि एवं बागवानी नीतियों में सुधार और एचएडीपी जैसी योजनाओं के माध्यम से कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।