राज्य ब्यूरो : तुलमुला (गादरबल)। यह मेला है आपके लिए। हमारे लिए यह हमारी पंरपरा, हमारी पहचान और जड़ों से उखड़े हम लोगों को फिर से जड़ें मजबूत करने की जमीन देने वाला पर्व है। इसलिए मैं हर साल पुणे से यहा आता हूं. मंदिर परिसर में खड़े मक्खन लाल भट्ट ने कहा। उन्होंने कहा कि आज का दिन हमारे लिए बहुत ही पवित्र है। आज हम कश्मीरी पंडितों की आराध्य देवी मा राघेन्या की वार्षिक पूजा के लिए यहा एकत्रित हुए हैं। सिर्फ मैंने ही नहीं, यहा जो भी आपको कश्मीरी पंडित मिलेगा, वह यही कहेगा हम मा क्षीर भवानी से कश्मीर में अपनी वापसी की प्रार्थना कर रहे हैं, कश्मीर में शाति व खुशहाली चाहते हैं। बस यह प्रार्थना कबूल हो जाए। मक्खन लाल और जैसे हजारों विस्थापित कश्मीरी पंडित श्रीनगर से करीब 25 किलोमीटर दूर तुलमुला में मा क्षीर भवानी, जन्हें कश्मीरी पंडित मा राघेन्या के नाम भी संबोधित करते हैं, के मंदिर में पहुंचे हैं। शुक्ल पक्ष की ज्येष्ठ अष्टमी पर हर साल यहां पूजा का विधान है। इसे क्षीर भवानी का मेला भी कहा जाता है। तुलमुला गाव को क्षीर भवानी के नाम से जाना जाता है। हिंदू वेलफेयर सोसाइटी के चुन्नी लाल ने कहा कि यहा 99 प्रतिशत विस्थापित कश्मीरी पंडित ही हैं। मेरे जैसे एक प्रतिशत ही कश्मीरी पंडित आपको ऐसे मिलेंगे जिन्होंने पलायन नहीं किया है। मैं हर साल इस दिन का इंतजार करता हूं। क्योंकि मेरे कई रिश्तेदार और दोस्त जो यहा से पलायन कर चुके हैं, मा राघेन्या की पूजा के लिए आते हैं। हमारे कई मुस्लिम दोस्त और पड़ोसी भी इसी उम्मीद में आज के दिन इसलिए मौजूद रहते हैं कि चलो कोई बचपन का साथी मिल जाए। खैर, बीते 30 सालों के दौरान यह मंदिर और ज्येष्ठ अष्टमी का मेला ही अब हमारी पहचान बन गया है। यह हमारी सनातन धार्मिक और सास्कृतिक पहचान है। चुन्नी लाल और मक्खन लाल ने जो कहा वह चिनार के झुरमुट के बीच जलकुंड में स्थित सफेद संगमरमर से बने मा भवानी के मंदिर के समक्ष पूजा की थाली लिए, जलकुंड में दूध और क्षीर का प्रसाद अर्पित करते देश विदेश से आए कश्मीरी पंडितों के चेहरों पर साफ पड़ा जा सकता था। वर्ष 1990 तक क्षीर भवानी के मेला कश्मीरी पडितों का प्रमुख धामिक आयोजन होता रहा, लेकिन 1990 में धर्माध आतंकवाद के कश्मीर में पैर पसारने के साथ जिस तरह से यहा से कश्मीरी पंडितों को पलायन करना पड़ा, उससे यह मेला भी प्रभावित हुआ। शुरू के एक दो साल तक ऐसा लगा कि मा राघेन्या को मानने वाले अब यहा नहीं आएंगे, लेकिन हालात में धीरे धीरे बदलाव आया और यहां आने वालों की तादाद बढ़ती गई। अंधेरे में खाली हाथ निकले थे घर से अक्षय कौल ने कहा कि बेशक हमारी कश्मीर में वापसी नहीं हो पायी है, लेकिन हालात इतने बदल गए हैं हम यहा बेखौफ होकर मेले में घूम रहे हैं। हम श्रीनगर में रैनावाड़ी में अपने पुश्तैनी घर भी गए। घर वीरान और खंडहर हो गया है। मेरी मा को भी डर नहीं लगा। मुझे याद है जब हम यहा से निकले थे तो मैं उस समय 12वीं का छात्र था। हम रात के अंधेरे में चुपचाप खाली हाथ निकले थे। कश्मीरी मुस्लिम भी रहे मौजूद मेले में सिर्फ कश्मीरी पंडित ही नहीं, कश्मीरी मुस्लिम भी खूब नजर आए। दोनों ही समुदायों के कई लोग मेले की भीड़ में अपने पुराने दोस्तों को खोज रहे थे। कई पुराने दोस्तों से मिलकर खुश थे तो कई बचपन के साथियों को न देख पाने के गम से निराश। अख्तर हुसैन ने कहा कि मेरा दोस्त जम्मू सुरेंद्र कौल जम्मू के मुट्ठी में रहता है। उसने मुझे कहा था कि वह इस बार मेले में आएगा, लेकिन उसने झूठ बोला है, वह नहीं आया। उसकी बहन बिंटी जी अपनी बहू और बेटे के साथ आई है। उसने मुझे सुनाया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं थी। बिंटी जी और उसका परिवार मेरे साथ आज मेरे घर जाएगा। वह यहा धर्मशाला में क्यों रुकेगी, जब उसका भाई यहा रहता है। दूरसंचार विभाग से रिटायर हुए शुबन जी ने कहा कि आप तो हर साल मुझे यहीं मिलते हैं, आपको तो पता ही है। इस साल भी मैं अपनी पत्‍‌नी और बच्चों के साथ ही आया हूं। हम तो बीते एक सप्ताह से श्रीनगर में थे। यहा आकर मुझे मेरे वजूद का अहसास होता है, अन्यथा दिल्ली की भीड़ में मैं अकेला महसूस करता हूं। यह मेला नहीं है, हमारे लिए यह हमारी जड़ और हमारा वजूद है। संस्कृति से जोड़ता है मेला दिल्ली से आए अजय भट्ट और उनकी पत्नी नीतू ने कहा कि यह मेला हमें संस्कृति से जोड़ता है। हम कौन हैं, यह मेला हमें बताता है। मेरे दोनों बेटों ने अंतरजातीय विवाह किया है। मेरी एक बहू पंजाबी है और एक सिंधी। दोनों को साथ लेकर आयी हूं ताकि वह हम कश्मीरी पंडितों की संस्कृति को समझ सकें। मंदिर परिसर में कश्मीरी पंडितों के एक समूह से हटकर अलग बैठी बुजुगरें की मंडली में शामिल बंसी कौल ने कहा कि जलकुंड का रंग अब हमें उम्मीद देता है कि यहा सबकुछ ठीक हो जाएगा। जलकुंड का जल का अब धीरे धीरे पूरी तरह साफ और निर्मल होता जा रहा है, यहा किसी के चेहरे पर कोई डर का भाव नहीं है। यह है मान्यता दंत कथाओं के अनुसार खीर भवानी माता जिसे शामा नाम से जाना जाता था, श्रीलंका में विराजमान थीं। वह वैष्णवी प्रवृत्ति की थी, लेकिन राक्षसों की प्रवृत्ति से वह नाराज हो गईं और वहा भगवान श्रीराम के आगमन पर मा ने हनुमान को आदेश दिया कि वह उन्हें सतीसर (जिसे कश्मीर भूमि कहा जाता है) में ले जाएं। इस पर हनुमान मा को 360 नागों के साथ श्रीनगर ले आए। इस दौरान मा जहा जहा रुकीं वहा उनकी स्थापना हुई। कश्मीर में गादरबल जिला के तुलमुला क्षेत्र में मा खीर भवानी का प्रमुख मंदिर है। इस मंदिर की महाराजा प्रताप सिंह ने स्थापना की। मंदिर के कुंड के पानी की खासियत है कि संसार में जब भी कुछ घटता है तो कुंड के पानी का रंग बदल जाता है। यहा कई दिन मा के मेले का आयोजन होता है। राज्यपाल मलिक से लेकर राममाधव तक पहुंचे मा के दरबार मां क्षीर भवानी के दर्शन के लिए राज्यपाल सत्यपाल मलिक, चिनार कोर के कमाडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लो, सासद डॉ. फारूक अब्दुल्ला, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राममाधव, प्रदेश काग्रेस प्रमुख जीए मीर, जम्मू कश्मीर पीपुलस मूवमेंट के अध्यक्ष डॉ. शाह फैसल भी पहुंचे। राज्यपाल ने कहा कि मैं यहा आने वाले सभी लोगों को मुबारक देता हूं। यहां शांति और लोगों में भाईचारा बना रहे। मैं यहा पहली बार आया हूं। मैंने देखा कि यहा सिर्फ कश्मीरी पंडित ही नहीं कश्मीर मुस्लिम भी मा क्षीर भवानी में आस्था रखते हैं। यही तो हिंदोस्तान की पंरपरा और खूबसूरती है। लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि यह मेला कश्मीरियत की एक मिसाल है। राम माधव ने कहा कि मैंने मा क्षीर भवानी से कश्मीरी पंडितों की जल्द वापसी की प्रार्थना की है। फारूक ने मुझे पूरी उम्मीद है कि ईश्वर जल्द ही कश्मीरी पंडितों को वापस यहां भेजेगा। यहा हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई का इत्तेहाद और भाईचारा बना रहे, यही हमारी परंपरा और तहजीब है।

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