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बुमरो-बुमरो से रबाब तक... फिल्म फेस्टिवल में कश्मीरी संगीत ने लूटी महफिल, देश-विदेश के मेहमान हुए मंत्रमुग्ध

Published: Thu, 10 Sep 2026 04:32 PM (GMT+05:30)

श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कश्मीरी पारंपरिक संगीत ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इसके मधुर धुन और ...और पढ़ें

फिल्म फेस्टिवल में लोक संगीत ने जीता सबका दिल। (फोटो- साहिल मीर /जागरण)

फिल्म फेस्टिवल में लोक संगीत ने जीता सबका दिल (फोटो- साहिल मीर /जागरण) 

HighLights

  1. कश्मीरी संगीत ने श्रीनगर फिल्म महोत्सव में सबका दिल जीता।

  2. पारंपरिक वाद्ययंत्रों और धुनों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

  3. घाटी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया गया।

रजिया नूर, श्रीनगर। कश्मीर की तरह यहां का पारंपरिक संगीत कितना मनभावना है इसका अंदाजा बुमरो-बुमरो शाम रंग बुमरो, रिंदपोशमाल गिंदने द्राये लो लो जैसे हिट बालीवुड़ नम्बरों को सुन कर बखूबी हो जाता है।नुट, तुमबकनाइर, नय, संतूर, रबाब, पियानो जैसे वाद्य यंत्रों से निकलने वाला सुरीला और मंत्रमुग्ध कर देने वाला कश्मीरी संगीत हर संगीत प्रेमी को थिरकने पर मजबूर कर ही देता है। 

इसी संगीत के माध्यम से श्रीनगर में आयोजित हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भले ही फ़िल्में मुख्य आकर्षण रही हों, लेकिन यहां के सदाबहार लोक संगीत ने सबका दिल जीत लिया और फ़िल्मनर्माताओंं, कलाकारों और महोत्सव में शामिल लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

पारंपरिक संगीत की दिल को छू लेने वाली प्रस्तुति ने दर्शकों को घाटी के समृद्ध सांस्कृतिक अतीत की सैर कराई और सदियों पुरानी कविता, आध्यात्मिकता, लोक परंपराओं और संगीत की अभिव्यक्ति से बनी विरासत को जीवंत कर दिया।

कश्मीरी संगीत की धुनों में खोए देश-विदेश के मेहमान

अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय फ़िल्मनिर्माताओं, गायकों और फ़िल्म जगत के अन्य सदस्य कश्मीरी लोक संगीत की अनोखी धुन और प्रस्तुति के दौरान इस्तेमाल किए गए पारंपरिक वाद्ययंत्रों से मंत्रमुग्ध हो गए। बाहर से आए कई मेहमानों के लिए, यह प्रस्तुति घाटी को उसके मशहूर पहाड़ों, झीलों और नज़ारों से परे जानने का अनोखा मौका था।

संगीत, वाद्ययंत्रों और आवाज़ों ने मिलकर पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा की झलक पेश की। अभिनेत्री सायदा खतीब ने सांस्कृतिक प्रस्तुति की तारीफ़ करते हुए कहा, कश्मीरी संगीत में एक खास भावनात्मक गुण होता है और यह दर्शकों को घाटी की पहचान और परंपराओं की गहरी समझ देता है।

सुनिधि ने की कश्मीरी लोक संगीत की तारीफ

गायिका सुनिधि चौहान ने भी कश्मीरी लोक गायन की समृद्धि और प्रस्तुति के दौरान दिखाए गए पारंपरिक वाद्ययंत्रों की तारीफ़ की और इस क्षेत्र की संगीत विरासत की खासियत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, जिस तरह इसकी धुनें भाषाई और सांस्कृतिक सीमाओं से परे भी दर्शकों से जुड़ सकती हैं, वह वाकई अद्भुत है।

पारंपरिक वाद्ययंत्रों ने प्रस्तुति में एक नया आयाम जोड़ा

रबाब की मनमोहक धुन और नुट, हारमोनियम व सारंगी की अनोखी आवाज़ों ने बाहर से आए फ़िल्मनिर्माताओं, गायकों और अन्य मेहमानों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कश्मीरी लोक गायक रियाज़ अहमद ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने प्रस्तुति देने का मौका स्थानीय कलाकारों के लिए बहुत अहम था, क्योंकि इससे इस क्षेत्र का पारंपरिक संगीत घाटी से बाहर के दर्शकों तक पहुंच सका।

संगीतकार व गायक एजाज राह ने कहा कि ऐसे प्लेटफ़ार्म युवा पीढ़ी को कश्मीर की संगीत विरासत से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब पारंपरिक कलाओं को मनोरंजन के तेज़ी से बदलते रूपों से मुक़ाबले की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

रबाब वादक शब्बीर अहमद ने कहा कि बाहर से आए मेहमानों की प्रतिक्रिया उत्साहजनक रही, कई लोगों ने कश्मीरी संगीत से जुड़े वाद्ययंत्रों, धुनों और परंपराओं में गहरी दिलचस्पी दिखाई। सांस्कृतिक प्रस्तुति को फ़िल्म जगत से आए सदस्यों ने सराहा। लोगों का कहना था कि इससे कश्मीर की कलात्मक पहचान की झलक मिली और यह भी दिखा कि संगीत कैसे अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों के बीच तुरंत भावनात्मक जुड़ाव पैदा कर सकता है।

बाहर से आई फ़िल्म क्रू के सदस्यों ने स्थानीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के साथ पेश करने की कोशिश की भी तारीफ़ की। कई लोगों ने इस अनुभव को कश्मीर को सिर्फ़ उसके शानदार नज़ारों के ज़रिए नहीं, बल्कि उसकी परंपराओं के ज़रिए समझने के मौक़े के तौर पर देखा।

घाटी ने भी सुनाई अपनी सांस्कृतिक कहानी

महोत्सव में शामिल लोगों के लिए यह प्रस्तुति महोत्सव के यादगार पलों में से एक बन गई, क्योंकि कश्मीरी संगीत की जानी-पहचानी धुनें फ़िल्म निर्माताओं, अभिनेताओं, गायकों और सिनेमा प्रेमियों की अंतरराष्ट्रीय सभा के साथ घुल-मिल गई। महोत्स्व में पारंपरिक संगीत को शामिल करने से यह भी पता चला कि महोत्सव में घाटी की व्यापक सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने वाला प्लेटफ़ार्म बनने की क्षमता है।

जहां फ़िल्में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कहानियां घाटी तक ला रही हैं, वहीं स्थानीय कलाकार यह पक्का कर रहे हैं कि कश्मीर की अपनी कहानियां, आवाज़ें और परंपराएं इस जश्न के केंद्र में बनी रहें। जैसे-जैसे यह पहला महोत्सव आगे बढ़ रहा है, कश्मीर सिर्फ़ एक अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मी आयोजन की पृष्ठभूमि के तौर पर नहीं, बल्कि खुद एक कहानीकार के तौर पर उभर रहा है।