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खुतबों पर वक्फ बोर्ड का यू-टर्न, भारी विरोध के बाद बैकफुट पर आईं अंद्राबी, उमर अब्दुल्ला-महबूबा मुफ्ती ने उठाए थे सवाल

Published: Tue, 13 Oct 2026 07:38 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की मस्जिदों में खुतबों के विषय तय करने की पहल विवादों में घिर गई। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ...और पढ़ें

खुतबों पर वक्फ बोर्ड की पहल, विरोध के बाद यू-टर्न।

खुतबों पर वक्फ बोर्ड की पहल, विरोध के बाद यू-टर्न।

HighLights

  1. वक्फ बोर्ड ने खुतबों के विषय समन्वय की पहल की

  2. उमर, महबूबा सहित कई नेताओं ने कड़ा विरोध किया

  3. बोर्ड ने स्पष्ट किया, इमाम विषय चुनने को स्वतंत्र

नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में जुमे की नमाज के दौरान मस्जिदों में दिए जाने वाले खुतबों (धार्मिक उपदेशों) के विषयों में समन्वय स्थापित करने की वक्फ बोर्ड की पहल विवादों में घिर गई है।

नशे की लत, पारिवारिक तनाव, महिलाओं से जुड़े सवालों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू हुई इस कवायद का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा सहित कई नेताओं एवं धार्मिक संगठनों ने विरोध किया।

आलोचना बढ़ने के बाद बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सैयद दरख्शां अंद्राबी ने स्पष्ट किया कि खुतबों के लिए समान विषय अनिवार्य करने का कोई आदेश जारी नहीं हुआ है। इमाम और खतीब अपनी समझ तथा इच्छा के अनुसार उपदेशों की विषयवस्तु तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।

धार्मिक विद्वानों की समिति बनाने की थी योजना

वक्फ बोर्ड के कार्यकारी अधिकारी इश्तियाक मोहि-उद-दीन ने विभिन्न जिलों के धार्मिक उपदेशकों के साथ आनलाइन बैठक में जुमे के खुतबों के लिए साझा विषयों पर चर्चा की थी। प्रस्ताव था कि धार्मिक विद्वानों की समिति समसामयिक सामाजिक समस्याओं का चयन करे, ताकि मस्जिदों से जागरूकता अभियान चलाया जा सके।

बोर्ड के दायरे से बाहर की मस्जिदों को भी इस पहल से जोड़ने के सुझाव मांगे गए थे। नशे की लत, पारिवारिक समस्याओं, महिलाओं और बेटियों से जुड़े मुद्दों, आत्महत्या तथा मानसिक तनाव को प्रमुखता देने की बात सामने आई।

विरोध के बाद अंद्राबी का स्पष्टीकरण

डॉ. दरख्शां अंद्राबी ने कहा कि न तो वह और न ही बोर्ड का कोई अधिकारी यह तय कर सकता है कि जुमे के खुतबों में क्या कहा जाएगा। प्रस्तावित मुख्य समिति में धार्मिक विद्वान शामिल होंगे और वह स्वयं इसका हिस्सा नहीं होंगी।

उन्होंने कहा कि नशे, पारिवारिक तनाव और युवाओं की मानसिक परेशानियों जैसे विषयों पर चर्चा समाज के हित में है। धार्मिक विद्वान भी डॉक्टरों, इंजीनियरों और शिक्षकों की तरह अपने क्षेत्र के माध्यम से समाज की सेवा कर सकते हैं।

उमर और महबूबा ने जताई आपत्ति

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस पहल को मुसलमानों के धार्मिक मामलों में भाजपा के हस्तक्षेप का प्रयास बताते हुए अस्वीकार्य कहा और अंद्राबी से इसे रोकने की मांग की। महबूबा मुफ्ती ने सवाल किया कि इमामों के उपदेशों की विषयवस्तु निर्धारित करने का अधिकार किसके पास है।

उनके अनुसार, स्थानीय इमाम और मौलवी समुदाय की समस्याओं को बेहतर समझते हैं। उन्होंने वक्फ बोर्ड को जम्मू-कश्मीर सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में लाने तथा धार्मिक मामलों पर मान्यता प्राप्त उलेमा संगठनों से विचार-विमर्श करने की मांग की।

मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाली मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने कहा कि खुतबों की विषयवस्तु तय करना उलेमा, इमामों और मान्यता प्राप्त धार्मिक संस्थानों का अधिकार है। संगठन ने पहले से लिखे भाषण लागू करने या वैधानिक निकाय द्वारा उपदेश नियंत्रित करने का विरोध करते हुए बोर्ड से वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, रखरखाव और संरक्षण पर ध्यान देने को कहा।

श्रीनगर के पूर्व मेयर जुनैद मट्टू ने धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाए, जबकि बडगाम के विधायक आगा मुंतजिर मेहदी ने कहा कि बोर्ड को संपत्तियों के प्रबंधन तक सीमित रहना चाहिए। उन्होंने साझा विषयों के जरिए किसी खास विचारधारा को बढ़ावा दिए जाने की आशंका भी जताई।

मस्जिदों की सामाजिक भूमिका और पुराना हिंसक दौर

कश्मीर मामलों के जानकार रमीज मखदूमी का मानना है कि मस्जिदों की सामाजिक भूमिका पर चर्चा करते समय 2019 से पहले के घटनाक्रमों को भी समझना होगा। अलगाववादी राजनीति और हिंसक प्रदर्शनों के दौरान धार्मिक पहचान तथा सामुदायिक नेटवर्क के जरिए लोगों को लामबंद करने के आरोप लगते रहे हैं। उनके अनुसार, सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित खुतबों का विरोध नहीं होना चाहिए।

सलीम रेशी ने 2008, 2010 और 2016 के हिंसक प्रदर्शनों का उल्लेख किया। वर्ष 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद लंबे समय तक प्रदर्शन हुए। रेशी के अनुसार, उस दौर में कुछ स्थानों पर मस्जिदों से जिहादी तराने और आजादी के नारे सुनाई दिए।धार्मिक नेतृत्व शिक्षा, रोजगार, शांति और हिंसा से दूरी का संदेश देकर सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।

मस्जिद समितियों, इमामों और धार्मिक संगठनों से संवाद जरूरी

जानकार सैयद अमजद शाह के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की राजनीति लंबे समय से पहचान, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक स्थिति से प्रभावित रही है। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 में बदलाव और राज्य के पुनर्गठन के बाद 2024 के विधानसभा चुनावों ने निर्वाचित सरकार की वापसी के साथ नया राजनीतिक संदर्भ बनाया। ऐसे में धार्मिक संस्थानों से जुड़े फैसले व्यापक सामाजिक विमर्श को प्रभावित करते हैं।

इसलिए किसी व्यापक जागरूकता अभियान के लिए स्थानीय मस्जिद समितियों, इमामों और धार्मिक संगठनों से संवाद जरूरी होगा। जम्मू संभाग और कश्मीर घाटी की अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नशामुक्ति, शिक्षा, सौहार्द और हिंसा से दूरी के संदेश को बढ़ावा देना चाहिए। धार्मिक मंचों पर हिंसा या कट्टरपंथ के समर्थन को रोकने के प्रयास कानूनसम्मत हों और किसी समुदाय को सामूहिक रूप से संदेह के घेरे में न रखा जाए।