न बिजली की जरूरत-ना डीजल का खर्च, पानी से चलती है कश्मीर की यह 'देसी चक्की'; गांव का देसी जुगाड़ देख रह जाएंगे दंग
कश्मीर के गांदरबल, कुलगाम जैसे इलाकों में आज भी पानी से चलने वाली पारंपरिक चक्कियां (घराट) मौजूद हैं। ये चक्कियां ...और पढ़ें

कश्मीर के गांवों में आज भी पानी से चलता है आटा पीसने का काम। (फाइल फोटो)
राहुल शर्मा, श्रीनगर। न बिजली, न डीजल, न मोटर, पहाड़ों से उतरते पानी की धार ही जिसकी ताकत है, भारी पत्थरों की जोड़ी अनाज को आटे में बदल देती है। यह किसी पुराने जमाने की कहानी नहीं, बल्कि कश्मीर की हकीकत है। आधुनिक आटा मिलों के दौर में भी गांदरबल, कुलगाम, अनंतनाग और उड़ी के कुछ गांवों में स्थानीय भाषा में ‘आब-ए-घराट’ या ‘पानी चक्की’ कहलाने वाली ये देसी चक्कियां आज भी आबाद हैं।
यह केवल अनाज पीसने का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति से जरूरतें पूरी करने की पारंपरिक समझ की पहचान हैं।
पानी की धार से घूमते हैं पत्थर
घराट में जलधारा का पानी नाली के जरिए चक्की तक लाया जाता है। पानी के दबाव से नीचे लगा पहिया घूमता है, जिससे ऊपर रखे भारी पत्थर चलने लगते हैं। दोनों पत्थरों के बीच गेहूं, मक्का और चावल पीसकर आटा तैयार होता है। पूरी प्रक्रिया में स्थानीय संसाधन और पीढ़ियों के हुनर का इस्तेमाल होता है।
कई इलाकों में अब भी कायम है परंपरा
गांदरबल के कंगन क्षेत्र के सर्फराव गुंड, वंगत और अखल, कुलगाम के काइमोह, अनंतनाग के वामदूरा और कोकरनाग तथा बारामुला के उड़ी के नामबला में कुछ परिवार आज भी इससे जुड़े हैं।
कुलगाम के काइमोह में चक्की चलाने वाले नसीर अहमद पडर के लिए घराट पुश्तैनी पहचान और रोजगार दोनों है। हालांकि पानी की उपलब्धता और ग्राहकों की कमी इसके नियमित संचालन में बाधा बनती है।
गांदरबल के मोहम्मद अजीम डार के अनुसार घराट चलाना केवल चक्की चलाना नहीं है। इसके लिए पानी के बहाव को समझना, लकड़ी के ढांचे की मरम्मत और पत्थरों के बीच सही पिसाई बनाए रखना भी आना चाहिए। यह हुनर पीढ़ियों के अनुभव से ही आता है।
कभी ग्रामीण मेलजोल का केंद्र थे घराट
कंगन के सर्फराव गांव के 60 वर्षीय मोहम्मद इकबाल खटाना के पिता-दादा भी इसी पेशे से जुड़े थे। खटाना बताते हैं कि पहले गांव के लोग घराट पर अनाज पिसवाने आते थे और मेहनताने के तौर पर पैसे के साथ अनाज का हिस्सा भी देते थे। इंतजार के दौरान लोग आपस में बातचीत करते, यह ग्रामीण मेलजोल का केंद्र था। बिजली की मिलों के आने से यह निर्भरता घटी है और कई घराट बंद हो चुके हैं।
आजीविका से जोड़कर ही बचेगी विरासत
विशेषज्ञों के अनुसार घराटों को बचाने के लिए इनके ज्ञान को दर्ज करने, मरम्मत में सहायता, कारीगरों के प्रशिक्षण और जलस्रोतों के संरक्षण पर ध्यान देना होगा। साथ ही पारंपरिक पिसाई को स्थानीय उत्पादों और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना होगा।
आखिरकार घराटों का भविष्य केवल तकनीक सहेजने से नहीं, बल्कि इसे चलाने वाले परिवारों की आजीविका सुरक्षित करने से तय होगा।
घराट में पिसे अनाज की खासियत
पत्थरों के बीच धीमी पिसाई से अनाज की बाहरी परत और अंकुर के गुण काफी हद तक बने रहने की संभावना रहती है। इससे आटे में फाइबर बना रहता है और कुछ लोगों को इसकी रोटी का स्वाद व बनावट ज्यादा पसंद आती है।
कुलगाम के नसीर अहमद पडर ने बताया कि नई पीढ़ी के लिए पुश्तैनी काम अपनाना तभी संभव होगा, जब इससे परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें। विरासत को बचाने की इच्छा और स्थायी रोजगार की जरूरत के बीच संतुलन बनाना आज घराट संचालकों के सामने सबसे बड़ा सवाल है।
गांदरबल के मोहम्मद अजीम डार ने बताया कि पारंपरिक चक्कियों को जारी रखने के लिए केवल विरासत का भाव पर्याप्त नहीं है; इससे जुड़े परिवारों के लिए सम्मानजनक और स्थायी आय का रास्ता भी जरूरी है।
