विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

कश्मीर में सूखे से मुरझा गई थी केसर की फसल, फिर बारिश ने फूंकी जान; क्या इस बार बेहतर होगी पैदावार?

Published: Fri, 23 Oct 2026 04:45 PM (IST)

Kashmir saffron cultivation: घाटी में लंबे सूखे से मुरझा रही केसर की फसल को हालिया बारिश ने नई जान दी ...और पढ़ें

पांपोर के केसर खेतों में फिर लौटी बहार, बारिश से खिले बैंगनी फूल। (फाइल फोटो)

पांपोर के केसर खेतों में फिर लौटी बहार, बारिश से खिले बैंगनी फूल। (फाइल फोटो)

रजिया नूर, श्रीनगर। घाटी में सितंबर-अक्तूबर तक बारिश न होने के चलते केसर की खेती प्रभावित होने लगी थी, जिसके चलते उत्पादकों में चिंता की लहर दौड़ गई थी, लेकिन हाल ही में हुई बारिश इस फसल के लिए संजीवनी बन के बरसी है। इसने फसल में जान फूंक दी। फसल की कटाई की तैयारियों में जुटे उत्पादकों का कहना है कि इस वर्ष उपज बीते वर्ष की तुलना में बेहतर होगी।

पुलवामा जिले में 'सेफरान टाउन' से मशहूर पांपोर की ऊंचाई वाली 'करेवा' (पहाड़ी ढलान वाली) इन दिनों केसर के बैंगनी रंग के फूलों से महक रहा है। चारों तरफ दूर दूर तक फैले इन करेवाओं में ऐसे ही दृश्य देखने को मिल रहे हैं। हर तरफ बैंगनी रंग के फूलों ने समां बांध दिया है जो वहां से गुजरने वाले लोगों का दिल मोह ले रहे हैं।

सूखे से मुरझा गई थी केसर की फसल

हालांकि, सितंबर और अक्तूबर के दूसरे हफ्ते तक यह करेवा सूख चुके थे और केसर के फूल भी जैसे मुरझा गए थे। केसर की कियारियों में दरारें पड़ चुकी थी और अपने खेतों की यह हालत देख उत्पादकों का दिल भी डूब रहा था। वह चिंतित थे कि यदि मौसम एेसा ही रहा तो केसर ठीक से पनपेगा नहीं और उनके हाथ कुछ भी नहीं आएगा।

अलबत्ता हालिया बारिश ने केसर के खेतों में जान फूंक दी। मुरझा चुके फूल फिर से खिल गए और केसर की कियारियां भी तरोताजा हो गई, जिससे उप्तादों की जान में भी जान आ गई और अब वह खुशी खुशी फसल की कटाई की तैयारियों में जुट गए हैं।

केसर उत्पादकों को अच्छी पैदावार की उम्मीद

पम्पोर के केसर बेल्ट में स्थित लेथपोरा गांव के केसर उत्पादक मोहम्मद अमान ने कहा कि उन्हें इस बार पिछले साल के मुकाबले बेहतर फसल मिलने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि उनकी तरह इलाके के सैकड़ों केसर उत्पादक लंबे समय तक चले सूखे से चिंतित थे। सितंबर से अक्टूबर तक बारिश न होने के कारण फसल के विकास के सबसे अहम चरण में ही खेत पूरी तरह सूख गए थे।

अलबत्ता, कुछ दिन पहले हुई बारिश ने उत्पादकों को राहत दी है और बेहतर फसल की उम्मीदें फिर से जगा दी हैं। अमान ने कहा कि भले ही बारिश थोड़े समय के लिए हुई, लेकिन इससे खेतों को जरूरी नमी मिल गई है।

उत्पादकों ने बताया कि उन्हें डर था कि अगर सूखा जारी रहता तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती थी। केसर की खेती काफी हद तक मिट्टी में पर्याप्त नमी और फूल आने के मौसम में अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

हाथों से तोड़े जाते हैं केसर के फूल

केसर घाटी के सबसे कीमती कृषि उत्पादों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से दक्षिण कश्मीर के करेवा पठारों पर की जाती है। यहां की मिट्टी और जलवायु केसर के नाजुक बैंगनी फूलों के पनपने के लिए अनुकूल हैं।

इन फूलों को हाथों से तोड़ा जाता है। इसके बाद इनके लाल रंग के वर्तिकाग्र (स्टिग्मा) को सावधानी से अलग कर सुखाया जाता है। इसी प्रक्रिया से कीमती केसर तैयार होता है। फूल खिलने और उन्हें तोड़ने का समय उत्पादकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि फूलों की संख्या और वर्तिकाग्र की गुणवत्ता से ही कुल पैदावार और किसानों की कमाई तय होती है।

इस बार बारिश से बेहतर फसल की आस

उत्पादकों का कहना है कि हाल ही में हुई बारिश से उनकी उम्मीदें बढ़ गई हैं। बहुत कुछ आने वाले हफ्तों के मौसम पर निर्भर करेगा, जब फूल पूरी तरह से खिलेंगे और उन्हें तोड़ा जाएगा। यह उम्मीद पिछले साल के निराशाजनक सीजन के बाद जगी है, जब उत्पादको ने उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की थी। उनके अनुसार, उत्पादन में लगभग 63 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने इसका कारण खराब मौसम और केसर की खेती वाली जमीन का अन्य कार्यों के लिए लगातार इस्तेमाल होना बताया है।

उत्पादकों ने केसर की खेती पर बदलते मौसम के असर को लेकर चिंता जताई है। अनियमित बारिश और लंबे समय तक सूखा पड़ने से इस फसल से जुड़ी अनिश्चितताएं और बढ़ गई हैं।

पांपोर में जमीन का अन्य कार्यों के लिए इस्तेमाल होना एक और चिंता का विषय बन गया है, जहां शहरीकरण और अन्य विकास कार्यों ने केसर के पारंपरिक खेतों पर दबाव बढ़ा दिया है।उत्पादकों को डर है कि खेती के दायरे में आ रही कमी से उत्पादन और घट सकता है, जिससे इस फसल पर निर्भर परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।

पांपोर, लेथपोरा और अवंतीपोरा में उगता है घाटी का 80% केसर

केसर की खेती में काफी मेहनत लगती है। किसानों को खेतों की देखभाल करनी पड़ती है और बहुत कम समय के भीतर फूलों की कटाई करनी होती है। पांपोर के उत्पादकों के लिए हाल ही में हुई बारिश ने कई हफ्तों की चिंता के बाद कुछ राहत दी है।

हालांकि, कटाई का काम अभी पूरी तरह शुरू नहीं हुआ है, इसलिए उत्पादक यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि मिट्टी में नमी बढ़ने से फसल को कितना फायदा होता है। एक उत्पादक ने कहा, 'हमें उम्मीद है कि कटाई के दौरान मौसम अनुकूल बना रहेगा।'

जम्मू-कश्मीर में प्रतिवर्ष लगभग 14.87 से 17.33 मीट्रिक टन केसर का उत्पादन होता है। इसमें से करीब 80 प्रतिशत केसर दक्षिण कश्मीर के पांपोर, लेथपोरा और अवंतीपोरा क्षेत्रों में उगाया जाता है।

इसके अलावा, बडगाम जिले के खानपोरा सराई में भी केसर की खेती होती है। पांपोर बेल्ट में उगाए जाने वाले केसर को अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। घाटी में लगभग एक लाख लोग केसर उत्पादन से जुड़े हुए हैं।