मस्जिदें बनेंगी सुधार और काउंसलिंग का केंद्र, कश्मीर में शिया-सुन्नी एक मंच पर; हर जुमे को उठाया जाएगा सामाजिक मुद्दा
कश्मीर घाटी की मस्जिदें अब सिर्फ धार्मिक उपदेश ही नहीं, बल्कि युवाओं में नशे, आत्महत्या और डिप्रेशन जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी बात करेंगी।

कश्मीर में मस्जिदों का मंच बदलेगा, अब खुदा की बात के साथ होगी युवाओं के दर्द और पर्यावरण की भी बात।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कश्मीर घाटी की मस्जिदों में अब सिर्फ दीन-ओ-ईमान की तकरीरें नहीं गूंजेंगी। घाटी में मस्जिदों का मंच अब समाज के सबसे दर्दनाक जख्मों पर भी बात करेगा। नशे की दलदल में फंसते नौजवान, बढ़ते आत्महत्या और डिप्रेशन के मामले और तबाह होता पर्यावरण, अब हर जुमे की तकरीर में इन मुद्दों पर खुलकर बात होगी।
यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के तमाम बड़े धर्मगुरुओं की एक अहम बैठक में लिया गया है। खास बात यह है कि दशकों बाद शिया और सुन्नी दोनों फिरकों के धर्मगुरु एक साथ एक मंच पर आए हैं। इस बैठक की अध्यक्षता घाटी के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने की। इस संगठन का नाम मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) है।
पत्रकारों से बात करते हुए मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि हम अपने नौजवानों में खुद को नुकसान पहुंचाने और जज्बाती परेशानी के बढ़ते मामलों को देख रहे हैं। हमारा माहौल लगातार खराब हो रहा है। ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं जिन्हें सिर्फ सरकार या सेमिनारों के भरोसे छोड़ा जा सके। इसके लिए समाज को लगातार एकजुट होकर काम करना होगा।
उन्होंने साफ कहा कि मस्जिद और उनके मंच की समाज में एक अनोखी पहुंच और असर है। धर्मगुरुओं की जिम्मेदारी है कि इस ताकत का इस्तेमाल सही दिशा में करें। यह मंच डॉक्टर या काउंसलर की जगह नहीं ले सकता, लेकिन समाज को जगा सकता है और सही कदम की तरफ ले जा सकता है।
एमएमयू ने तय किया कि अब हर जुमे को घाटी की सभी मस्जिदों में एक ही सामाजिक मुद्दे पर बात होगी। मकसद है परिवारों को शुरुआती लक्षण पहचानना सिखाना, काउंसलिंग को लेकर शर्म को खत्म करना और लोगों को माहौल के प्रति जिम्मेदार बनाना।
यही नहीं अब मस्जिदें और मदरसे सिर्फ इबादत और तालीम की जगह नहीं, बल्कि गाइडेंस, काउंसलिंग, यूथ एंगेजमेंट और फैमिली स्पोर्ट सेंटर के तौर पर काम करेंगे। क्योंकि मस्जिदें लोगों के घरों के सबसे करीब हैं, इसलिए वे परेशानी को सबसे पहले पहचान सकती हैं।
धर्मगुरुओं ने भी माना कि मस्जिदों को ऐसी सुरक्षित जगह बनाना होगा जहां युवा और परिवार बिना किसी डर और झिझक के अपने दिल की बात कह सकें, चाहे वह अकेलापन हो, तनाव हो या घर का दबाव।
नशे के खिलाफ दोहरी नीति पर वार
बैठक में सबसे ज्यादा चिंता नशे को लेकर जताई गई। धर्मगुरुओं ने सरकार की नीति पर सीधा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि नशे के खिलाफ अभियान तब तक कामयाब नहीं हो सकता, जब तक दूसरी तरफ टूरिज्म के नाम पर नए शराब के लाइसेंस बांटे जाएंगे। यह दोहरी नीति हमारे नौजवानों को बचाने की हर कोशिश को कमजोर करती है।
उन्होंने सरकार से शराब के प्रचार-प्रसार और नए लाइसेंसों पर रोक लगाने की मांग की है। आने वाले दिनों में ये तमाम धर्मगुरु घाटी के अलग-अलग इलाकों में जाकर स्थानीय इमामों से मिलेंगे और हर इलाके की परेशानी के हिसाब से जमीनी हल निकालेंगे।
