पहलगाम-गुलमर्ग छोड़ अब LoC पहुंच रहे पर्यटक, एक साल में 4.30 लाख सैलानी पहुंचे; सीजफायर के बाद बदली तस्वीर
उत्तरी कश्मीर के सीमांत इलाकों में पर्यटन ने नया रिकॉर्ड बनाया है, इस साल 4.30 लाख से अधिक पर्यटकों ने एलओसी से सटे क्षेत्रों का दौरा किया है।
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कश्मीर एलओसी पर अब सन्नाटा नहीं, सैलानियों का शोर।
HighLights
उत्तरी कश्मीर के सीमांत क्षेत्रों में 4.30 लाख पर्यटक पहुंचे
2021 सीजफायर से शांति और पर्यटन को बढ़ावा मिला
स्थानीय लोगों को होमस्टे, गाइड के रूप में रोजगार मिला
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। कभी सुरक्षा कारणों और गोलाबारी की खबरों के लिए पहचाने जाने वाले उत्तरी कश्मीर के सीमांत इलाके आज पर्यटन के नए नक्शे पर चमक रहे हैं। इस साल अब तक 4.30 लाख से ज्यादा पर्यटकों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे इलाकों का दौरा किया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यह आंकड़ा न सिर्फ पर्यटन के लिहाज से रिकॉर्ड है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे शांति और विकास ने सीमांत गांवों की तकदीर बदलनी शुरू कर दी है।
पर्यटन की इस लहर में कुपवाड़ा, बांडीपोरा और उड़ी के वे इलाके शामिल हैं, जहां कुछ साल पहले तक जाने के लिए विशेष अनुमति की जरूरत पड़ती थी। इनमें केरन, लोलाब, मच्छिल, टीटवाल, टंगधार, गुरेज, तुलैल और उरी जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे बड़ी कामयाबी कुपवाड़ा जिले के नाम है। यहां अकेले करीब 3 लाख पर्यटक पहुंचे। वहीं, बारामूला जिले के उरी में लगभग 70,000 और बांडीपोरा के गुरेज घाटी में करीब 60,000 सैलानियों ने दस्तक दी। ये आंकड़े बताते हैं कि पर्यटक अब गुलमर्ग और पहलगाम जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहों से हटकर शांत, अनछुए और असली कश्मीर को देखना चाहते हैं।
2021 के सीजफायर ने निभाया अहम रोल
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण है बेहतर सुरक्षा स्थिति है। फरवरी 2021 में भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर समझौते की फिर से पुष्टि के बाद एलओसी पर हालात काफी स्थिर हुए हैं। सीमा पार से होने वाली घटनाओं में भारी कमी आई है, जिससे उन इलाकों में जाना संभव हो पाया है जो पहले दुर्गम और संवेदनशील माने जाते थे। अब सीमांत समुदाय खुद आगे आकर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने रख रहे हैं।
किशनगंगा नदी के किनारे बसा केरन आज उत्तरी कश्मीर का सबसे चर्चित ऑफबीट डेस्टिनेशन बनकर उभरा है। चारों तरफ ऊंचे पहाड़, हरे-भरे मैदान, नदी किनारे बसे लकड़ी के घर और गांव की सादगी पर्यटकों को खूब भा रही है। यहां से नदी के उस पार पाकिस्तान के गांव भी दिखाई देते हैं, जो इस जगह को और भी खास बनाता है।
वहीं, अपनी खूबसूरती और दर्द-शिना जनजाति की अनोखी संस्कृति के लिए मशहूर गुरेज में इस साल 60,000 पर्यटकों का आना बड़ी बात है। यहां हाल ही में शुरू हुआ 'शिन-ऑन-मी' कल्चरल सेंटर पर्यटकों को स्थानीय इतिहास और संस्कृति से जोड़ रहा है।
लोलाब घाटी को 2023 में आउटलुक ट्रैवलर अवार्ड्स में 'बेस्ट ऑफबीट डेस्टिनेशन' का खिताब मिल चुका है। वहीं, मच्छिल और टंगधार जैसे सुदूर हिमालयी इलाके उन लोगों को आकर्षित कर रहे हैं जो शोर से दूर सुकून की तलाश में हैं। यही नहीं उड़ी में स्थित ऐतिहासिक कमान ब्रिज, जिसे अमन सेतु के नाम से भी जाना जाता है, को अब एक बड़े पर्यटन आकर्षण के रूप में विकसित किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के खुले दरवाजे
पर्यटन में इस उछाल का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय लोगों को मिल रहा है। गांव-गांव में होमस्टे खुल रहे हैं। ट्रांसपोर्ट, लोकल गाइड, हैंडीक्राफ्ट और छोटे ढाबे-रेस्टोरेंट चलाने वालों की आमदनी बढ़ी है। युवा अब रोजगार के लिए बाहर जाने के बजाय अपने ही गांव में पर्यटन से जुड़कर कमा रहे हैं।
जिला प्रशासन, जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग और भारतीय सेना द्वारा बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और लगातार प्रचार-प्रसार करने से भी इस विकास को गति मिली है। सड़कों में सुधार, रहने की बेहतर व्यवस्था और सोशल मीडिया पर इन जगहों की तस्वीरें वायरल होने से पर्यटक खिंचे चले आ रहे हैं।
कुल मिलाकर, उत्तरी कश्मीर में बॉर्डर टूरिज्म सिर्फ सैर-सपाटा नहीं है, यह शांति, विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी है, जो एलओसी के गांवों को देश के पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर रही है।
