जम्मू, विवेक सिंह। कश्मीर अब बदल रहा है। लंबे समय से विकास की राह में रोड़ा बने रहे कट्टरपंथ को कोई और नहीं, बल्कि खुद कश्मीरी महिलाएं तोड़ रही हैं। 24 अक्टूबर को राज्य में ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल (बीडीसी) के चुनाव हैं। बदलाव की बयार चहुंओर बह रही है। ये महिलाएं अलगाववाद और आतंकवाद के फरमानों की परवाह न कर बदलाव को धार दे रही हैं।

दक्षिण कश्मीर में खौफ का पर्याय रहे जाकिर मूसा और बुरहान वानी जैसे आतंकियों के गढ़ से हुंकार भरने वालीं सकीना अख्तर की बात करें या फिर उरी की आसिफा तबस्सुम मीर के हौसले की, एक बड़ा बदलाव स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। सकीना और आसिफा जैसी निडर महिलाएं कश्मीर में रोल मॉडल बन कर उभरी हैं।कश्मीर में ब्याही गुलाम कश्मीर की आसिफा कुंडीबरजाला पंचायत की सरपंच हैं। कहती हैं, सही मायनों में दुनिया में अगर जम्हूरियत और आजादी है तो वह  हिन्दुस्‍तान में है। हमें मिलजुल कर कश्मीर को बदलना है।

कुछ समय पहले तक दक्षिण कश्मीर के त्राल के डाडेसर क्षेत्र में दुर्दांत आतंकवादियों का दबदबा था। कश्मीर में दहशत इस कदर थी कि महिलाएं बाहर तक नहीं निकलती थीं। अपने गांव के लोगों को बेहतर भविष्य देने के इरादे से सकीना सामने आईं। उनके खिलाफ फरमान जारी हुए, समाज में बातें होने लगीं, परिवार का भी दबाव बना कि पीछे हट जाएं, लेकिन अपने गांव और कश्मीर के लिए कुछ करने का जुनून था, जिसके बल पर वह डटी रहीं। लोगों का साथ मिला और एक साल पहले सकीना शाहबाद पंचायत से सरपंच चुनी गईं।

वह कश्मीर के आतंक ग्रस्त क्षेत्रों में देशभक्ति की अलख जगाने के अलावा संबंधित कार्यक्रमों में हमेशा आगे रहती हैं। सरकारी योजनाओं के बारे में घर-घर जाकर लोगों को अवगत कराना उनका मकसद बन गया है। उनके इस प्रयास के कारण कई लोग योजनाओं का लाभ उठा चुके हैं। ग्राम विकास के उनके इस जज्बे ने न सिर्फ आतंकवाद को बौना साबित किया, बल्कि बीडीसी चुनाव से पूर्व सकीना निर्विरोध चेयरमैन पद के लिए चुनी गई हैं। कहती हैं कि अगर पांच अगस्त के बाद नया कश्मीर बना है तो लोगों में बदलाव जरूरी है। खौफ को निकालना होगा और सिर्फ विकास की तरफ ही सोचना होगा, तब जाकर हमारा असली मकसद पूरा होगा। 

बता दें कि हिजबुल मुजाहिदीन के पोस्टर ब्वॉय रहे बुरहान वानी के गृह जिले पुलवामा के त्राल क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार ने इस वर्ष संसदीय चुनाव में सबसे अधिक वोट लेकर इतिहास रचा था। अब बुरहान के गांव डाडेसर में सकीना ने कमल को खिलाया है।

उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा से सटे जिला बारामुला के उड़ी ब्लॉक की कुंडीबरजाला पंचायत की रहने वाली आसिफा ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह कभी कश्मीर में सरपंच बनेगी। पति मंजूर की टेलरिंग की दुकान है।आसिफा ने कहा कि पिछले साल जब पंचायत चुनाव हुए तो हमारा इलाका महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित था। सभी ने मेरा नाम तय किया और मैं चुनाव जीत गई। आसिफा अब पक्‍की हिन्दुस्‍तानी बन चुकी हैं। कहती हैं, जो मेरे शौहर का वतन है वही मेरा वतन है। वतन से मुहब्बत करना एक इबादत है। यहां अच्छी सड़कें, स्कूल और अस्पताल चाहिए। हम लोग यहां बॉर्डर पर रहते हैं, जहां गोलाबारी होती रहती है। इसलिए हम लोगों के लिए बंकर होने चाहिए। 

कमान हाथ में लेने को तैयार : जम्मू-कश्मीर में 24 अक्टूबर को बीडीसी के चुनाव हैं और 400 से अधिक पंच, सरपंच इस चुनाव के जरिये गांवों के विकास की कमान को अपने हाथ में लेने को तैयार हैं। इनमें 89 फीसद पंच,

सरपंच निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। शोपियां से भाजपा के छह, पुलवामा में चार, बांडीपोरा में दो, अनंतनाग, बडगाम, गांदरबल जिलों में एक-एक उम्मीदवार इन चुनावों के लिए निर्विरोध चुने गए हैं। पार्टी को उम्मीद है कि 24 अक्टूबर को परिणाम आने के बाद कश्मीर में पार्टी के 60 से अधिक चेयरमैन होंगे। कश्मीर में 130 ब्लॉकों के चेयरमैन चुने जाने हैं। 15 का फैसला चुनाव से पहले ही हो चुका है। 

Posted By: Preeti jha

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