कश्मीर में पहली बार 'पेस्टिसाइड-फ्री' सेब तैयार, 55 कीटनाशकों की जांच में खरा उतरा; SKUAST का दावा
कश्मीर में शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय ने पहली बार कीटनाशक-मुक्त सेब की पैदावार का दावा किया है, जहाँ 55 कीटनाशकों की जांच में सभी निर्धारित सीमा से नीचे पाए गए।

कश्मीर में पहली बार कीटनाशक-मुक्त सेब की सफल पैदावार। (फाइल फोटो)
HighLights
कश्मीर में पहली बार कीटनाशक-मुक्त सेब उत्पादन।
55 कीटनाशकों की जांच, सभी निर्धारित सीमा से नीचे।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
नवीन नवाज, श्रीनगर। कश्मीर में रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर (स्कास्ट-कश्मीर) ने पहली बार कीटनाशक-मुक्त सेब की पैदावार का दावा किया है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नज़ीर अहमद गनई ने बताया कि सेब के नमूनों में 55 प्रकार के कीटनाशकों की जांच की गई और सभी की मात्रा प्रयोगशाला की निर्धारित मापन सीमा से नीचे पाई गई।
शालीमार श्रीनगर में प्राकृतिक खेती पर आयोजित एक सेमिनार में प्रो. गनई ने कहा कि रासायनिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल मिट्टी, जलस्रोतों, वायु और जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहा है।
उन्होंने प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया। सेमिनार का आयोजन विश्वविद्यालय ने भारतीय किसान संघ और जम्मू-कश्मीर किसान सलाहकार बोर्ड के सहयोग से किया।
बागवानी पर रसायनों के इस्तेमाल का बढ़ता दबाव
कश्मीर की अर्थव्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका सेब की बागवानी पर निर्भर है। फसल को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इनका अनियंत्रित प्रयोग खेती और पर्यावरण के लिए चुनौती बन सकता है।
निर्धारित मात्रा और समय-सीमा की अनदेखी, कटाई से पहले जरूरी अंतराल का पालन नहीं करने तथा सुरक्षा उपकरणों के बिना छिड़काव से फलों पर रासायनिक अवशेष रह सकते हैं और बागवानों व मजदूरों के स्वास्थ्य को जोखिम हो सकता है।
रसायनों के अवशेष मिट्टी और पानी तक पहुंचकर लाभकारी कीटों तथा अन्य जीवों को भी प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, कीटनाशकों के संपर्क और कैंसर जैसी बीमारियों के बीच संबंध का आकलन वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
प्राकृतिक खेती के लिए संस्थागत पहल
प्रो. गनई के अनुसार, विश्वविद्यालय ने प्राकृतिक खेती के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया है। यहां किसानों और युवाओं को जैव उर्वरक, जैव नियंत्रण उत्पाद तथा अन्य जैविक कृषि आदानों के उत्पादन और इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बड़े पैमाने पर जैव-आदानों के उत्पादन की सुविधा भी विकसित की गई है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय किसानों, सरकारी विभागों और कृषि विशेषज्ञों के साथ मिलकर टिकाऊ खेती के प्रति जागरूकता बढ़ा रहा है। इसके ‘वन हेल्थ’ कार्यक्रम में पर्यावरण, कृषि, पशु और मानव स्वास्थ्य को परस्पर जुड़ा मानकर काम किया जाता है।
कश्मीर में कीटनाशक-मुक्त सेब की यह पहल रसायनों पर निर्भरता घटाने की संभावनाएं दिखाती है। हालांकि, इसे व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन, नियमित प्रयोगशाला जांच और वैकल्पिक कीट प्रबंधन तकनीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
