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कश्मीर की चेरी का गल्फ देशों तक जलवा, कम पैदावार में भी मिले अच्छे दाम; अब 126 करोड़ से बढ़ेगी कमाई, जानें प्लान

Published: Sat, 03 Oct 2026 07:00 AM (IST)

कश्मीर में बेमौसम बारिश से चेरी उत्पादन प्रभावित हुआ, लेकिन सरकार ने ₹126 करोड़ की परियोजना शुरू की है। यह ...और पढ़ें

कश्मीर के 4000 बागवानों की किस्मत बदलेगा HADP प्रोजेक्ट। (फाइल फोटो)

कश्मीर के 4000 बागवानों की किस्मत बदलेगा HADP प्रोजेक्ट। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. मौसम से उत्पादन में 35-40% कमी, फिर भी बेहतर दाम मिले।

  2. ₹126 करोड़ की परियोजना से चेरी वैल्यू चेन मजबूत होगी।

  3. कश्मीर की चेरी अब सऊदी अरब, यूएई तक निर्यात हो रही है।

राहुल शर्मा, श्रीनगर। कश्मीर की पहचान सिर्फ सेब से नहीं है। यहां की चेरी भी देशभर में अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए जानी जाती है। लेकिन इस साल बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तापमान में लगातार बदलाव ने चेरी के बागवानों की चिंता बढ़ा दी। मौसम की मार से कई इलाकों में चेरी की पैदावार में करीब 35 से 40 फीसदी तक कमी आई है।

गांदरबल, शोपियां और श्रीनगर जैसे प्रमुख चेरी उत्पादक इलाकों में इसका असर ज्यादा देखने को मिला। फल कम आने से किसानों को नुकसान हुआ, हालांकि कम उत्पादन के कारण बाजार में चेरी को पिछले साल के मुकाबले बेहतर कीमत भी मिली।

126 करोड़ की योजना से उम्मीद

चेरी उत्पादन में आई गिरावट के बीच जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस क्षेत्र को मजबूत करने की तैयारी तेज कर दी है। होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम (एचएडीपी) के तहत करीब 125.93 करोड़ रुपये की चेरी परियोजना शुरू की गई है।

इस योजना का मकसद केवल चेरी की पैदावार बढ़ाना नहीं है। इसके तहत फल को बाग से बाजार तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था को बेहतर बनाने पर जोर है। सरकार की योजना करीब 1440 हेक्टेयर चेरी बागों को इससे जोड़ने की है। इससे लगभग 4000 चेरी उत्पादकों को फायदा पहुंचाने का लक्ष्य है।

परियोजना के तहत बेहतर पौधे लगाने, बागों की देखभाल के आधुनिक तरीके अपनाने और किसानों को बेहतर खेती की जानकारी देने की योजना है। सरकारी अनुमान के अनुसार इससे करीब 4000 मीट्रिक टन अतिरिक्त चेरी उत्पादन हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है।

सबसे बड़ी समस्या कटाई के बाद

चेरी की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसे तोड़ने के बाद ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रखना मुश्किल होता है। यही वजह है कि कई बार किसान मजबूरी में जल्दी फल बेच देते हैं। इसे देखते हुए परियोजना में करीब 5000 मीट्रिक टन क्षमता वाले नियंत्रित तापमान वाले भंडारण केंद्र बनाने की योजना है। इसके अलावा फल की छंटाई, पैकिंग और प्रसंस्करण की सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी।

चेरी से जूस, जैम, जेली, सूखी चेरी और दूसरे उत्पाद बनाने पर भी जोर दिया जाएगा। इससे खराब होने वाले फल को भी इस्तेमाल किया जा सकेगा और किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिलने की उम्मीद है।

चेरी से सीजन की शुरुआत में मिलती है कमाई

चेरी किसानों के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यह सेब से पहले बाजार में आ जाती है। इससे बागवानों को साल की शुरुआती आमदनी मिल जाती है।

शोपियां फ्रूट मंडी एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ वानी ने बताया कि चेरी से मिलने वाली शुरुआती कमाई किसानों को सेब के सीजन से पहले खाद, दवाइयों और मजदूरी जैसे खर्चों में मदद करती है। चेरी का सीजन मार्च-अप्रैल-मई तक जाता है।

शोपियां के फल उत्पादक आफताब अहमद वाजा ने बताया कि इस साल मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ। मंडी में करीब 500-600 मीट्रिक टन चेरी पहुंची। कम आवक के कारण किसानों को कई जगह बेहतर दाम मिले। टंगमर्ग, गांदरबल, पुलवामा, बारामूला आदि के पहाड़ी इलाकों में प्रमुखता से चेरी उत्पादन होता है।

वहीं कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स एंड डीलर्स यूनियन के अध्यक्ष बशीर अहमद बशीर का कहना था कि मौसम ने उत्पादन को नुकसान पहुंचाया, लेकिन इस बार चेरी के दाम अच्छे रहे। उनके मुताबिक नई किस्मों के आने से चेरी का सीजन भी पहले के मुकाबले लंबा हुआ है।

देश की 90 फीसदी से ज्यादा चेरी कश्मीर से

भारत में पैदा होने वाली चेरी का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जम्मू-कश्मीर से आता है। सामान्य वर्षों में कश्मीर में करीब 12,000 से 14,000 मीट्रिक टन चेरी पैदा होती है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में चेरी की मांग पूरी करने में कश्मीर की बड़ी भूमिका है। लेकिन मौसम में बदलाव अब इस फसल के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। चेरी में फूल आने और फल बनने के समय बारिश और तापमान में अचानक बदलाव का सीधा असर पड़ सकता है।

सऊदी-अरब और UAE तक पहुंची कश्मीर की चेरी

बशीर अहमद बशीर ने बताया कि कश्मीर की चेरी की मांग अब देश के बाहर भी बढ़ रही है। 2025 में यहां की चेरी की खेप सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक पहुंची थी। इससे निर्यात की नई संभावनाएं खुली हैं। चेरी को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने के लिए भी नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

2025 में ही चेरी को देश के दूरदराज के बाजारों तक रेल से पहुंचाने की दिशा में भी कदम बढ़ा था। पहली कार्गो ट्रेन के जरिए कश्मीर की चेरी मुंबई भेजी गई, जिससे अत्यधिक महंगे एयर-फ्रेट के मुकाबले वैकल्पिक परिवहन का रास्ता खुला।

परियोजना के आधिकारिक अनुमानों में उत्पादकता में 20–30 प्रतिशत और किसानों की आय में 35–40 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना जताई गई है। हालांकि ये लक्ष्य हैं, उपलब्धि परियोजना के वास्तविक क्रियान्वयन और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।