कश्मीर की सर्दियां पर्यटकों के लिए दिलकश, पर LoC के पास आसान नहीं जिंदगी; बर्फबारी से पहले राशन-लकड़ी जुटा रहे लोग
कश्मीर के उड़ी और कुपवाड़ा जैसे सीमांत क्षेत्रों के निवासियों को सर्दियों में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ...और पढ़ें

बर्फ गिरने से पहले बंकरों और घरों को महफूज करने में जुटे लोग। (फाइल फोटो)
HighLights
सर्दियों में जलाऊ लकड़ी, अस्पताल पहुंचना बड़ी चुनौती।
सीमांत निवासियों के लिए बंकर सुरक्षा का अहम साधन।
भारी बर्फबारी से पहले आवश्यक सामान का स्टॉक।
जागरण संवाददाता, श्रीनगर। पर्यटकों के लिए घाटी के अन्य मौसमों की तरह सर्दियों का मौसम भी दिलफरेब होता है। स्थानीय लोगों विशेषकर सीमांत क्षेत्रों में रहने वालों के लिए यह केवल मौसम में बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ी चुनौती होती है। इसका सामना करने के लिए उन्हें पहले से ही तैयारियां करनी पड़ती हैं।
उत्तरी कश्मीर के उड़ी, कुपवाड़ा और अन्य सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग सर्दियों की तैयारी में जुट जाते हैं। वे घरों को गर्म रखने, जलाऊ लकड़ी और गर्मी के अन्य साधनों का इंतजाम करने, आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचने तथा भारी बर्फबारी के कारण सड़कें बंद होने और तापमान में भारी गिरावट आने पर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी प्रबंध करते हैं।
कई सीमावर्ती गांवों में बस्तियां खड़ी ढलानों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बसी हुई हैं। ऐसे में सर्दियों की शुरुआत के साथ ही सुरक्षित आश्रय, बिजली, पीने के पानी की उपलब्धता और आजीविका के साधनों को बनाए रखने को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं।
सीमावर्ती इलाकों में सर्दियों की चुनौतियां बरकरार
बारामुला जिले के उड़ी क्षेत्र से लेकर कुपवाड़ा के केरन और करनाह जैसे सीमावर्ती इलाकों तक रहने वाले स्थानीय लोगों का कहना है कि हाल के वर्षों में संपर्क सुविधाओं में सुधार और राहत कार्यों से कुछ मदद जरूर मिली है, लेकिन सीमांत क्षेत्रों में रहने से जुड़ी मुश्किलें आज भी उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं।
उड़ी जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों के कई गांव LoC के बिल्कुल पास स्थित हैं। यहां रहने वाले लोग सर्दियों के दौरान गोलाबारी या अन्य आपात स्थितियों में सुरक्षा के लिए बनाए गए बंकरों में शरण लेते हैं।
बर्फबारी से पहले ही जुटाने पड़ते हैं राशन और जलाऊ लकड़ी
उड़ी के चरुंडा गांव के रहने वाले करामत हुसैन खान ने बताया, 'सर्दियां हमारे लिए हमेशा मुश्किल समय होती हैं। बर्फबारी शुरू होने से पहले ही हमें जलाऊ लकड़ी, खाने-पीने का सामान और अन्य जरूरी चीजों का इंतजाम करना पड़ता है। एक बार जब सड़कें फिसलन भरी हो जाती हैं या बंद हो जाती हैं, तो छोटी सी दूरी तय करना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है।'
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन परिवारों में छोटे बच्चे, बुजुर्ग या ऐसे मरीज हैं जिन्हें नियमित चिकित्सा देखभाल की जरूरत होती है, वे लंबे समय तक चलने वाली बर्फबारी के दौरान सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करते हैं। उड़ी में जहां सीमा रेखा के पास कई गांव हैं, सर्दियों की तैयारी पहली बड़ी बर्फबारी से काफी पहले ही शुरू हो जाती है।
सर्दियों और आपात स्थिति में बंकर ही सहारा
चरुंडा, गरकोट, नंबला, शादरा कमलकोट और अन्य सीमावर्ती बस्तियों के लोगों को परिवहन व्यवस्था ठप होने और आवाजाही सीमित होने की संभावना के लिए पहले से तैयार रहना पड़ता है। कई परिवारों को सीमा पार से हुई गोलाबारी के पुराने अनुभव आज भी याद हैं, खासकर उन लोगों को जिनके घर क्षतिग्रस्त हो गए थे या जिन्हें गोलाबारी के दौरान कहीं और शरण लेनी पड़ी थी।
यहां के निवासियों के लिए, बंकर सर्दियों और आपातकालीन तैयारियों का एक अहम हिस्सा हैं। हालांकि, इन बंकरों की उपलब्धता, उनकी हालत और उन तक पहुंच पाना अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय है, खासकर उन परिवारों के लिए जो ज्यादा जोखिम वाले इलाकों में रहते हैं।
बंकर सुरक्षित, लेकिन वहां तक पहुंचना मुश्किल
क्षेत्र के शादरा कमलकोट गांव के निवासी मोहम्मद फरीद ने कहा, 'गोलाबारी के दौरान, एक बंकर सुरक्षा और खतरे के बीच का अंतर साबित हो सकता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हर असुरक्षित परिवार के पास एक सुरक्षित और इस्तेमाल के लायक आश्रय स्थल उपलब्ध है? कुछ परिवारों को सुरक्षित जगह तक पहुंचने के लिए काफी दूर तक जाना पड़ता है।'
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन गांवों में बंकर घरों से दूर बने हैं, वहां अंधेरे, भारी बारिश या बर्फबारी के दौरान उन तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो सकता है। वहीं जिन गाँवों में आने-जाने के दूसरे रास्ते सीमित हैं, वहां सड़कों के रखरखाव, समय पर बर्फ हटाने और आपातकालीन स्थिति में भरोसेमंद परिवहन व्यवस्था को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
जमाल अकबर नामक क्षेत्र के चुरुंडा गांव के निवासी ने कहा, 'सरकार को इस क्षेत्र की दिक्कतों को देखते हुए इन बंकरों तक हम लोगों की पहुंच आसान बनाने के लिए उपाय करने चाहिए ताकि हमें इन सर्दियों के दौरान किसी एमर्जेसी से निपटना आसान हो सके।
भारी बर्फबारी से थम जाती है आवाजाही
उधर, कुपवाड़ा जिले में खासकर करनाह, केरन, माछिल और अन्य दूर-दराज के सीमावर्ती इलाकों में, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और भारी बर्फबारी के कारण सीमा रेखा के पास रहने वालों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। जिन इलाकों में सड़कें पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरती हैं, वहां बर्फबारी और जमी हुई बर्फ के कारण यातायात धीमा हो सकता है या कुछ समय के लिए पूरी तरह ठप हो जाता है।
इससे स्थानीय लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षण संस्थानों, बाजारों और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। कुपवाड़ा के एक दूर-दराज सीमावर्ती गांव के निवासी नासिर अहमद बोकड़ ने बताया, 'सर्दियां शुरू होने से पहले हम जरूरी सामान का स्टाक जमा कर लेते हैं, क्योंकि किसी को नहीं पता होता कि खराब मौसम कितने दिनों तक चलेगा। अगर सड़क बंद हो जाए और कोई बीमार पड़ जाए, तो परिवार के सामने बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाती है। ऐसे में समय पर अस्पताल पहुंचना सबसे बड़ी चिंता बन जाती है।'
सड़कें बंद होने पर सेना से भी मिलती है मदद
जिले के ही एक अन्य निवासी मोहम्मद मुबाशिर ने बताया कि गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और ऐसे मरीजों के लिए चुनौतियां और भी गंभीर हो जाती हैं, जिन्हें नियमित इलाज की जरूरत होती है। सरकारी विभागों और स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ, सेना भी दूर-दराज के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों की मदद करने में अहम भूमिका निभाती है।
खासकर आपातकालीन स्थितियों और खराब मौसम के दौरान। जैसे-जैसे सर्दियां करीब आ रही हैं, स्थानीय निवासी हर साल आने वाली इन मुश्किलों को कम करने के लिए व्यावहारिक उपाय तलाश रहे हैं।
