कारगिल की सियासत में बड़े उलटफेर के संकेत, जफर अखून के BJP में जाने की अटकलें; परिषद भंग करने की करेंगे सिफारिश
कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चेयरमैन जफर अखून परिषद भंग करने की सिफारिश करेंगे और जल्द ही भाजपा में ...और पढ़ें

जफर अखून के अगले कदम पर टिकी कारगिल की सियासत। (फाइल फोटो)
HighLights
जफर अखून कारगिल परिषद भंग करने की सिफारिश करेंगे।
अखून जल्द ही भाजपा में शामिल होने की तैयारी में हैं।
यह कदम कारगिल के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव लाएगा।
नवीन नवाज, श्रीनगर। लद्दाख की राजनीति में बड़े बदलाव की आहट के बीच कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चेयरमैन एवं मुख्य कार्यकारी पार्षद मोहम्मद जफर अखून ने परिषद को भंग करने की सिफारिश करने का फैसला किया है। उनके जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कुछ पार्षदों के भी उनके साथ जाने की संभावना है। अखून का यह संभावित कदम कारगिल में राजनीतिक शक्ति संतुलन बदलने के साथ लद्दाख की व्यापक सियासत को भी प्रभावित कर सकता है।
सांकू को जिला बनाए जाने और लद्दाख की आठ हिल डेवलपमेंट काउंसिलों के परिसीमन की प्रस्तावित प्रक्रिया के बीच यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाले चुनावों में स्थानीय नेतृत्व, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और विकास से जुड़े मुद्दे राजनीतिक दलों की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
परिषदों के परिसीमन और चुनाव की तैयारी
अखून ने कहा है कि सांकू को जिला बनाने का उनका सपना पूरा हो गया है। केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन जल्द ही आठों परिषदों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करेगा, जिसके बाद चुनाव कराए जाएंगे।
उनका कहना है कि नई परिषदों के गठन से कारगिल की मौजूदा भौगोलिक संरचना प्रभावित हुई है। ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए वह परिषद को भंग करने की सिफारिश करेंगे।
कारगिल में बदल सकता है राजनीतिक समीकरण
नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख नेताओं में रहे अखून को पार्टी ने भाजपा के समर्थन से परिषद में बहुमत हासिल करने के बाद निलंबित कर दिया था। अब उनके भाजपा में शामिल होने की संभावना से कारगिल में नए राजनीतिक गठजोड़ की चर्चा तेज हो सकती है।
इस वर्ष मई में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के 16 पार्षदों ने अखून के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की थी। 30 सदस्यीय परिषद में दोनों दलों के पास बहुमत था। दोनों दलों के बीच हुए सत्ता-साझाकरण समझौते के अनुसार, ढाई वर्ष बाद परिषद का नेतृत्व कांग्रेस को सौंपा जाना था। नासिर मुंशी को इस पद का संभावित दावेदार माना जा रहा था।
हालांकि, प्रशासन ने शक्ति परीक्षण कराने का आदेश नहीं दिया। 13 जुलाई को बजट के दौरान अखून को 20 पार्षदों का समर्थन मिला। भाजपा के सहयोग से उनकी स्थिति मजबूत हुई और कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव को आगे बढ़ाने पर जोर नहीं दिया।
यदि अखून अपने साथ पर्याप्त संख्या में पार्षदों को भाजपा में ले जाते हैं, तो पार्टी को कारगिल में स्थानीय नेतृत्व मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। दूसरी ओर, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के सामने अपने समर्थकों को एकजुट रखने तथा आगामी चुनावों के लिए नई रणनीति तैयार करने की चुनौती होगी।
नए जिलों से बदलेगा चुनावी गणित
लद्दाख में पहले लेह और कारगिल दो जिले तथा दो हिल डेवलपमेंट काउंसिलें थीं। बाद में नुब्रा, चांगथांग, शाम, द्रास, जांस्कर और सांकू सहित छह नए जिलों की घोषणा की गई। इनके लिए अलग परिषदों का प्रावधान किया गया है।
पुनर्गठन के कारण कारगिल परिषद के कुछ निर्वाचन क्षेत्र दूसरी परिषदों के अंतर्गत आ गए हैं। इसी वजह से परिषद के लगभग आधा दर्जन पार्षदों के इस्तीफे की जानकारी सामने आई है। इनमें भाजपा के चार पार्षद बताए गए हैं, जिनमें दो निर्वाचित और दो मनोनीत सदस्य हैं।
नई परिषदों के गठन से स्थानीय प्रतिनिधित्व, विकास योजनाओं और प्रशासनिक संसाधनों को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। सांकू, जांस्कर और द्रास जैसे क्षेत्रों में स्थानीय पहचान तथा विकास की अपेक्षाएं चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं।
पूरे लद्दाख पर पड़ सकता है असर
अखून का संभावित भाजपा प्रवेश कारगिल में पार्टी को राजनीतिक अवसर दे सकता है, लेकिन इससे पूरे लद्दाख में भाजपा की बढ़त सुनिश्चित नहीं होती। लेह और कारगिल की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग रही हैं। इसलिए कारगिल में बनने वाला नया गठजोड़ लेह में भी समान परिणाम देगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
आठों परिषदों के चुनाव भाजपा, नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और स्थानीय राजनीतिक समूहों के लिए शक्ति प्रदर्शन का अवसर बन सकते हैं। रोजगार, विकास, क्षेत्रीय पहचान और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे चुनावी अभियान में प्रमुख रह सकते हैं।
कारगिल परिषद का मौजूदा कार्यकाल अक्टूबर 2028 तक है। हालांकि, परिसीमन और चुनाव पूर्व औपचारिकताओं के कारण चुनावी कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।
लद्दाख की कठोर सर्दियों को देखते हुए नवंबर के अंत तक मतदान कराना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में अगले वर्ष अप्रैल-मई में चुनाव होने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि अंतिम निर्णय प्रशासन को लेना है
