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जम्मू-कश्मीर के पास 18 हजार मेगावाट बिजली बनाने की ताकत, फिर भी बाहर से क्यों खरीदनी पड़ती है?

Published: Tue, 13 Oct 2026 07:00 AM (GMT+05:30)

जम्मू-कश्मीर में 18000 मेगावाट जलविद्युत क्षमता होने के बावजूद, केवल 3540 मेगावाट का उपयोग हो रहा है, जिससे सर्दियों में बिजली खरीदनी पड़ती है।

जम्मू-कश्मीर में 18,000 मेगावाट क्षमता में से सिर्फ 3,540 मेगावाट का इस्तेमाल। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर में 18,000 मेगावाट क्षमता में से सिर्फ 3,540 मेगावाट का इस्तेमाल। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. J&K की 18000 MW क्षमता का सिर्फ 19.7% उपयोग।

  2. सर्दियों में घटता उत्पादन, बढ़ती मांग से बिजली खरीद।

  3. पक्कल ढुल, किरू, कवार, रतले परियोजनाएं उम्मीद की किरण।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की नदियां बिजली उत्पादन का बड़ा आधार बन सकती हैं, लेकिन प्रदेश अभी अपनी जलविद्युत क्षमता का पांचवां हिस्सा भी इस्तेमाल नहीं कर पाया है। नतीजा यह है कि खासकर सर्दियों में बिजली की मांग बढ़ने पर बाहर से बिजली खरीदने की जरूरत पड़ती है। एक नए आर्थिक अध्ययन ने इस स्थिति के पीछे अधूरी परियोजनाओं, बिजली उत्पादन में मौसमी उतार-चढ़ाव और वितरण व्यवस्था की चुनौतियों को प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया है।

‘सोशल साइंस एंड ह्यूमैनिटीज इंटरनेशनल’ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार जलविद्युत परियोजनाओं के विकास में धीमी प्रगति, मौसम के साथ बदलता नदी जल प्रवाह और बिजली वितरण से जुड़ी चुनौतियां प्रदेश की ऊर्जा सुरक्षा के सामने बड़ी बाधाएं हैं।

चिनाब बेसिन में सबसे बड़ा खजाना

जम्मू-कश्मीर सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में जलविद्युत उत्पादन की अनुमानित क्षमता 18000 मेगावाट है। इसमें से 14867 मेगावाट क्षमता को विकास के लिए चिह्नित किया गया है, लेकिन अब तक केवल 3540.15 मेगावाट क्षमता का दोहन हुआ है।

इस तरह कुल अनुमानित क्षमता का लगभग 19.7 प्रतिशत और विकास के लिए चिह्नित क्षमता का 23.81 प्रतिशत ही इस्तेमाल हो रहा है। यानी बड़ी मात्रा में जलविद्युत संसाधन अभी भी उपयोग में आने का इंतजार कर रहे हैं।

जलविद्युत उत्पादन की संभावनाओं में चिनाब बेसिन सबसे आगे है। यहां 11283 मेगावाट क्षमता विकास के लिए चिह्नित है। झेलम बेसिन में 3084 मेगावाट और रावी बेसिन में 500 मेगावाट क्षमता चिह्नित की गई है।

अब तक इस्तेमाल की जा रही क्षमता में 2250 मेगावाट केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाओं से जबकि 1197.4 मेगावाट केंद्र शासित प्रदेश के क्षेत्र की परियोजनाओं से और लगभग 92.75 मेगावाट स्वतंत्र बिजली उत्पादकों से आता है।

सर्दियों में बढ़ जाती है बिजली चुनौती

जम्मू-कश्मीर की मौजूदा जलविद्युत व्यवस्था का बड़ा हिस्सा ऐसी परियोजनाओं पर आधारित है, जिनमें बिजली उत्पादन नदी के पानी के बहाव पर निर्भर करता है। सर्दियों में जल प्रवाह घटने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जबकि हीटिंग और घरेलू जरूरतों के कारण बिजली की मांग बढ़ जाती है। यही वह समय है, जब पर्याप्त भरोसेमंद आपूर्ति बनाए रखना चुनौती बन जाता है और बिजली खरीदने की जरूरत बढ़ सकती है।

अध्ययन का जोर इस बात पर है कि केवल स्थापित क्षमता के आंकड़े यह नहीं बताते कि पूरे साल कितनी बिजली भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध होगी। हालांकि, बिजली खरीद पर निर्भरता और वास्तविक बिजली की कमी अलग-अलग बातें हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में जम्मू-कश्मीर की 20374 मिलियन यूनिट बिजली आवश्यकता के मुकाबले 20283 मिलियन यूनिट आपूर्ति दर्ज की गई थी।

इन परियोजनाओं से बढ़ेगी बिजली उत्पादन क्षमता

ऐसे में अब पक्कलढुल, किरू, कवार और रतले परियोजनाएं जम्मू-कश्मीर की बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इनकी संयुक्त क्षमता लगभग 3,014 मेगावाट है। केंद्र सरकार के एक आधिकारिक जवाब में पक्कल ढुल और किरू की संभावित कमीशनिंग दिसंबर 2026 तथा कवार और रतले की नवंबर 2028 बताई गई थी। ये सरकारी समयसीमाएं हैं, वास्तविक शुरुआत परियोजनाओं की प्रगति पर निर्भर करेगी।

अध्ययन में इन परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि नई क्षमता का लाभ तभी मिलेगा, जब परियोजनाएं पूरी होकर बिजली उत्पादन शुरू करेंगी। इस मामले में सरकारी दस्तावेज इन्हें निर्माणाधीन बताते हैं, इसलिए इनकी स्थिति को केवल प्रस्तावित परियोजनाओं के रूप में देखना सही नहीं होगा।

सिर्फ बांध बनाना नहीं, पूरी व्यवस्था सुधारना जरूरी

जम्मू-कश्मीर के लिए चुनौती केवल नई जलविद्युत परियोजनाएं बनाने तक सीमित नहीं है। समय पर निर्माण पूरा करना, बिजली वितरण में होने वाले नुकसान कम करना और सर्दियों की बढ़ती मांग के लिए भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

यदि प्रदेश अपनी जलविद्युत क्षमता का बेहतर इस्तेमाल कर पाता है, तो इससे बिजली की उपलब्धता बढ़ाने और बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन 18000 मेगावाट की क्षमता को वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा में बदलने के लिए योजनाओं को समय पर पूरा करना और पूरे साल की जरूरतों के अनुरूप बिजली व्यवस्था तैयार करना सबसे अहम होगा।