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एक अफसर को कई सरकारी गाड़ियां क्यों? जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उठा सवाल, वाहन नीति में देरी पर स्पीकर ने लगाई फटकार

By Naveen NawazEdited By: Dallu Slathia
Published: Thu, 24 Sep 2026 04:45 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर में अधिकारियों के लिए नई वाहन नीति लागू करने में देरी पर विधानसभा अध्यक्ष ने परिवहन मंत्री सतीश शर्मा ...और पढ़ें

राथर ने कहा- 2021 से चल रही कवायद 2026 तक क्यों अटकी। (फाइल फोटो)

राथर ने कहा- 2021 से चल रही कवायद 2026 तक क्यों अटकी। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. वाहन नीति लागू करने में देरी पर स्पीकर ने मंत्री को फटकारा।

  2. अधिकारियों को कई सरकारी वाहन देने पर स्पीकर ने सवाल उठाए।

  3. "एक अधिकारी-एक वाहन" सिद्धांत पर सरकार की नीति अभी विचाराधीन है।

नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में अधिकारियों के लिए नई वाहन नीति लागू करने में हो रही देरी को लेकर विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर ने गुरुवार को परिवहन मंत्री सतीश शर्मा को कड़ी फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि जब उच्चस्तरीय समिति अपनी रिपोर्ट दे चुकी है, फिर आपको किससे सलाह चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को एक से अधिक सरकारी वाहन उपलब्ध कराने को 'गंभीर मुद्दा' बताते हुए कहा कि हम एक गरीब प्रदेश हैं, हम अधिकारियों की विलासिता पर खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकते।

परिवहन मंत्री सतीश शर्मा ने बताया, 'संशोधित कार नीति फिलहाल सरकार के विचाराधीन है, जिसमें 'एक वाहन-एक अधिकारी' का सिद्धांत प्रस्तावित है। सुरक्षा, फील्ड ड्यूटी, अतिरिक्त प्रभार और परिचालन जरूरतों के आधार पर इसमें अपवाद का प्रावधान होगा। लेकिन अध्यक्ष ने सरकार के जवाब को अपर्याप्त बताते हुए मंत्री से मौजूदा विधानसभा सत्र में नई वाहन नीति की स्थिति और इसके क्रियान्वयन पर विस्तृत जानकारी सदन के सामने रखने को कहा।

सरकारी गाड़ियों के बेड़े और खर्च पर सवाल

मामला प्रश्नकाल के दौरान उधमपुर ईस्ट से भाजपा विधायक रणबीर सिंह पठानिया के सवाल से उठा। पठानिया ने अधिकारियों को सरकारी वाहनों के आवंटन, वाहन बेड़े पर होने वाले खर्च और “एक अधिकारी-एक वाहन” के सिद्धांत को लागू करने से जुड़ा सवाल उठाया था।

परिवहन मंत्री सतीश शर्मा ने भाजपा विधायक के सवाल पर सदन को सूचित किया संशोधित कार नीति तैयार की गई है और इसमें “एक वाहन-एक अधिकारी” का सिद्धांत लागू करने का प्रस्ताव है। हालांकि, नीति अभी सरकार के विचाराधीन है और औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं हुई है।

पांच साल बाद भी नीति अधर में

मंत्री ने सदन को बताया कि महाप्रशासनिक विभाग ने नौ अप्रैल 2021 को के तहत संशोधित कार/वाहन नीति की समीक्षा और सिफारिश के लिए समिति गठित की थी। समिति ने बाद में सरकारी वाहन प्रबंधन नीति ,2026 तैयार की, लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि महाप्रशासनिक विभाग ने समिति की सिफारिशों के आधार पर अपनी रिपोर्ट इसी माह की शुरुआत में दी है7 उसका आकलन किया जा रहा है,जल्द ही इसे अधिसूचित किया जाएगा।

यही देरी अध्यक्ष राथर के निशाने पर रही। उन्होंने मंत्री से सवाल किया कि जब नई नीति तैयार करने की प्रक्रिया वर्षों पहले शुरू हो चुकी थी, तो इसे अब तक लागू क्यों नहीं किया गया। यदि नई नीति से संबंधित रिपोर्ट उन्हें पहले ही सौंप दी गई थी, तो उसके बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। अब आपको किससे सलाह लेनी है, आपने रिपोर्ट आने के बाद 24 दिन क्या किया? उन्होंने सरकार से मौजूदा सत्र के दौरान इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी सदन के सामने रखने को कहा।

मंत्री सतीश शर्मा ने देरी स्वीकार करते हुए कहा कि वह नीति का अध्ययन करने के बाद सदन में विस्तृत जानकारी देंगे और सरकार इस दिशा में तेजी से कार्रवाई करेगी।

'अगर पुरानी व्यवस्था गलत है, तो क्या आप उसे जारी रखेंगे?'

बहस का सबसे तीखा हिस्सा अतिरिक्त विभागीय प्रभार संभालने वाले अधिकारियों को अलग-अलग विभागों के लिए कई सरकारी वाहन उपलब्ध कराने के मुद्दे पर सामने आया।अध्यक्ष राथर ने सवाल किया कि यदि किसी अधिकारी के पास एक से अधिक विभागों का अतिरिक्त प्रभार है, तो प्रत्येक विभाग के लिए अलग सरकारी वाहन उपलब्ध कराने की जरूरत क्यों है।

परिवहन मंत्री ने इस व्यवस्था को “पुरानी चली आ रही व्यवस्था” बताते हुए कहा कि सरकार इसकी जांच करेगी और आवश्यकता पड़ने पर सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।मंत्री के इस जवाब पर अध्यक्ष ने सवाल किया कि केवल पुरानी व्यवस्था होने के आधार पर उसे जारी कैसे रखा जा सकता है। राथर ने तीखे अंदाज में पूछा- अगर पुरानी व्यवस्था गलत है, तो क्या आप उसे जारी रखेंगे?

अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि किसी व्यवस्था का लंबे समय से चले आना अपने आप में उसके उचित होने का प्रमाण नहीं हो सकता। उन्होंने धिकारियों को एक से अधिक सरकारी वाहन उपलब्ध कराने को “गंभीर मुद्दा” बताया और कहा कि सरकारी संसाधनों का सदुपयोग जरूरी है।

उन्होंने कहा कि हम एक गरीब राज्य हैं, जो अधिकारियों की विलासिता का खर्च नहीं उठा सकता।
अध्यक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी अधिकारी और उसके स्टाफ का काम एक वाहन से हो सकता है, तो कई वाहनों के इस्तेमाल की जरूरत क्यों पड़ रही है।उन्होंने मंत्री से कहा कि मामले को केवल मौजूदा व्यवस्था के हवाले से नहीं देखा जा सकता, बल्कि सरकारी संसाधनों के वास्तविक और तर्कसंगत इस्तेमाल के आधार पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए।

'एक अधिकारी-एक वाहन' में भी अपवाद

सरकार की प्रस्तावित नीति में “एक अधिकारी-एक वाहन” का सिद्धांत लागू करने का प्रस्ताव है। हालांकि, सुरक्षा आवश्यकताओं, फील्ड ड्यूटी, अतिरिक्त प्रभार, परिचालन संबंधी जरूरतों तथा विभागों और संस्थानों की कार्यात्मक आवश्यकताओं के आधार पर अपवाद रखे जाने का प्रावधान प्रस्तावित है।

सरकार के जवाब से यह भी सामने आया कि फिलहाल सभी विभागों, पीएसयू, बोर्डों और स्वायत्त निकायों में किसी अधिकारी को आवंटित सरकारी वाहनों की संख्या को लेकर एक समान बाध्यकारी सीमा नहीं है।

यही स्थिति नई नीति की आवश्यकता और उसके जल्द क्रियान्वयन के सवाल को और महत्वपूर्ण बनाती है।

वाहन से आगे बढ़ा मामला, खर्च पर भी सवाल

पठानिया ने सरकारी वाहनों के आवंटन के साथ-साथ उनके संचालन पर होने वाले खर्च को भी सवालों के घेरे में लिया। उन्होंने एक से अधिक वाहनों से जुड़े पीओएल (पेट्रोल,तेल व लुब्रीकेंट्स) दावों तथा कथित दोहरे टीए/डीए दावों पर सरकार से जवाब मांगा।उन्होंने वाहनों के वास्तविक इस्तेमाल और उन पर होने वाले खर्च की जांच के लिए विभागीय आडिट और भौतिक सत्यापन के अलावा स्वतंत्र तृतीय-पक्ष ऑडिट की संभावना पर भी सवाल उठाया।

परिवहन मंत्री ने बताया कि स्टेट मोटर गैरेज विभाग समय-समय पर वाहन बेड़े का ऑडिट और भौतिक सत्यापन करता है।

मंत्री को सत्र में देना होगा विस्तृत जवाब

विधानसभा में हुई बहस के बाद अब सरकार को नई वाहन नीति की स्थिति, उसके लागू होने की समयसीमा और अधिकारियों को एक से अधिक वाहन उपलब्ध कराने की मौजूदा व्यवस्था पर विस्तृत स्पष्टीकरण देना होगा।