सरकारी योजनाएं तो हैं, पर जरूरतमंदों तक पहुंच कितनी? जम्मू-कश्मीर में सामाजिक विकास पर रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
जम्मू-कश्मीर में सरकारी सुविधाओं के विस्तार के बावजूद, हाशिये पर मौजूद तबके दस्तावेज, शिक्षा- रोजगार जैसी चुनौतियों के कारण लाभ ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर के सामाजिक विकास पर रिपोर्ट ने उठाए सवाल। (फोटो- पीटीआई)
HighLights
जम्मू-कश्मीर में SC प्रमाणपत्रों में क्षेत्रीय असमानताएँ उजागर हुईं।
चार साल के बच्चों का आंगनवाड़ी नामांकन चिंताजनक रूप से कम।
प्रवासी श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुँचने में बाधाएँ।
नवीन नवाज, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में विकास की रफ्तार के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो सरकारी योजनाओं की पहुंच और सामाजिक न्याय के दावों की असली परीक्षा लेती है। स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनवाड़ी सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन समाज के सबसे कमजोर तबकों तक इनका लाभ पहुंचाना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। कहीं प्रमाणपत्र और दस्तावेज रास्ता रोक रहे हैं, तो कहीं दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, मौसमी पलायन और शिक्षा तक सीमित पहुंच परिवारों के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
राजीव गांधी इंस्टीट्यूट आफ कंटेम्परेरी स्टडीज के अध्ययन ‘हरा भरा स्वराज : जम्मू-कश्मीर के लिए नई दृष्टि और उसे साकार करने की नई रणनीति’ में जम्मू-कश्मीर के पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था का विश्लेषण करते हुए सामाजिक विकास की इन चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया गया है।
अध्ययन का महत्वपूर्ण संकेत यह है कि विकास का आकलन केवल निर्मित सुविधाओं और योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि सबसे वंचित व्यक्ति तक सहायता पहुंच रही है या नहीं।
जम्मू और कश्मीर के बीच बड़ा अंतर
अध्ययन में अनुसूचित जाति समुदायों के लिए प्रमाणपत्र जारी करने के आंकड़े सामाजिक योजनाओं तक पहुंच के सवाल को सामने लाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 से 2025 के बीच जारी 70,268 अनुसूचित जाति प्रमाणपत्रों में लगभग 99.2 प्रतिशत जम्मू संभाग और करीब 0.7 प्रतिशत कश्मीर घाटी में जारी किए गए।
अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि इस अंतर को क्षेत्रीय जनसंख्या वितरण, समुदायों की भौगोलिक मौजूदगी और प्रशासनिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने की जरूरत है। यह समझना भी जरूर जरूरी है कि पात्र लोगों को प्रमाणपत्र बनवाने, छात्रवृत्ति प्राप्त करने और सरकारी योजनाओं तक पहुंचने में अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
रिपोर्ट में बताया गया है कि जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जाति समुदायों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक अवसरों में आठ प्रतिशत आरक्षण का प्रविधान है। लेकिन इसका लाभ तभी सुनिश्चित होगा, जब पात्र विद्यार्थियों और नौकरी के इच्छुक युवाओं को आवश्यक दस्तावेज, शिक्षा और अवसर समय पर उपलब्ध हों।
वाल्मीकि समुदाय के सामने अवसरों की चुनौती
अध्ययन में वाल्मीकि समुदाय की स्थिति को ऐतिहासिक अवसर-असमानता के उदाहरण के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पहले लागू कुछ कानूनी और निवास संबंधी व्यवस्थाओं के कारण समुदाय के लोगों के सरकारी रोजगार विकल्प सीमित रहे।
वर्ष 2019 के बाद कानूनी ढांचे में बदलाव से व्यापक अवसरों तक पहुंच का रास्ता खुला, लेकिन शिक्षा, रोजगार और सामाजिक स्वीकार्यता से जुड़ी चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
आंगनवाड़ी में चार साल के बच्चों का नामांकन चिंता का विषय
शुरुआती बाल विकास के मोर्चे पर भी सुधार की गुंजाइश दिखाई देती है। एएसईआर 2024 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में तीन वर्ष के बच्चों का आंगनवाड़ी केंद्रों में नामांकन 64.9 प्रतिशत था, जबकि चार वर्ष के बच्चों के लिए यह 37.7 प्रतिशत रहा।
प्रारंभिक उम्र में पोषण, देखभाल और सीखने के अवसर बच्चों के आगे के शैक्षणिक विकास की नींव तैयार करते हैं। ऐसे में चार वर्ष के बच्चों की अपेक्षाकृत कम भागीदारी पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। आंगनवाड़ी सेवाओं को मजबूत करने, अभिभावकों को जागरूक करने और बच्चों तक नियमित रूप से पहुंचने से इस अंतर को कम किया जा सकता है।
दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी एक बड़ी चुनौती है। कठोर सर्दियां, बिखरी आबादी और परिवहन की सीमित सुविधाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, नियमित जांच तथा पोषण संबंधी सेवाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
3 से 5 लाख प्रवासी श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा पहुंचाना चुनौती
जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था में दूसरे राज्यों से आने वाले प्रवासी श्रमिक भी योगदान देते हैं। अध्ययन में कामकाजी मौसम के दौरान ऐसे श्रमिकों की संख्या लगभग तीन से पांच लाख आंकी गई है। ये श्रमिक निर्माण, कृषि और अन्य गतिविधियों में काम करते हैं, लेकिन उनके और उनके परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच आसान नहीं होती।
स्थायी पते, राशन कार्ड, बैंक खाते और अन्य दस्तावेजों से जुड़ी शर्तें मौसमी रूप से स्थान बदलने वाले परिवारों के लिए बाधा बन सकती हैं। बच्चों की पढ़ाई में निरंतरता बनाए रखना और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना भी उनके सामने महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं।
रिपोर्ट में राजौरी सहित कुछ क्षेत्रों में मौसमी रूप से आने वाले बंजारा परिवारों का उल्लेख किया गया है। ऐसे परिवारों की आजीविका छोटे सामान की बिक्री पर निर्भर हो सकती है, जबकि स्थायी दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाना कठिन होता है
357 गांवों के विकास की पहल
अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025-26 में प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना के तहत जम्मू-कश्मीर के 357 गांवों को विकास के लिए चुना गया। इनमें 349 गांवों की ग्राम विकास योजनाओं को मंजूरी मिली और 257 गांवों को निर्धारित मानकों के आधार पर आदर्श ग्राम घोषित किया गया।
यह पहल बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक विकास को मजबूत करने का अवसर देती है लेकिन यह तभी लाभदायक होगी जब गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता में ठोस सुधार दिखाई दे।
सरकारी योजनाओं की प्रक्रिया सरल हो
शोध में अहम योगदान करने वाले डॉ. राजा मुजफ्फर बट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सामाजिक विकास की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि सरकारी योजनाओं को लोगों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए। आवेदन प्रक्रिया सरल करने, प्रमाणपत्र जारी करने में सहायता देने, स्थानीय भाषाओं में जानकारी उपलब्ध कराने और प्रवासी परिवारों के लिए योजनाओं की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करने से बड़ी आबादी को राहत मिल सकती है।
समावेशी विकास का अर्थ केवल सुविधाओं का विस्तार नहीं, बल्कि उन बाधाओं को दूर करना भी है, जो कमजोर तबकों को इन सुविधाओं का लाभ उठाने से रोकती हैं।
