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कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों में कितने हिम तेंदुए? गणना का दूसरा चरण शुरू, जानिए कैसे होगी मॉनिटरिंग

Published: Fri, 16 Oct 2026 01:05 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर के ऊंचे पहाड़ों में हिम तेंदुओं की वास्तविक संख्या और विचरण क्षेत्रों का पता लगाने के लिए इनकी गणना का दूसरा चरण शुरू हो रहा है।

कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों में हिम तेंदुओं की संख्या जानने के लिए नई गणना।

कश्मीर के बर्फीले पहाड़ों में हिम तेंदुओं की संख्या जानने के लिए नई गणना।

HighLights

  1. जम्मू-कश्मीर में हिम तेंदुओं की गणना का दूसरा चरण शुरू।

  2. आधुनिक तकनीकों से दुर्लभ वन्यजीवों की निगरानी और संरक्षण।

  3. जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप हिम तेंदुओं के लिए चुनौती।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के ऊंचे पहाड़ों में बर्फ के बीच रहने वाले हिम तेंदुए अब वैज्ञानिक निगरानी के नए दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं। इनकी वास्तविक संख्या कितनी है, वे किन इलाकों में विचरण करते हैं और बदलते पर्यावरण का उनके जीवन पर क्या असर पड़ रहा है, इन सवालों के जवाब खोजने के लिए देश में हिम तेंदुओं की गणना का दूसरा चरण शुरू किया जा रहा है। कैमरा ट्रैप, रेडियो टेलीमेट्री और आनुवंशिक विश्लेषण जैसी आधुनिक तकनीकों से इस दुर्लभ वन्यजीव के संरक्षण को मजबूत करने की तैयारी है।

भारत में पहली बार हुए स्नो लेपर्ड पॉपुलेशन असेसमेंट ऑफ इंडिया (एसपीएआइ) में जम्मू-कश्मीर में नौ हिम तेंदुओं की मौजूदगी का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, बाद में कैमरा ट्रैप के माध्यम से किए गए अध्ययनों ने इनकी संख्या इससे अधिक होने की संभावना जताई।

जम्मू-कश्मीर के लगभग 12000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में किए गए अध्ययनों में हिम तेंदुओं के संभावित आवासों की पहचान की गई और इनकी संख्या 20 तक होने का अनुमान सामने आया। हालांकि, यह संख्या अंतिम आधिकारिक गणना नहीं है। किश्तवाड़ हिमालय क्षेत्र के पाडर, वारवान और किश्तवाड़ हाई एल्टीट्यूड नेशनल पार्क को इनकी मौजूदगी के महत्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है।

कैमरे से लेकर डीएनए जांच तक, ऐसे होगी निगरानी

हिम तेंदुए दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं, जहां पारंपरिक तरीकों से उनकी निगरानी करना मुश्किल है। ऐसे में कैमरा ट्रैप से उनकी मौजूदगी दर्ज करने, रेडियो टेलीमेट्री से उनकी आवाजाही समझने और आनुवंशिक नमूनों के विश्लेषण से उनकी जैविक विविधता का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। इन तकनीकों से यह जानने का प्रयास होगा कि हिम तेंदुए किन क्षेत्रों में रहते हैं, उनका आवास कितना विस्तृत है और इंसानी गतिविधियों वाले इलाकों से उनका कितना संपर्क होता है।

हिम तेंदुओं के सामने पशुओं की चराई, जंगली शिकार के लिए चरागाहों में प्रतिस्पर्धा, प्राकृतिक आवासों में मानवीय हस्तक्षेप और इंसान-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियां हैं। जलवायु परिवर्तन भी इनके लिए चिंता का विषय है।

इससे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इनके अनुकूल आवास सिमट सकते हैं। साथ ही, सामान्य तेंदुए जैसे अधिक अनुकूलन क्षमता वाले शिकारी इनके क्षेत्रों में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे दोनों प्रजातियों के आवासों में बदलाव की आशंका है।

रूस-भारत सहयोग से संरक्षण को मिलेगी मजबूती

पिछले महीने मॉस्को में आयोजित रूस-भारत गोलमेज बैठक में भारत ने हिम तेंदुओं के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक तरीकों से किए जा रहे प्रयासों को सामने रखा। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और भारतीय वन्यजीव संस्थान के अधिकारियों ने निगरानी तकनीकों में हुई प्रगति की जानकारी दी।

बैठक का आयोजन इंटररीजनल एसोसिएशन 'इरबिस' और इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस की साझेदारी के तहत किया गया था। इसका उद्देश्य हिम तेंदुओं के अध्ययन और संरक्षण में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना था।

अब एसपीएआइ 2.0 के तहत जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिम तेंदुओं की संख्या और वितरण का अधिक स्पष्ट आकलन मिलने की उम्मीद है। इससे संवेदनशील आवासों की सुरक्षा, चरवाहों के साथ संभावित संघर्ष को समझने और संरक्षण की रणनीति बनाने में मदद मिल सकती है।