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370 हटने के बाद प्रदेश में 77% घटा आतंक, 90% घटी पत्थरबाजी, 7 साल में कितना बदला जम्मू-कश्मीर?

By Naveen Sharma Edited By: Rahul Sharma
Published: Tue, 04 Aug 2026 11:42 AM (IST)

अनुच्छेद 370 हटने के सात साल बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं में 77% और पत्थरबाजी में 90% की कमी आई है। हालांकि, आतंकवाद का स्वरूप बदला है।

अनुच्छेद 370 के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंक और पत्थरबाजी में भारी कमी, लेकिन चुनौती बरकरार।

अनुच्छेद 370 के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंक और पत्थरबाजी में भारी कमी, लेकिन चुनौती बरकरार।

HighLights

  1. आतंकी घटनाएं 77% घटीं, पत्थरबाजी में 90% की कमी।

  2. आतंकवाद का स्वरूप बदला, लक्षित हत्याएं और छोटे समूह सक्रिय।

  3. जम्मू के पहाड़ी क्षेत्रों में आतंकियों की नई चुनौती उभरी।

नवीन नवाज, श्रीनगर। अनुच्छेद 370 निरस्त हुए सात वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इन सात वर्षों में जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। आतंकवादी घटनाओं में भारी कमी, पत्थरबाजी और संगठित सड़क हिंसा का लगभग समाप्त हो जाना तथा सुरक्षा बलों और नागरिकों की मौतों में गिरावट इस बदलाव के प्रमुख संकेत हैं।लेकिन यह बदलाव आतंकवाद के अंत की घोषणा नहीं करता।

बंदूक की आवाज कमजोर जरूर हुई है, पर चुनौती ने अपना चेहरा बदल लिया है। आतंकवादी संगठनों ने अब बड़े हमलों और खुले टकराव की रणनीति छोड़कर छोटे समूहों, लक्षित हत्याओं और अचानक हमलों का रास्ता अपनाया है। उनका उद्देश्य अब सैन्य नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ भय का वातावरण बनाना और सुरक्षा तंत्र को लगातार चुनौती देना है।

सात वर्षों का अनुभव बताता है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का पारंपरिक ढांचा कमजोर हुआ है, लेकिन उसकी छाया अभी बनी हुई है। खासकर जम्मू संभाग के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में आतंकियों की सक्रियता सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बनकर उभरी है।

आंकड़े बताते हैं बदली तस्वीर

जम्मू-कश्मीर पुलिस के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 से 2025 के बीच आतंकवादी घटनाओं में लगभग 77 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस अवधि में घटनाओं की संख्या 151 से घटकर 35 रह गई। सुरक्षा अभियानों में मारे गए आतंकवादियों की संख्या 193 से घटकर 46 पर आ गई, जबकि सुरक्षा बलों के बलिदानियों की संख्या भी 30 से घटकर 17 रह गई।

लंबी अवधि के आंकड़े भी इसी बदलाव की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2009 से 4 अगस्त 2019 तक जम्मू-कश्मीर में 1,435 आतंकी घटनाएँ हुईं। इनमें 382 नागरिकों और 672 सुरक्षा कर्मियों की जान गई, जबकि 1,827 आतंकवादी मारे गए।

इसके मुकाबले 5 अगस्त 2019 से 1 अगस्त 2026 तक 652 आतंकवादी घटनाएँ दर्ज की गईं। इस दौरान 191 नागरिकों की मौत हुई, 213 सुरक्षा कर्मियों ने बलिदान दिया और 858 आतंकवादी मारे गए। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि आतंकवाद का प्रभाव क्षेत्र और उसकी क्षमता दोनों में कमी आई है।

घाटी से पहाड़ों की ओर बदला आतंक का भूगोल

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार आतंकवाद का केंद्र अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी दक्षिण कश्मीर के कई इलाके आतंकवादी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र माने जाते थे, लेकिन पिछले दो वर्षों में राजौरी, पुंछ, रियासी, कठुआ, डोडा, किश्तवाड़ और उधमपुर जैसे पहाड़ी जिलों में सक्रिय छोटे आतंकी समूहों ने सुरक्षा चुनौती बढ़ाई है।

इन क्षेत्रों की भौगोलिक कठिनाइयाँ आतंकियों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती हैं। घने जंगल, ऊंचे पहाड़ी इलाके और सीमित पहुंच वाले क्षेत्र उन्हें छिपने, छोटे समूहों में गतिविधियां चलाने और हमला कर भाग निकलने का अवसर देते हैं।

सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार अब आतंकियों की रणनीति आमने-सामने की लड़ाई से बचने और कम संसाधनों में अधिक प्रभाव पैदा करने की है। यही कारण है कि लक्षित हत्याएँ, गैर-स्थानीय श्रमिकों को निशाना बनाना और छोटे हमले उनकी प्राथमिक रणनीति बन गए हैं।

'सॉफ्ट टारगेट' पर वार, मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश

दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में दो गैर-स्थानीय मजदूरों की हत्या को सुरक्षा अधिकारी इसी बदली हुई रणनीति से जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि ऐसे हमलों का उद्देश्य केवल जान-माल का नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि डर का माहौल बनाकर सामान्य स्थिति की वापसी को प्रभावित करना भी है।

एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी के अनुसार आतंकवादी अब लंबे समय तक किसी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के बजाय जंगलों और दुर्गम इलाकों में छिपकर अवसर के अनुसार हमला करने की कोशिश करते हैं। पीर पंजाल और चिनाब घाटी के क्षेत्र इस लिहाज से आतंकियों की गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

सबसे बड़ा बदलाव: सड़क हिंसा का अंत

अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ा परिवर्तन संगठित सड़क हिंसा में आई गिरावट है। पत्थरबाजी की घटनाओं में लगभग 90 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है। बंद, हिंसक प्रदर्शन और सुरक्षा बलों पर भीड़ के हमले अब बीते दौर की तुलना में बहुत कम हो गए हैं।

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि खुफिया तंत्र की मजबूती, लगातार अभियानों और पुलिस की सक्रिय रणनीति ने आतंकवादी संगठनों की सार्वजनिक समर्थन जुटाने की क्षमता को कमजोर किया है। अब वे पहले की तरह भीड़ या खुले नेटवर्क के सहारे अपनी गतिविधियां संचालित नहीं कर पा रहे हैं।

नई चुनौती, नई रणनीति की जरूरत

सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब चुनौती आतंकवादी घटनाओं की संख्या नहीं, बल्कि उनका बदलता स्वरूप है। छोटे आतंकी समूह सीमित हथियारों और कम संख्या के बावजूद ऐसे हमले करने की कोशिश कर रहे हैं जिनका प्रभाव व्यापक हो।

आंकड़े जम्मू-कश्मीर में सुधार की कहानी जरूर बताते हैं, लेकिन वे खतरे के पूरी तरह समाप्त होने का संकेत नहीं देते। आने वाले समय में सुरक्षा व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एजेंसियाँ आतंकवाद के बदले हुए स्वरूप को कितनी तेजी से समझती हैं और उसके अनुरूप अपनी रणनीति को कितना प्रभावी बनाती हैं।