आरक्षण रिपोर्ट क्यों छिपाई? विधानसभा सत्र से पहले श्रीनगर में PDP का हल्लाबोल, इल्तिजा मुफ्ती ने उमर सरकार को घेरा
पीडीपी ने इल्तिजा मुफ्ती के नेतृत्व में श्रीनगर में आरक्षण युक्तिसंगतीकरण रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। ...और पढ़ें

श्रीनगर में इल्तिजा मुफ्ती के नेतृत्व में PDP का सरकार के खिलाफ प्रदर्शन। फोटो- साहिल मीर
HighLights
पीडीपी ने श्रीनगर में आरक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की।
इल्तिजा मुफ्ती ने रिपोर्ट गोपनीय रखने पर सरकार को घेरा।
विधानसभा सत्र में आरक्षण नीति पर तीखी बहस अपेक्षित है।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में आरक्षण नीति का मुद्दा अब सड़क से विधानसभा तक पहुंच गया है। सोमवार से शुरू हो रहे विधानसभा के शरद सत्र से ठीक पहले पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने शनिवार को श्रीनगर में प्रदर्शन कर कैबिनेट सब-कमेटी की आरक्षण युक्तिसंगतीकरण रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग तेज कर दी। पार्टी नेता इल्तिजा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी कार्यकर्ताओं ने पार्टी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
आरक्षण के मुद्दे पर पीडीपी का यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब विधानसभा का छह सत्र 21 से 30 सितंबर तक प्रस्तावित है। सत्र में बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों, आउटसोर्सिंग और सरकार के चुनावी वादों को लेकर विपक्ष के सवालों के बीच आरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से उठने के आसार हैं।
नेशनल कान्फ्रेंस के बागी सांसद आगा सैयद रुहुल्ला भी इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री के कटु आलोचक हैं। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि वह किसी भी आरक्षित वर्ग के कोटे में कटौती नहीं होने देगी।पीपुल्स कान्फ्रेंस में भी आरक्षण को युक्तिसंगत बनाने को लेकर लगातार सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही है।
सड़क पर प्रदर्शन, सदन में हंगामे की जमीन तैयार
इल्तिजा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी के आज के प्रदर्शन को महज रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग तक सीमित नहीं देखा जा रहा। पार्टी ने आरक्षण को युवाओं, खुले वर्ग के अभ्यर्थियों और सरकारी नौकरियों के अवसरों से जोड़कर सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की है।
सोमवार को सदन की कार्यवाही शुरू होने पर इस मुद्दे पर विपक्षी सदस्यों की ओर से सरकार से जवाब मांगने की संभावना है।
हालांकि विधानसभा में किस स्तर पर हंगामा होगा, यह सदन की कार्यवाही और विभिन्न दलों की रणनीति पर निर्भर करेगा। लेकिन आरक्षण का मुद्दा पहले से ही सरकार और राजनीतिक दलों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।
इल्तिजा बोलीं- रिपोर्ट गोपनीय क्यों?
प्रदर्शन के दौरान इल्तिजा मुफ्ती ने कहा कि आरक्षण का मुद्दा जम्मू-कश्मीर के छात्रों और सरकारी नौकरी के दावेदारों के भविष्य से सीधे जुड़ा है। उन्होंने सरकार से सब-कमेटी की सिफारिशों को सार्वजनिक करने और उन पर सार्वजनिक बहस कराने की मांग की।
इल्तिजा ने सरकार पर रिपोर्ट जारी करने में देरी का आरोप लगाया। उन्होंने सरकारी भर्तियों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियां 'बेची' जा रही हैं। यह इल्तिजा मुफ्ती का राजनीतिक आरोप है; इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हुई है। प्रदर्शनकारियों ने ईडब्ल्यूएस कोटे और आवासीय शर्त से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए।
नेशनल कान्फ्रेंस के भीतर भी आरक्षण पर मतभेद
आरक्षण का मुद्दा सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए भी पूरी तरह सहज नहीं रहा है। श्रीनगर के सांसद और नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग रुख रखने वाले आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी लंबे समय से मौजूदा आरक्षण व्यवस्था और सरकार के रुख पर सवाल उठाते रहे हैं।
सितंबर में उन्होंने कहा था कि आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को फाइल की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। यानी सरकार को विधानसभा में विपक्ष के साथ-साथ अपने ही खेमे से उठने वाले सवालों का भी सामना करना पड़ सकता है।
भाजपा का रुख- किसी आरक्षित वर्ग के कोटे में कटौती नहीं
दूसरी ओर भाजपा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव को लेकर यह स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी आरक्षित वर्ग के मौजूदा कोटे में कटौती स्वीकार नहीं होगी। ऐसे में यदि सरकार सब-कमेटी की सिफारिशों को लेकर सदन में कोई संकेत देती है तो आरक्षण के लाभार्थी वर्गों के हितों और खुले वर्ग की मांगों के बीच संतुलन का सवाल महत्वपूर्ण होगा।
यही वजह है कि विधानसभा में सरकार के लिए आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहने की संभावना है।
दिसंबर 2024 में बनी थी सब-कमेटी
खुले वर्ग के अभ्यर्थियों के विरोध और विभिन्न पक्षों से मिले ज्ञापनों के बाद उमर अब्दुल्ला सरकार ने दिसंबर 2024 में आरक्षण नीति के युक्तिसंगतीकरण की समीक्षा के लिए कैबिनेट सब-कमेटी गठित की थी।
स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री सकीना इटू को इसका अध्यक्ष बनाया गया था। मंत्री जावेद अहमद राणा और सतीश शर्मा इसके सदस्य थे।
कमेटी ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप दीं। दिसंबर 2025 में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा था कि कैबिनेट आरक्षण के युक्तिसंगतीकरण का प्रस्ताव उपराज्यपाल को भेज चुकी है।
केंद्र के स्तर पर भी चर्चा में रहा आरक्षण
आरक्षण का मुद्दा केवल जम्मू-कश्मीर सरकार तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 4 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के दौरान राज्य का दर्जा बहाल करने के साथ आरक्षण नीति के युक्तिसंगतीकरण का मुद्दा भी उठाया था। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार दोनों नेताओं के बीच इस विषय पर चर्चा हुई थी।
इससे संकेत मिलता है कि आरक्षण नीति में प्रस्तावित बदलाव की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्र के स्तर पर भी लंबित है।
सदन में क्या होगा?
सोमवार से शुरू होने वाले सत्र में आरक्षण के साथ बेरोजगारी और सरकारी भर्ती के मुद्दे भी सरकार के लिए चुनौती बन सकते हैं। विधानसभा का आधिकारिक कैलेंडर 21 से 30 सितंबर तक का है।
ऐसे में आज का पीडीपी प्रदर्शन विधानसभा के भीतर होने वाली राजनीतिक बहस की शुरुआती जमीन तैयार करता दिखाई दे रहा है। सदन में सरकार से सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जा सकता है कि जब आरक्षण सब-कमेटी अपनी रिपोर्ट दे चुकी है तो उसे सार्वजनिक करने में क्या अड़चन है और उसकी सिफारिशों पर अंतिम फैसला कब होगा?
आरक्षण को लेकर फिलहाल तीन अलग-अलग दबाव दिखाई दे रहे हैं—खुले वर्ग के अभ्यर्थियों की युक्तिसंगतीकरण की मांग, आरक्षित वर्गों के मौजूदा अधिकारों की रक्षा और सरकार की ओर से केंद्र के साथ प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कवायद। इन तीनों के बीच संतुलन बनाना विधानसभा सत्र में सरकार के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती होगी।
क्या है मौजूदा आरक्षण व्यवस्था?
जम्मू-कश्मीर आरक्षण नियमों में मार्च 2024 के संशोधन के बाद प्रमुख ऊर्ध्वाधर आरक्षण इस प्रकार है...
अनुसूचित जाति (एससी): 8 प्रतिशत
अनुसूचित जनजाति (एसटी): 20 प्रतिशत
इसमें पहले से सूचीबद्ध जनजातियों के साथ 2024 में जोड़े गए पहाड़ी/पाडरी समूहों के लिए भी प्रावधान शामिल है।
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी): 8 प्रतिशत
अंतरराष्ट्रीय सीमा/एलओसी से सटे क्षेत्रों के निवासी (एएलसी/आइबी): 4 प्रतिशत
पिछड़े क्षेत्र (आरबीए): 10 प्रतिशत
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्लयूएस): 10 प्रतिशत
इसके अतिरिक्त पूर्व सैनिकों के लिए 6 प्रतिशत और दिव्यांगजन के लिए 4 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का प्रावधान है।
