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गोल्डन कार्ड से इलाज कराने वालों को झटका, जम्मू-कश्मीर में निजी अस्पतालों में डायलिसिस-सर्जरी पर ब्रेक; जानें मामला

Published: Sat, 19 Sep 2026 05:44 PM (IST)

जम्मू कश्मीर के निजी अस्पतालों ने आयुष्मान भारत-पीएमजे सेहत स्कीम के तहत सेवाएं देना बंद कर दिया है, क्योंकि ₹500 ...और पढ़ें

निजी अस्पतालों में फिलहाल मरीज नहीं ले सकेंगे पीएमजे सेहत स्कीम का लाभ।  (फाइल फोटो)

निजी अस्पतालों में फिलहाल मरीज नहीं ले सकेंगे पीएमजे सेहत स्कीम का लाभ (फाइल फोटो)

HighLights

  1. निजी अस्पतालों में पीएमजे सेहत स्कीम के तहत इलाज फिलहाल रुका।

  2. ₹500 करोड़ से अधिक के भुगतान लंबित होने से संकट।

  3. मरीजों और निजी स्वास्थ्य केंद्रों को भारी आर्थिक परेशानी।

जागरण संवाददाता, श्रीनगर। निजी अस्पतालों में डायलिसिस, गॉल ब्लैडर और अन्य सर्जरी फिलहाल गोल्डन कार्ड पर नहीं हो पाएंगी। आयुष्मान भारत-पीएमजे सेहत योजना के तहत भुगतान में बढ़ते संकट ने जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा फंडेड स्वास्थ्य बीमा कवरेज को एक बार फिर खतरे में डाल दिया है। निजी स्वास्थ्य केंद्रों पर भारी आर्थिक दबाव है, क्योंकि 500 करोड़ रुपये से अधिक के क्लेम का भुगतान कई महीनों से लंबित है।

ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा सिस्टम पहले से ही चरमराने लगा है। इसके चलते अधिकांश निजी अस्पतालों ने पीएमजे सेहत योजना के तहत मरीजों का इलाज करना कम कर दिया है।

पहले, प्रदेश के लोगों के पास निजी अस्पतालों से पेसमेकर लगवाने, गाल ब्लैडर की सर्जरी और कई दूसरी सर्जरी करवाने का विकल्प था। अब ये विकल्प कम हो गए हैं। जहां जम्मू कश्मीर सरकार ने पीएमजे सेहत स्कीम के तहत कई इलाज सिर्फ़ सरकारी अस्पतालों तक सीमित कर दिए हैं, वहीं कई दूसरे इलाज के लिए निजी अस्पताल मना कर रहे हैं क्योंकि वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

मरीज़ों और निजी अस्पतालों दोनों की चिंता बढ़ी

इस स्थिति ने मरीज़ों और स्कीम से जुड़े निजी अस्पतालों, दोनों की चिंता बढ़ा दी है। हालाँकि स्टेट हेल्थ एजेंसी ने पहले सेहत स्कीम के तहत इलाज से मना करने वाले निजी अस्पतालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है, लेकिन अस्पतालों के पास अब स्कीम से बाहर निकलने का विकल्प तलाशने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है।

सूत्रों ने बताया कि एसएचए की तरफ़ से स्कीम से जुड़े निजी अस्पतालों का 500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का बकाया है। सरकारी रिकार्ड से इस आंकड़े की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी। हालांकि, यह मामला स्कीम से जुड़े निजी अस्पतालों की ओर से बरसों से लगातार की जा रही शिकायतों के बीच सामने आया है। इस साल जून में, निजी अस्पतालों और डायलिसिस सेंटरों ने 1 जुलाई से इस स्कीम से हटने की धमकी दी थी।

उन्होंने मंज़ूर किए गए क्लेम के पेमेंट में देरी और बढ़ते आर्थिक दबाव का हवाला दिया, जिससे उनके लिए रोज़मर्रा का कामकाज चलाना भी मुश्किल हो रहा था। इसके बाद सरकार ने 175 करोड़ रुपये मंज़ूर किए, जो हालांकि बकाया रकम का सिर्फ़ एक हिस्सा था।

पेमेंट लगभग 8 महीनों से अधर में

अस्पतालों के एडमिनिस्ट्रेटर और उनके प्रतिनिधियों ने अगस्त में फिर से यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पेमेंट लगभग आठ महीनों से अधर में है। निजी अस्पतालों के प्रतिनिधियों ने कहा कि पेमेंट को लेकर कैशलेस इलाज में बार-बार संकट आ रहा है।एक प्रतिनिधि ने बताया कि इस गतिरोध के कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण फंड की कमी है।

उन्होंने कहा, 'जब एसएचए के पास फंड होता है, तो वह सबसे पहले सरकारी अस्पतालों को भुगतान करता है और निजी अस्पतालों को बाद में भुगतान करता है। इसके अलावा, इसे लागू करने के लिए इंश्योरेंस-आधारित माडल को प्राथमिकता देने के कारण भी पेमेंट आसानी से नहीं हो पा रहा है।'

उन्होंने कहा, 'वित्त विभाग बिना इंश्योरेंस व्यवस्था के इस स्कीम को चलाने की अनुमति देने में हिचकिचा रहा है। टेंडर प्रक्रिया के ज़रिए चुने गए इंश्योरर को लेकर भी कुछ मतभेद हैं।' सरकारी रिकार्ड बताते हैं कि एसएचए-जम्मू कश्मीर ने इसे लागू करने के लिए हमेशा इंश्योरेंस मॉडल का इस्तेमाल किया है। इसने इंश्योरेंस कंपनी चुनने के लिए टेंडर प्रक्रिया अपनाई थी और आधिकारिक टेंडर रिलायंस जनरल इंश्योरेंस को दिया गया था।