IAS-JKAS विवाद में जांच के आदेश, पर कार्रवाई कौन करेगा? जम्मू-कश्मीर में LG और सरकार के अधिकारों पर फिर छिड़ी बहस
जम्मू-कश्मीर में IAS अधिकारी के खिलाफ जांच ने LG और सरकार के अधिकार क्षेत्र पर नई बहस छेड़ दी है। ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर में LG और सरकार के बीच अधिकारों का सवाल फिर चर्चा में। (फाइल फोटो)
HighLights
आईएएस अधिकारी के खिलाफ जांच से अधिकार क्षेत्र पर बहस।
उपराज्यपाल की अखिल भारतीय सेवाओं पर महत्वपूर्ण भूमिका।
जांच के दौरान अधिकारियों के पद बदलने पर सवाल।
नवीन नवाज, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में वरिष्ठ IAS अधिकारी कुमार राजीव रंजन और जेकेएएस अधिकारी बीनिश वानी के बीच हुई कथित अभद्र कहासुनी की जांच के आदेश ने प्रशासनिक जवाबदेही के साथ-साथ जांच के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। महा प्रशासनिक विभाग (जीएडी) ने घटना की जांच 15 दिन में पूरी कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बार फिर केंद्र शासित प्रदेश में निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के बीच प्रशासनिक शक्तियों के बंटवारे तथा अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों पर नियंत्रण के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
सवाल यह है कि जब आरोप किसी आइएएस अधिकारी पर हों और कथित तौर पर दुर्व्यवहार का सामना करने वाली अधिकारी जेकेएएस कैडर से संबंधित हों, तब जांच शुरू करने, तथ्यों का निर्धारण करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के अधिकार किस प्राधिकारी के पास हैं?
क्या जीएडी का जांच आदेश और अंतिम कार्रवाई का अधिकार एक ही प्रशासनिक व्यवस्था के तहत आते हैं, या इनके लिए अलग-अलग नियमों का पालन करना होगा?
14 अक्टूबर की बैठक में हुआ था विवाद
गत 14 अक्टूबर को मिशन युवा की वर्चुअल समीक्षा बैठक के दौरान आइएएस अधिकारी कुमार राजीव रंजन और जेकेएएस अधिकारी बीनिश वानी के बीच बहस हुई थी। बैठक के सामने आए वीडियो में रंजन को वानी के प्रति आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए सुना गया। विवाद बढ़ने के बाद मामला सार्वजनिक चर्चा में आ गया और अधिकारी के आचरण पर सवाल उठने लगे।
15 दिन के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश
इसके बाद 16 अक्टूबर को सामान्य प्रशासनिक विभाग ने आवास एवं शहरी विकास विभाग की आयुक्त-सचिव मंदीप कौर, आइएएस, को मामले की विस्तृत जांच का जिम्मा सौंपा। उन्हें 15 दिन के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। GAD के अतिरिक्त सचिव अमित वर्मानी, जेकेएएस, को प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त किया गया है।
जांच के दायरे में कथित दुर्व्यवहार से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों की पड़ताल की जानी है। हालांकि, जांच के आदेश को अपने आप में आरोपों की अंतिम पुष्टि या किसी अधिकारी को दोषी ठहराए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। रिपोर्ट के निष्कर्षों और उसके बाद की कार्रवाई का निर्धारण लागू नियमों के अनुसार ही होगा।
पुनर्गठन अधिनियम में क्या हैं उपराज्यपाल के अधिकार?
जम्मू-कश्मीर में प्रशासनिक शक्तियों के बंटवारे को समझने के लिए जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 53 और 55 महत्वपूर्ण हैं।
धारा 53(1) के तहत मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद उन विषयों पर उपराज्यपाल को सहायता और सलाह देती है, जिन पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि, अधिनियम में कुछ ऐसे विषय भी निर्धारित हैं, जिनमें उपराज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करने की शक्ति प्राप्त है।
धारा 53(2)(iii) में अखिल भारतीय सेवाओं और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से संबंधित मामलों को उपराज्यपाल की विवेकाधीन भूमिका के अंतर्गत स्पष्ट रूप से रखा गया है। आइएएस अधिकारी अखिल भारतीय सेवा के सदस्य होते हैं। इसलिए उनके सेवा नियंत्रण और अनुशासनात्मक मामलों में उपराज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, धारा 55 के तहत कार्य संचालन नियमों की व्यवस्था है, जिनके माध्यम से मंत्रियों के बीच सरकारी कामकाज का आवंटन और उपराज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद के बीच मतभेद की स्थिति में प्रक्रिया निर्धारित की जाती है।इस कानूनी व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि निर्वाचित सरकार की प्रशासनिक भूमिका पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
सरकार विभागीय कामकाज, तथ्यों के संकलन और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े कदम उठा सकती है, लेकिन जहां किसी मामले में विशेष सेवा नियमों या उपराज्यपाल के निर्धारित अधिकार क्षेत्र का प्रश्न आता है, वहां संबंधित प्रावधानों का पालन आवश्यक होगा।
जांच का आदेश और अनुशासनात्मक कार्रवाई अलग-अलग प्रश्न
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि किसी घटना की जांच कराने, संबंधित अधिकारियों से तथ्य जुटाने और अंतिम अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की शक्तियों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के अनुसार, जांच आदेश की वैधता का आकलन करने के लिए यह देखना होगा कि आदेश किस सक्षम प्राधिकारी ने जारी किया, उसके पीछे कौन-से नियम लागू होते हैं और जांच के लिए क्या अधिकार प्रदान किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि केवल इस आधार पर जांच को अवैध नहीं कहा जा सकता कि आरोपित अधिकारी आइएएस कैडर से संबंधित है और जांच अधिकारी भी आइएएस कैडर से है। इसी तरह, केवल जांच का आदेश जारी हो जाने से यह भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अंतिम अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार उसी प्राधिकारी के पास है।
मामले में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जांच अधिकारी को किन तथ्यों की पड़ताल करनी है, उसकी रिपोर्ट का स्वरूप क्या होगा और रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई कौन-सा सक्षम प्राधिकारी करेगा। यदि आदेश को अदालत में चुनौती दी जाती है तो उसकी वैधता संबंधित कानून, नियमों और आदेश जारी करने वाले प्राधिकारी के अधिकारों के आधार पर परखी जा सकती है।
मुख्यमंत्री की भूमिका और उसकी सीमाएं
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी आइएएस अधिकारियों पर नियंत्रण के मामले में अपनी सीमाओं का सार्वजनिक रूप से उल्लेख कर चुके हैं। उन्होंने इस प्रकरण को उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र से संबंधित बताया है। साथ ही, उन्होंने मुख्य सचिव को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि बीनिश वानी के खिलाफ किसी तरह की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई न हो।
यह रुख दो अलग-अलग पहलुओं को सामने लाता है। पहला, आइएएस अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई में लागू सेवा नियमों और उपराज्यपाल के अधिकारों का प्रश्न। दूसरा, एक निर्वाचित सरकार की यह जिम्मेदारी कि प्रशासनिक व्यवस्था में किसी अधिकारी के साथ कथित दुर्व्यवहार या प्रतिशोध की स्थिति पैदा न हो।
मुख्यमंत्री की ओर से मुख्य सचिव को दिए गए निर्देश प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के प्रयास के रूप में देखे जा सकते हैं। हालांकि, इन निर्देशों से आइएएस अधिकारी के विरुद्ध अंतिम अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार स्वतः मुख्यमंत्री को हस्तांतरित नहीं हो जाता।
इसी प्रकार, आइएएस अधिकारी से संबंधित मामला होने भर से घटना की तथ्यात्मक जांच और विभागीय स्तर पर आवश्यक कदम उठाने के हर पहलू को उपराज्यपाल का विशेषाधिकार नहीं माना जा सकता। इसका निर्धारण संबंधित नियमों के आधार पर होगा।
क्या जांच के दौरान अधिकारियों के पद बदले जा सकते हैं?
जांच के दौरान दोनों अधिकारियों को उनके मौजूदा पदों पर बनाए रखने को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के अनुसार, किसी अधिकारी का अपने पद पर बने रहना अपने आप में जांच की वैधता या निष्पक्षता को प्रभावित नहीं करता। लेकिन यदि यह आशंका हो कि संबंधित अधिकारी अपने पद के कारण गवाहों, दस्तावेजों या जांच की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, तो सक्षम प्राधिकारी परिस्थितियों के अनुसार प्रशासनिक कदमों पर विचार कर सकता है।
इन कदमों में जिम्मेदारियों का पुनर्विन्यास, दूसरे विभाग में तैनाती या अन्य उपयुक्त व्यवस्था शामिल हो सकती है। हालांकि, जांच के दौरान स्थानांतरण, अटैचमेंट या पद से हटाया जाना हर मामले में अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं है। ऐसा कोई भी निर्णय आरोपों की प्रकृति, लागू सेवा नियमों और सक्षम प्राधिकारी के आकलन के अनुरूप होना चाहिए।
एक अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि यह मामला वरिष्ठ अधिकारी और उनके अधीनस्थ कार्यरत अधिकारी के बीच हुए विवाद से संबंधित है। इसलिए जांच के दौरान गवाहों को बिना दबाव के बयान देने का अवसर मिलना चाहिए और सभी संबंधित दस्तावेजों तथा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी को स्थापित तथ्यों, लगाए गए आरोपों और संभावित अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में सिफारिशों के बीच स्पष्ट अंतर रखना होगा। जांच की निष्पक्षता के लिए दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। इसके बाद ही लागू सेवा नियमों के अनुरूप आगे की कार्रवाई की जानी चाहिए।
