डिग्री तो मिल रही, नौकरी का हिसाब नहीं; जम्मू-कश्मीर में 2 साल में 22.6% घटे ग्रैजुएट्स, अब आगे क्या?
जम्मू-कश्मीर में उच्च शिक्षा दोहरी चुनौती का सामना कर रही है, जहां पारंपरिक पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या घट रही ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर सरकार के पास रोजगार का पूरा डेटा नहीं। (फाइल फोटो)
HighLights
पारंपरिक पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज।
स्नातकों के रोजगार परिणामों का कोई व्यवस्थित डेटा उपलब्ध नहीं।
सरकार पाठ्यक्रमों के युक्तिकरण और रोजगार ट्रैकिंग पर केंद्रित।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में उच्च शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की सरकारी कवायद के बीच एक बड़ा सवाल सामने आया है। प्रदेश में जहां कई पारंपरिक पाठ्यक्रम विद्यार्थियों की घटती रुचि के कारण सिमट रहे हैं, वहीं इन पाठ्यक्रमों से निकलने वाले स्नातकों के रोजगार परिणामों का समेकित और नियमित रिकार्ड ही उपलब्ध नहीं है। यह तथ्य स्वयं प्रदेश सरकार स्वीकारती है।
सरकार कह रही है कि स्नातकों की रोजगार-क्षमता और रोजगार परिणामों की निगरानी के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार किया जा रहा है।उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार, सरकारी डिग्री कालेजों, विश्वविद्यालयों और क्लस्टर विश्वविद्यालयों से निकलने वाले स्नातकों की प्लेसमेंट दर, रोजगार क्षेत्र और औसत वेतन का कोई व्यापक डेटाबेस फिलहाल मौजूद नहीं है।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उपलब्ध आंकड़े उच्च शिक्षा की मांग में बदलाव की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। संबधित प्रशासनिक विभाग के अनुसार , 2023-24 में 23,655 दर्ज स्नातकों की संख्या 2025-26 में घटकर 18,312 रह गई। यानी दो वर्षों में करीब 22.6 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। कई कालेजों में कुछ पाठयक्रमों में छात्रों की संख्या शून्य तक पहुंच गई और उन पाठयक्रमों को अगले आदेश तक रोक दिया गया।
यह बदलाव केवल किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। जम्मू, श्रीनगर, बारामुला और उधमपुर समेत कई जिलों में स्नातकों की संख्या में कमी दर्ज की गई है।
जम्मू और श्रीनगर में भी गिरावट
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जम्मू जिले में स्नातकों की संख्या 5,930 से घटकर 3,906 रह गई। श्रीनगर में यह संख्या 4,190 से घटकर 3,352, बारामूला में 2,188 से 1,553 और उधमपुर में 1,716 से घटकर 895 हो गई।हालांकि पूरे प्रदेश में तस्वीर एक जैसी नहीं है। कठुआ में संख्या 121 से बढ़कर 1,001 और रामबन में 22 से बढ़कर 205 हुई।
डिग्री के बाद क्या हुआ, इसका हिसाब नहीं
अभी तक ऐसा कोई समान और व्यापक मूल्यांकन नहीं किया गया है, जिससे यह पता चल सके कि किसी खास पाठ्यक्रम से पढ़ाई पूरी करने वाले कितने विद्यार्थी रोजगार हासिल कर रहे हैं, उन्हें किस क्षेत्र में नौकरी मिल रही है और उनकी औसत आय कितनी है। सत्ताधारी नेशनल कान्फ्रेंस के विधायक अर्जुन सिंह राजू ने कहा कि जब डिग्री के बाद विद्यार्थियों के रोजगार परिणामों का व्यवस्थित रिकॉर्ड ही नहीं है, तो पाठ्यक्रमों की उपयोगिता और रोजगारपरकता को किस आधार पर मापा जा रहा है?
प्रो. दुष्यंत राय ने कहा कि आप कालेजों में उपलब्ध पाठयक्रमों के प्रदेश व्यापी गिरावट के रूप में न देखें। इस समस्या का समाधान आसान है,स्थानीय स्तर पर कालेजों कीउपलब्धता,विषयों की मांग, विद्यार्थियों की प्राथमिकताएं और रोजगार के अवसर जैसे कारकों का अलग-अलग अध्ययनकरें। बाजार में रोजगार की मांग को देखें और उसके आधार पर आगे बढ़ें।
कम मांग वाले पाठ्यक्रमों की होगी समीक्षा
उच्च शिक्षा मंत्री सकीना इट्ट के अनुसार, घटते नामांकन के बीच सरकार ने विषयों और पाठ्यक्रमों के रैशनलाइजेशन के लिए समिति गठित की है। समिति ने सरकारी डिग्री कालेजों में कार्यक्रमवार नामांकन की समीक्षा तथा ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के कम नामांकन वाले कालेजों के लिए क्लस्टर आधारित अकादमिक माडल पर विचार करने की सिफारिश की है।
सरकार बदलते रोजगार बाजार को देखते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और रिमोट सेंसिंग जैसे क्षेत्रों में नए पाठ्यक्रम विकसित करने की दिशा में भी कदम उठा रही है।
इसके साथ करियर काउंसलिंग, कौशल विकास, इंटर्नशिप, उद्योग-अकादमिक साझेदारी और प्लेसमेंट सहायता को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए श्रम एवं रोजगार विभाग के साथ साथ उद्योग एवं वाणिज्य विभाग और निजी क्षेत्र के साथ भी समन्वय किया जा रहा है।
चार वर्षीय डिग्री के बाद एक वर्षीय पीजी का प्रस्ताव
शिक्षा मंत्री ने बताया राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम यानी एफवाईयूपी के पात्र विद्यार्थियों के लिए आवश्यक अकादमिक और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध होने पर एक वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम शुरू करने की सिफारिश भी है।
अब असली परीक्षा डेटा की होगी
प्रो. दुष्यंत राय ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की उच्च शिक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि किन पाठ्यक्रमों में विद्यार्थी कम हो रहे हैं। इससे बड़ा सवाल यह है कि जो विद्यार्थी डिग्री हासिल कर रहे हैं, उनकी आगे की राह क्या है?
प्रवेश से लेकर स्नातक होने और उसके बाद रोजगार तक विद्यार्थियों की यात्रा का विश्वसनीय ट्रैकिंग सिस्टम नहीं होगा, तो यह मापना कठिन रहेगा कि पाठ्यक्रमों में किए जा रहे बदलाव वास्तव में कितना असर डाल रहे हैं, राेजगार मिल रहा है या नहीं।क्योंकि सिर्फ यह जानना पर्याप्त नहीं कि कितने विद्यार्थी डिग्री लेकर निकले; यह जानना भी जरूरी है कि डिग्री के बाद वे कहां पहुंचे। उन्हें रोजगार मिला है, वह स्वरोजगार की तरफ बढ़े हैं या फिर बेरोजगारों की लाइन में लगे हैं।
