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'जमीन के बदले नौकरी का वादा नहीं चलेगा', जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की दो टूक; कहा- सरकारी पद किसी सौदे का हिस्सा नहीं

Published: Thu, 08 Oct 2026 06:46 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि जमीन दान करने के बदले सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती, क्योंकि सरकारी ...और पढ़ें

हाईकोर्ट ने कहा- सरकारी पद बिक्री के लिए नहीं। (फाइल फोटो)

हाईकोर्ट ने कहा- सरकारी पद बिक्री के लिए नहीं। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. सरकारी पद जमीन दान के बदले नहीं दिए जा सकते।

  2. नौकरियां केवल निष्पक्ष भर्ती नियमों के तहत ही मिलेंगी।

  3. 10 साल सेवा वाले पात्र कैजुअल कर्मचारी नियमित होंगे।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जमीन दान करने के बदले सरकारी नौकरी का वादा अब नियुक्ति का आधार नहीं बन सकता। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार जमीन दान करने के बदले किसी व्यक्ति को स्थायी सरकारी नौकरी देने का वादा या नियुक्ति नहीं कर सकती। सरकारी पद किसी सौदे का हिस्सा नहीं हो सकता।

जस्टिस संजय कुमार और एमए चौधरी की पीठ ने कहा कि स्थायी सरकारी नौकरी केवल लागू भर्ती नियमों के तहत और ऐसी निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के जरिए दी जा सकती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप हो।

अदालत ने चेतावनी दी कि जमीन के बदले सरकारी नौकरी देने का वादा करना सरकारी नौकरियों को बिक्री के लिए रखने जैसा होगा और यह संविधान के शासन और कानून के राज के खिलाफ है।

2014 में दी जमीन, बदले में मिली कैजुअल नौकरी

मामला वर्ष 2014 का है। संबंधित लोगों ने ट्यूबवेल निर्माण के लिए सरकार को एक-एक कनाल जमीन दान की थी। गिफ्ट डीड में जमीन के बदले सरकारी नौकरी देने की शर्त भी दर्ज थी। लेकिन स्थायी सरकारी नियुक्ति के बजाय उन्हें सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग में कैजुअल मजदूरों के रूप में लगाया गया।

करीब पांच साल बाद, 2019 में उन्होंने नियमितीकरण की मांग को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के बाद मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट), जम्मू पीठ के पास चला गया। कैट ने उनकी लंबे समय की सेवा और जमीन दान करने की परिस्थितियों को देखते हुए उपलब्ध पदों के खिलाफ नियमितीकरण का निर्देश दिया था।

पहले मनमानी भर्ती, फिर नियमितीकरण नहीं चलेगा

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि सरकार बिना विज्ञापन और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के अपनी पसंद के लोगों को दैनिक वेतनभोगी, कैजुअल, एडहॉक या समेकित कर्मचारी के रूप में नियुक्त नहीं कर सकती और बाद में किसी नियमितीकरण नीति के जरिए उन्हें स्थायी रोजगार नहीं दे सकती।

पीठ ने ऐसी प्रक्रिया को संविधान के साथ धोखाधड़ी करार दिया। यानी पहले नियमों को दरकिनार कर नियुक्ति करना और फिर उसी नियुक्ति को स्थायी करने के लिए नीति बनाना संवैधानिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है।

फिर भी कर्मचारियों को मिली राहत

इस फैसले के बावजूद अदालत ने कर्मचारियों को पूरी तरह राहत से वंचित नहीं किया। 21 दिसंबर 2017 को अधिसूचित जम्मू-कश्मीर के नियमितीकरण नियमों में पात्र कैजुअल कर्मचारियों के मामलों पर निर्धारित शर्तों के तहत नियमित नियुक्ति का प्रावधान है। इसमें जमीन दान करने वाले और उसके बाद कैजुअल कर्मचारी के रूप में लगाए गए लोग भी शामिल हैं।

अदालत ने पाया कि संबंधित कर्मचारी 10 वर्ष से अधिक की लगातार सेवा पूरी कर चुके हैं। इसलिए जो कर्मचारी 2017 के नियमों की सभी निर्धारित शर्तें पूरी करते हैं, वे नियमितीकरण के लाभ के हकदार होंगे।

पात्रता जांचे बिना नियमित नियुक्ति का आदेश देना गलत

हाईकोर्ट ने कैट के आदेश को पूरी तरह खारिज नहीं किया, बल्कि उसमें संशोधन किया। अदालत ने कहा कि कैट ने 2017 के नियमों का सही संदर्भ लिया था, लेकिन अपने अंतिम निर्देश में पात्रता की निर्धारित शर्तों की जांच किए बिना सीधे नियमित नियुक्ति का आदेश देना उचित नहीं था।

अब सरकार को निर्देश दिया गया है कि 10 वर्ष की लगातार सेवा पूरी कर चुके पात्र कर्मचारियों के मामलों पर तुरंत और बिना देरी के विचार किया जाए। उन्हें नियमों के तहत 10 वर्ष की सेवा पूरी होने की तारीख से नियमितीकरण का लाभ और उससे जुड़े सभी संबंधित लाभ दिए जाएंगे।