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11 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता का होगा गर्भपात, मेडिकल बोर्ड की निगरानी में होगी MTP; जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने दी अनुमति

Published: Wed, 23 Sep 2026 06:34 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने यौन हमले की शिकार 11 वर्षीय गर्भवती बच्ची को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) की अनुमति दे ...और पढ़ें

यौन उत्पीड़न पीड़ित 11 वर्षीय बच्ची को गर्भपात की अनुमति। (फाइल फोटो)

यौन उत्पीड़न पीड़ित 11 वर्षीय बच्ची को गर्भपात की अनुमति (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने 11 वर्षीय यौन उत्पीड़न पीड़ित बच्ची को गर्भपात की अनुमति दी।

  2. मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने तत्काल प्रक्रिया के निर्देश दिए।

  3. बच्ची की पहचान गोपनीय रखने और सभी खर्च वहन करने का आदेश।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने यौन हमले के आरोप के बाद गर्भवती हुई 11 वर्षीय बच्ची के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) की अनुमति दे दी है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को बिना अनावश्यक देरी के प्रक्रिया की व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला 22 सितंबर को न्यायमूर्ति वसीम सादिक नारगल ने बच्ची के पिता की ओर से दायर याचिका पर सुनाया।

मामला तब अदालत पहुंचा जब नाबालिग के गर्भ की मेडिकल जांच और आगे की प्रक्रिया को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी। अदालत के निर्देश पर गठित मेडिकल बोर्ड ने बच्ची की विस्तृत जांच की। 11 सितंबर को बोर्ड ने बताया था कि गर्भावस्था करीब 22 सप्ताह और पांच दिन की है और बच्ची मेडिकल टर्मिनेशन के लिए शारीरिक तथा मानसिक रूप से उपयुक्त है।

गर्भावस्था 24 सप्ताह से आगे बढ़ी

सुनवाई आगे बढ़ने के दौरान गर्भावस्था की अवधि बढ़कर करीब 24 सप्ताह और दो दिन हो गई। यानी यह अवधि एमटीपी नियम, 2003 के नियम 3-बी में निर्धारित 24 सप्ताह की सीमा से आगे निकल गई थी। इस नियम में नाबालिगों और यौन हमले या बलात्कार से बचे लोगों सहित कुछ श्रेणियों के मामलों में 24 सप्ताह तक गर्भसमापन की अनुमति से संबंधित प्रावधान हैं।

हाईकोर्ट ने परिस्थितियों को केवल निर्धारित समय-सीमा के आधार पर देखने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में देरी मेडिकल जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान हुई। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवांछित गर्भावस्था से जुड़े मामलों में दिए गए संवैधानिक उपायों के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा।

अदालत ने बच्ची की कम उम्र, गर्भावस्था की परिस्थितियों, उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति तथा मेडिकल बोर्ड की राय को महत्वपूर्ण माना। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि नाबालिग को गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

जीएमसी बारामूला में होगी प्रक्रिया

हाईकोर्ट ने एसोसिएट अस्पताल, सरकारी मेडिकल कॉलेज बारामूला के प्रिंसिपल-मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को जल्द से जल्द आवश्यक व्यवस्था करने को कहा है। बच्ची को प्रक्रिया से पहले और बाद में मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग और जरूरी सहयोग भी दिया जाएगा। मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत उसकी मां या कानूनी अभिभावक को उसके साथ रहने की अनुमति होगी।

मामले में कथित आरोपी अभी तक पकड़ा नहीं गया है। ऐसे में अदालत ने जांच एजेंसी की जरूरत को देखते हुए, जहां चिकित्सकीय और कानूनी रूप से संभव हो, भ्रूण के ऊतक या अन्य संबंधित सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं, ताकि डीएनए प्रोफाइलिंग और अन्य फोरेंसिक जांच की जा सके।

बच्ची की पहचान गुप्त रखने का आदेश

कोर्ट ने बच्ची की पहचान को लेकर भी सख्त निर्देश दिए हैं। उसके नाम, मेडिकल रिकॉर्ड और ऐसी किसी भी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा जिससे उसकी पहचान उजागर हो सकती है। इलाज, गर्भसमापन और प्रक्रिया के बाद की देखभाल का खर्च संबंधित अधिकारियों द्वारा कानून और मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वहन किया जाएगा।

यदि विशेषज्ञ डॉक्टर बच्ची की सुरक्षा के लिए किसी अन्य चिकित्सा केंद्र में इलाज जरूरी समझते हैं, तो प्रशासन को बिना किसी नए कोर्ट आदेश के तत्काल रेफरल और परिवहन की व्यवस्था करनी होगी।

अदालत ने अपने सभी निर्देशों को तत्काल लागू करने को कहा है। हालांकि पूरी प्रक्रिया मेडिकल आकलन और विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए सुरक्षा उपायों के अधीन रहेगी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए मामले का निपटारा कर दिया।