जम्मू-कश्मीर के हर 100 रुपये में 65 केंद्र से, अपनी कमाई सिर्फ 35%; वेतन, पेंशन और ब्याज पर 52,743 करोड़ खर्च
जम्मू-कश्मीर का बजट 1.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, जिसमें 65% राजस्व केंद्र सरकार से आता है, जबकि अपना ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर का बजट ₹1.14 लाख करोड़ पार, पर कमाई का बड़ा हिस्सा केंद्र से। (फाइल फोटो)
HighLights
जम्मू-कश्मीर के कुल राजस्व का 65% केंद्र से आता है।
वेतन, पेंशन, ब्याज पर 52,743 करोड़ रुपये का बड़ा खर्च।
राजस्व बढ़ाने, खर्च प्रबंधन की चुनौती, विकास पर जोर।
नवीन नवाज, जागरण। जम्मू-कश्मीर का बजट 1.14 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है, लेकिन अपने संसाधनों से होने वाली कमाई और सरकारी खर्च के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। वित्त वर्ष 2026–27 के बजट अनुमानों के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेश को अपने कर और गैर-कर स्रोतों से 31,800 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जबकि केंद्र से 58,218 करोड़ रुपये का अनुदान मिलने का अनुमान है। यानी कुल राजस्व प्राप्तियों में करीब 65 प्रतिशत हिस्सा केंद्रीय अनुदान का होगा। यह स्थिति प्रदेश की वित्तीय जरूरतों और अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करने की चुनौती को सामने लाती है।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के बजट विश्लेषण के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की कुल राजस्व प्राप्तियां 90,018 करोड़ रुपये अनुमानित हैं। इनमें 20,700 करोड़ रुपये करों और 11,100 करोड़ रुपये गैर-कर स्रोतों से जुटाए जाने हैं। इस तरह अपने संसाधनों का योगदान करीब 35 प्रतिशत है।
हालांकि, केंद्रीय सहायता पर निर्भरता को अपने आप में वित्तीय कमजोरी नहीं कहा जा सकता। अहम सवाल यह है कि उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल विकास और सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने में कितना प्रभावी ढंग से हो रहा है।
1.14 लाख करोड़ से अधिक खर्च का अनुमान
वित्त वर्ष 2026–27 में कुल बजटीय व्यय 1,13,767 करोड़ रुपये रखा गया है। इसमें 80,640 करोड़ रुपये राजस्व व्यय और 33,127 करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित हैं। ऋण चुकौती को छोड़कर शुद्ध व्यय 1,05,958 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। वहीं, ऋण चुकौती के लिए 7,809 करोड़ रुपये रखे गए हैं।
वेतन-पेंशन और ब्याज पर जाएगा 52,743 करोड़
बजट में सरकारी कर्मचारियों के वेतन पर 24,683 करोड़ रुपये, पेंशन पर 15,777 करोड़ रुपये और ब्याज भुगतान पर 12,283 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इन तीनों मदों का कुल खर्च 52,743 करोड़ रुपये बैठता है, जो अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का करीब 59 प्रतिशत है।
इन प्रतिबद्ध खर्चों के बाद अन्य सरकारी सेवाओं और योजनाओं के लिए संसाधनों का बेहतर प्रबंधन जरूरी हो जाता है। हालांकि, पूंजीगत व्यय के लिए अलग बजटीय प्रावधान होने के कारण इस राशि को विकास कार्यों के लिए उपलब्ध कुल धन का पूरा हिसाब नहीं माना जा सकता।
राजस्व अधिशेष, फिर भी राजकोषीय घाटा
बजट में 9,378 करोड़ रुपये का राजस्व अधिशेष और 14,685 करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा अनुमानित है। राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
राजस्व अधिशेष का अर्थ है कि राजस्व प्राप्तियां राजस्व व्यय से अधिक हैं, जबकि राजकोषीय घाटे में पूंजीगत खर्च समेत सरकार के कुल व्यय और प्राप्तियों का अंतर शामिल होता है। इसलिए दोनों आंकड़े अलग-अलग वित्तीय पहलुओं को दर्शाते हैं।
बिजली खरीद पर भी दबाव
बिजली से गैर-कर राजस्व के रूप में 7,100 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है, जबकि बिजली खरीद पर 9,300 करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है। दोनों के बीच 2,200 करोड़ रुपये का अंतर है। हालांकि, इसे बिजली क्षेत्र का कुल घाटा नहीं माना जा सकता, क्योंकि सब्सिडी, अन्य प्राप्तियां और वितरण लागत भी वित्तीय गणना को प्रभावित करती हैं।
बिजली बिलों की वसूली, वितरण व्यवस्था में सुधार और तकनीकी नुकसान घटाने से इस क्षेत्र पर वित्तीय दबाव कम किया जा सकता है।
हालिया शोध और सीएजी की रिपोर्ट में भी राजस्व बढ़ाने पर जोर
जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर हाल में प्रकाशित अध्ययन जम्मू-कश्मीर आर्थिक एवं विकास परिदृश्य: विकास की गति, राजकोषीय समेकन और मौसमी पर्यटन प्रदर्शन (जून-अगस्त 2026) में भी राजस्व संग्रह और लगातार बने हुए खर्च के दायित्वों को वित्तीय लचीलेपन के लिए चुनौती बताया गया है। अध्ययन में अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करने और खर्च की प्राथमिकताओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया गया है।
वहीं, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की वित्त वर्ष 2024–25 की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की राजस्व प्राप्तियों में 6.12 प्रतिशत की वृद्धि मुख्य रूप से केंद्रीय अनुदान बढ़ने से हुई, जबकि अपने कर राजस्व में वृद्धि 2.5 प्रतिशत रही। इससे स्पष्ट होता है कि कुल राजस्व बढ़ने के बावजूद अपने स्रोतों से आय बढ़ाना अलग चुनौती है।
पर्यटन, बागवानी और कारोबार से बढ़ सकती है कमाई
प्रदेश में पर्यटन, बागवानी, हस्तशिल्प और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देकर स्थानीय आर्थिक गतिविधियां बढ़ाई जा सकती हैं। वस्तु एवं सेवा कर के अनुपालन में सुधार, कारोबारों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने और बिजली बिलों की वसूली बेहतर करने से भी राजस्व बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
जम्मू-कश्मीर के सामने चुनौती केवल अधिक कमाई करने की नहीं, बल्कि प्रतिबद्ध खर्च का बेहतर प्रबंधन करने और केंद्रीय सहायता को टिकाऊ विकास में बदलने की भी है।
परियोजनाओं को समय पर पूरा करना और सार्वजनिक धन से रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों में वास्तविक वृद्धि सुनिश्चित करना दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगा
