क्या है ग्रेटर ऑटोनॉमी? 2000 के प्रस्ताव पर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में क्यों मचा हंगामा, यहां समझिए पूरा गणित
CM उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में स्टेटहुड और बृहत्तर स्वायत्तता बहाली का प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में वर्ष ...और पढ़ें
HighLights
उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में स्टेटहुड और स्वायत्तता प्रस्ताव पेश किया।
भाजपा विधायकों ने वर्ष 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव पर विरोध जताया।
हंगामे के कारण विधानसभा की कार्यवाही सोमवार तक स्थगित कर दी गई।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू कश्मीर की विधानसभा में शुक्रवार को जो हुआ, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। विधानसभा में बिना किसी पूर्व सूचना के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के लिए स्टेटहुड की बहाली का प्रस्ताव रखा, जिसे स्पीकर ने भाजपा सदस्यों के प्रतिरोध और नारेबाजी के बीच चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया। लेकिन यह सिर्फ यहीं तक नहीं है, बीते 26 वर्ष में यह पहला अवसर है जब नेशनल कान्फ्रेंस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने अधिकारिक तौर पर जम्मू कश्मीर के लिए ग्रेटर आटाेनामी-बृहत्तर स्वायतत्ता की बहाली की मांग की है जो जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली, अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 की पुनर्बहाली से, पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग से कहीं आगे है।
भाजपा विधायक ने जैसे ही इसमें 26 जून 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव के उल्लेख को देखा, भड़क उठे। देखते ही देखते सदन नारेबाजी, हंगामे और तीखी नोकझोंक का अखाड़ा बन गया। भाजपा सदस्य वेल में पहुंच गए और प्रस्ताव की प्रतियां फाड़ दीं।
उत्तेजित भाजपा विधायक विक्रम रंधावा ने स्पीकर के आसन के सामने वैल में बैठे विधानसभा कर्मी की एक कुर्सी भी उठा ली। इस पर स्पीकर ने उन्हें मार्शलों के जरिए सदन से बाहर कर दिया। हालात नहीं संभले तो स्पीकर ने पहले सदन को 11.45 बजे आधे घंटे और बाद सवा एक बजे में सोमवार तक के लिए स्थगित कर दिया।

2000 के ऑटोनॉमी प्रस्ताव का फिर आया जिक्र
दिलचस्प यह है कि 26 साल बाद पहली बार नेशनल कान्फ्रेंस के नेतृत्व वाली सरकार ने आधिकारिक तौर पर जम्मू-कश्मीर के लिए बृहत्तर स्वायत्तता (ग्रेटर आटोनामी) की मांग को अपने विधानसभा प्रस्ताव में फिर जगह दी है। यह मांग केवल पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली तक सीमित नहीं है, बल्कि 2000 के उस प्रस्ताव से जुड़ती है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के लिए 9 अगस्त 1953 से पहले की संवैधानिक स्थिति के अनुरूप अधिक स्वायत्तता की मांग की गई थी।
तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार ने 26 जून 2000 को यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर केंद्र को भेजा था, जिसे तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने स्वीकार नहीं किया था।
स्टेटहुड पर उमर ने याद दिलाया मोदी का वादा
उमर अब्दुल्ला ने अपने प्रस्ताव में कहा कि 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को पारित प्रस्तावों के अतिरिक्त सदन भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा 'तत्काल और अविलंब' बहाल करने का आह्वान करता है और यह प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाए।
उमर ने कहा कि स्टेटहुड की बहाली बेहद जरूरी है और इससे वंचित रहने का नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने तीन स्तरीय प्रक्रिया की बात कही थी परिसीमन, चुनाव और फिर राज्य का दर्जा। परिसीमन हो चुका, चुनाव भी हो गए और लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, लेकिन राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा अभी पूरा नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कथन का भी सदन में उल्लेख किया, जो उन्होंने कटरा में राज्य के दर्जे की बहाली का मुद्दा उठाए जाने पर कहा था यह कोई आम वादा नहीं है, यह मोदी का वादा है। पूरा किया जाएगा।
उमर ने कहा कि अब भारत सरकार को उसका वादा याद दिलाने की जरूरत है। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष द्वारा आए दिन स्टेटहुड को लेकर दिए जाने वाले बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर सदन में ही चर्चा कर ली जाए।
‘आधा-अधूरा राज्य नहीं चाहिए’
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर को “आधा-अधूरा राज्य” नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरे राज्य का वादा किया गया था और पूरा राज्य ही वापस चाहिए।
उमर ने राज्य का दर्जा न होने से पैदा हो रही प्रशासनिक दिक्कतों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि बिजली विभाग उनके पास है, लेकिन पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की फाइलें सरकार के पास नहीं आतीं। इसी तरह सकीमस और एस्म और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों का बजट सरकार देती है, लेकिन उसके इस्तेमाल से संबंधित फाइलें सरकार के पास नहीं आतीं।
उनका सवाल था कि यदि निर्वाचित सरकार के पास सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को छोड़कर बाकी अधिकार होने की बात कही जाती है, तो फिर ऊर्जा और ऐसे महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय का अधिकार उसके पास क्यों नहीं है।
‘ग्रेटर आटोनामी’ के उल्लेख पर भाजपा का हंगामा
जैसे ही उमर ने प्रस्ताव पढ़ना शुरू किया और वर्ष 2000 के प्रस्ताव का उल्लेख आया, भाजपा विधायक अपनी सीटों पर खड़े हो गए। उन्होंने सवाल उठाया कि पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली से जुड़े प्रस्ताव में 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव को शामिल करने की जरूरत क्या है। भाजपा विधायक पवन गुप्ता ने कहा कि यहां आटोनामी की बात क्यों, वह प्रस्ताव उस समय का है जब जम्मू कश्मीर एक पूर्ण राज्य था और आज एक यूनियन टेरिटेरी है।
राजीव जसरोटिया ने स्पीकर से कहा कि पहले स्पष्ट करें कि यह क्यों है, आरएस पठानिया ने कहा कि पार्टी सदन में स्वायत्तता के मुद्दे को उठाने का विरोध करेगी। भाजपा सदस्यों ने प्रस्ताव को असंवैधानिक बताते हुए विरोध किया और बाद में वेल में पहुंच गए। हंगामे के दौरान प्रस्ताव की प्रतियां भी फाड़ी गईं।
बलवंत सिंह मनकोटिया विरोध जताते हुए मेज पर चढ़ गए। भाजपा सदस्य मार्शलों के प्रतिरोध के बीच वैल में पहुंच गए। इसी दौरान कांग्रेस के दो विधायकों ने भी वैल में दाखिल होने का प्रयास कियाञ। निर्दलीय विधायक शब्बीर कूले और भाजपा विधायक अरविंद गुप्ता के बीच हाथापाई की नौबत भी पहुंच गई,लेकिन मार्शलों ने दोनों को अलग कर दिया। सदन में सिर्फ कोलाहल और अराजकता का माहौल था।

सदन में गूंजे नारे
भाजपा सदस्यों ने 'भारत माता की जय', 'जहां हुआ बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है' और 'जो कश्मीर हमारा है, वो सारा का सारा है' अली बाबा के 39 चोर, कौन गया-कौन गया-सीएम गया, राष्टविरोधी एजेंडा नहीं चलेगा, देश के टुकड़े नहीं होने देंगे, जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर हमारा है, जैसे नारे लगाए।
इसके जवाब में नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस सदस्यों की ओर से 'छीन के लेंगे अपना हक', 'जिस कश्मीर को खून से सींचा, वो कश्मीर हमारा है', 'बहाल करो, बहाल करो, स्टेटहुड बहाल करो', 'हमारी रियासत, हमारा हक' और 'गली-गली में शोर है, बीजेपी वाले चोर हैं' जैसे नारे लगाए गए। सत्ता पक्ष की ओर से 'वोट चोर' और 'चंदा चोर' के नारे भी सुनाई दिए।
विधानसभा की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित
स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने बार-बार सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटने और सदन की कार्यवाही चलने देने की अपील की, लेकिन दोनों पक्षों के सदस्य पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। हंगामा बढ़ता गया और सदन की कार्यवाही पहले आधे घंटे के लिए स्थगित करनी पड़ी। दोबारा कार्यवाही 12.20 बजे शुरु हुई और भाजपा विधायकों ने दोबारा नारेबाजी शुरु कर दी।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी सीट पर बैठ यह सब देख रहे थे। जैसे ही वह सदन से उठकर जाने लगे, भाजपा वालों ने नारा लगाया कौन गया-कौन गया, सीएम सीएम गया, कौन भागा-सीएम भागा। इस बीच, भाजपा विधायक विक्रम रंधावा एक विधानसभाकर्मी की कुर्सी उठाते हुए देखे गए। स्पीकर ने इस पर उन्हें मार्शलों के जरिए सदन से बाहर कर दिया। इसी शोर शराबे में स्पीकर ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की कार्यवाही पूरी की, लेकिन स्थिति को सुधरते न देख उन्होंने विधानसभा की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी।
क्या है ग्रेटर ऑटोनामी?
बृहत्तर स्वायत्तता (ग्रेटर ऑटोनामी) का मतलब मुख्य रूप से 1953 से पहले जम्मू-कश्मीर को मिली विशेष संवैधानिक व्यवस्था को फिर से लागू करने की मांग से है। उस समय राज्य के प्रमुख को 'सदर-ए-रियासत' कहा जाता था, जिन्हें विधानसभा के निर्वाचित सदस्य चुनते थे। वहीं, निर्वाचित सरकार के मुखिया को ‘प्रधानमंत्री’ कहा जाता था।
1953 से पहले कैसा था जम्मू-कश्मीर का सिस्टम?
जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान और ध्वज था तथा भारत सरकार का अधिकार मुख्यतः रक्षा, विदेश मामले और संचार तक सीमित था। प्रारंभिक दौर में सर्वोच्च न्यायालय और भारत निर्वाचन आयोग का अधिकार क्षेत्र भी जम्मू-कश्मीर में सीमित था। 30 मार्च 1965 को सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री के पद समाप्त कर क्रमशः राज्यपाल और मुख्यमंत्री के पद लागू किए गए। वहीं, 14 मई 1954 के संविधान (जम्मू-कश्मीर पर लागू) आदेश के माध्यम से भारत के सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग से संबंधित संवैधानिक प्रावधान लागू किए गए।
वाजपेयी सरकार ने ठुकराया
26 जून 2000 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने बृहत्तर स्वायत्तता बहाल करने का प्रस्ताव पारित किया। उस समय विधानसभा के भाजपा के आठ विधायकों ने भी प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। प्रस्ताव को विधान परिषद ने भी मंजूरी दी, लेकिन जुलाई 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया
