5 चेहरे बदल देंगे जम्मू-कश्मीर का पूरा खेल, LG के हाथ में चाबी; 48 के बहुमत पर क्यों टिकी नजर?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा का शरदकालीन सत्र 21 सितंबर से शुरू होगा, जिसमें पांच मनोनीत सीटों और उनके मतदान अधिकारों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव की संभावना है।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा का शरदकालीन सत्र 21 सितंबर से शुरू हो रहा ।(फाइल फोटो)
HighLights
विधानसभा सत्र 21 सितंबर से, मनोनीत सीटों पर विवाद।
पांच मनोनीत सदस्यों से बदल सकता है सत्ता का गणित।
उपराज्यपाल के मनोनयन अधिकार पर सरकार-विपक्ष आमने-सामने।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा का शरदकालीन सत्र 21 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। विधानसभा चुनाव के बाद निर्वाचित सरकार के गठन को करीब दो वर्ष होने के बावजूद सदन की पांच मनोनीत सीटें अब तक रिक्त हैं। विधानसभा उपाध्यक्ष का पद भी खाली है। ऐसे में आगामी सत्र में विधायी कामकाज के साथ-साथ मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति, उनके मतदान अधिकार और सदन के बदलते संख्याबल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव के आसार हैं।
मनोनीत सदस्यों को निर्वाचित विधायकों के समान मतदान अधिकार हासिल हैं। इसलिए पांच सदस्यों की नियुक्ति केवल रिक्त सीटें भरने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इससे विधानसभा के प्रभावी संख्याबल और बहुमत के आंकड़े पर सीधा असर पड़ सकता है। यही कारण है कि मनोनयन का अधिकार जम्मू-कश्मीर की मौजूदा राजनीति में महत्वपूर्ण संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
95 तक पहुंच सकता है विधानसभा का प्रभावी संख्याबल
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत विधानसभा में कुछ वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान है। धारा 15 के तहत महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने की स्थिति में दो महिलाओं को मनोनीत किया जा सकता है। इसके अलावा विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं और गुलाम जम्मू-कश्मीर से आए लोगों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था भी है।
2024 में संसद द्वारा किए गए संशोधन के बाद इन वर्गों के सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान प्रभावी हुआ। गुलाम जम्मू-कश्मीर के लिए आरक्षित 24 सीटों को अलग रखते हुए विधानसभा का प्रभावी संख्याबल 95 तक पहुंच सकता है। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा 46 से बढ़कर 48 हो जाएगा।
41 विधायकों के साथ नेशनल कान्फ्रेंस सबसे बड़ा दल
मौजूदा 90 सदस्यीय विधानसभा में नेशनल कान्फ्रेंस के 41 विधायक हैं। भाजपा के नौ, कांग्रेस के छह, पीडीपी के चार, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कान्फ्रेंस, आम आदमी पार्टी और माकपा के एक-एक विधायक हैं। सात निर्दलीय विधायक भी सदन में हैं।
नेशनल कान्फ्रेंस के नेतृत्व वाले गठबंधन में कांग्रेस और माकपा शामिल हैं। इसके अलावा पांच निर्दलीय विधायकों के समर्थन का भी सरकार को दावा है। ऐसे में पांच मनोनीत सदस्यों के आने के बाद सदन का संख्याबल बदलना राजनीतिक रूप से अहम होगा।
मनोनयन का अधिकार उपराज्यपाल के पास
पुनर्गठन अधिनियम के तहत मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार उपराज्यपाल के पास है और इसके लिए निर्वाचित सरकार से परामर्श अनिवार्य नहीं है। नेशनल कान्फ्रेंस चाहती है कि मनोनयन की प्रक्रिया में निर्वाचित सरकार की भूमिका सुनिश्चित हो।
वहीं भाजपा इस मुद्दे को संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक परंपरा से जोड़कर सरकार को घेरने की तैयारी में है। कांग्रेस भी सत्र के दौरान इस मुद्दे को उठाने की तैयारी में है।
25 सितंबर को हाईकोर्ट में सुनवाई
कांग्रेस के पूर्व विधान परिषद सदस्य रविंदर शर्मा ने मनोनीत सदस्यों से जुड़े प्रावधान की संवैधानिक वैधता को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि मतदान अधिकार वाले सदस्यों के मनोनयन से विधानसभा का संख्याबल बदला जा सकता है और इसका निर्वाचित सरकार के बहुमत पर असर पड़ सकता है।मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को है। यानी विधानसभा सत्र शुरू होने के चार दिन बाद ही इस संवेदनशील मुद्दे पर अदालत में सुनवाई होगी।
पुडुचेरी की नजीर भी चर्चा में
मनोनीत सदस्यों के अधिकारों को लेकर पुडुचेरी की व्यवस्था का हवाला दिया जा रहा है। वहां उपराज्यपाल को विधानसभा में तीन सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है। इस व्यवस्था को लेकर मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था। अदालत ने राज्य सरकार से परामर्श किए बिना मनोनयन को अवैध नहीं माना था। हालांकि जम्मू-कश्मीर में लागू प्रावधान को लेकर संवैधानिक विवाद अभी कायम है।
उपाध्यक्ष पद भी खाली
विधानसभा उपाध्यक्ष का पद भी लंबे समय से रिक्त है। भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि उपाध्यक्ष का पद हमारे दल को मिलना चाहिए,लेकिन नेशनल कान्फ्रेंस हमेशा लोकतांत्रिक परम्पराओं के खिलाफ जाने में विश्वास रखती है। भाजपा ने आगामी सत्र में इस मुद्दे को उठाने का संकेत देते हुए कहा कि मनोनयन के कोटो से विधायकों और उपाध्यक्ष की नियुक्ति पर बात जरुरी है।।
नेशनल कान्फ्रेंस के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक ने भाजपा के सवालों पर पलटवार करते हुए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में उपाध्यक्ष के रिक्त पदों का हवाला दिया है।
ऐसे में 21 सितंबर से शुरू होने वाला सत्र जम्मू-कश्मीर में सरकार और विपक्ष के बीच सिर्फ राजनीतिक बहस का मंच नहीं, बल्कि मनोनीत सदस्यों, संवैधानिक अधिकारों और विधानसभा के बदलते शक्ति-संतुलन की निर्णायक बहस का केंद्र बन सकता है।
