जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बदली पुरानी परंपरा, सदन में इस बार दिखा कुछ अलग; जानें क्या हुआ बदलाव
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दशकों पुरानी एक संसदीय परंपरा में बदलाव किया गया, जहां पूर्व विधायकों को श्रद्धांजलि के बाद सदन ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में श्रद्धांजलि के तुरंत बाद शुरू हुआ सरकारी कामकाज।
HighLights
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दशकों पुरानी परंपरा में बदलाव।
पूर्व विधायकों को श्रद्धांजलि के तुरंत बाद सरकारी कामकाज शुरू।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सुझाव पर यह प्रक्रिया अपनाई गई।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के मौजूदा सत्र में सोमवार को वर्षों पुरानी एक संसदीय परंपरा में बदलाव देखने को मिला। सदन में पूर्व विधायकों को श्रद्धांजलि देने के बाद विधानसभा की कार्यवाही स्थगित करने के बजाय तुरंत सरकारी कामकाज शुरू कर दिया गया। स्पीकर अब्दुल रहीम राथर ने पूर्व विधानसभा सदस्यों शेख मुस्तफा कमाल, धर्म पाल और गुलाम हसन के निधन का शोक संदर्भ पढ़ा और इसके बाद सदन में विधायी कार्यवाही आगे बढ़ी।
शोक संदर्भ के दौरान स्पीकर ने दिवंगत पूर्व विधायकों के नाम और उनके योगदान का उल्लेख किया। हालांकि, इस दौरान किसी अन्य सदस्य ने अलग से श्रद्धांजलि भाषण नहीं दिया। इसके बाद सदन के सदस्यों ने दिवंगत नेताओं के सम्मान में दो मिनट का मौन रखा।
क्या है जम्मू-कश्मीर विधानसभा की परंपरा?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में अब तक चली आ रही परंपरा के अनुसार, जब किसी पूर्व विधायक या सदस्य के निधन पर शोक संदर्भ रखा जाता था तो स्पीकर के वक्तव्य के बाद विभिन्न दलों के सदस्य भी श्रद्धांजलि देते थे। इसके बाद सदन की कार्यवाही आम तौर पर पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी जाती थी और उस दिन कोई अन्य सरकारी या विधायी कामकाज नहीं होता था।
इस बार इस प्रक्रिया में बदलाव ने विधानसभा की कार्यवाही को लेकर नई तस्वीर पेश की है। शोक संदर्भ और मौन के बाद सदन ने नियमित सरकारी कामकाज जारी रखा।
पिछली शरदकालीन बैठक में उठा था मुद्दा
इस प्रक्रिया में बदलाव की चर्चा पिछली शरदकालीन विधानसभा बैठक के दौरान भी हुई थी। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन में सुझाव दिया था कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी ऐसी व्यवस्था अपनाई जा सकती है, जिसमें शोक संदर्भ केवल स्पीकर पढ़ें और इसके बाद सदस्य मौन रखकर दिवंगत सदस्यों को श्रद्धांजलि दें।
उमर अब्दुल्ला ने संसद में अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा था कि पहले शोक संदर्भ के दौरान लंबे भाषण होते थे और पूरा दिन इसमें निकल जाता था। बाद में प्रक्रिया में बदलाव करते हुए स्पीकर द्वारा संदर्भ पढ़े जाने और सदस्यों द्वारा मौन रखने की व्यवस्था अपनाई गई।
सोमवार की कार्यवाही में इसी तरह की व्यवस्था दिखाई दी। इससे साफ है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में शोक संदर्भ की परंपरा को बनाए रखते हुए उसके बाद सदन का समय विधायी और सरकारी कामकाज के लिए इस्तेमाल करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।
