गुज्जर-बक्करवाल बच्चों को कैसे मिले पोषण? प्रवास के दौरान जम्मू-कश्मीर में 3 आंगनवाड़ी केंद्र; अलग नीति भी नहीं
जम्मू-कश्मीर में गुज्जर-बक्करवाल बच्चों के लिए आंगनवाड़ी सेवाओं की कमी एक बड़ी चुनौती है। 28 हजार से अधिक आंगनवाड़ी केंद्र ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर में खानाबदोश बच्चों के लिए आज भी कोई स्थायी नीति नहीं। (फाइल फोटो)
HighLights
गुज्जर-बक्करवाल बच्चों के पोषण, शिक्षा पर सवाल।
28 हजार आंगनवाड़ी, पर स्थायी नीति नहीं।
मौसमी प्रवास से सेवाएं बाधित, चुनौती बरकरार।
राहुल शर्मा, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के मैदानी इलाकों में जब गर्मियां दस्तक देती हैं तो गुज्जर-बक्करवाल परिवार अपने मवेशियों के साथ हरे चरागाहों की तलाश में कश्मीर की ऊंची पहाड़ियों की ओर निकल पड़ते हैं। अनंतनाग, गांदरबल और कुलगाम के दूरदराज इलाकों में बसे ढोक इन परिवारों के लिए छह महीने का ठिकाना बन जाते हैं। इस सफर में भेड़-बकरियों और दूसरे मवेशियों के लिए चरागाह तो तलाश लिए जाते हैं, लेकिन छोटे बच्चों के पोषण, टीकाकरण और शुरुआती शिक्षा की व्यवस्था पीछे छूटती नजर आती है।
सबसे बड़ा सवाल उन बच्चों को लेकर है, जिनकी उम्र तीन से छह साल के बीच है। यह वह दौर है, जब बच्चे के पोषण, स्वास्थ्य और सीखने की बुनियाद तैयार होती है।
मैदानी इलाकों में आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों को पूरक पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ाव और स्कूल-पूर्व शिक्षा उपलब्ध कराने का माध्यम हैं, लेकिन पहाड़ों के दूरस्थ ढोकों में रहने वाले बच्चों के लिए यही सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध हैं या नहीं, इस पर सवाल बने हुए हैं।
सरकार ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि ढोकों और मौसमी बस्तियों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र स्थापित करने की कोई अलग नीति या विशेष व्यवस्था निर्धारित नहीं है। यही वह अंतर है, जिसे दूर किए बिना खानाबदोश बच्चों तक सेवाओं की नियमित पहुंच सुनिश्चित करना चुनौती बना रहेगा। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर गुज्जर-बक्करवालों की आबादी 12 लाख से अधिक है। जिनमें इनमें लगभग 30,000 परिवार जम्मू संभाग से कश्मीर की ओर जाते हैं।
28 हजार केंद्र, प्रवास के लिए सिर्फ तीन
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में कुल 28199 आंगनवाड़ी केंद्र कार्यरत हैं। इनमें 1029 केंद्र आदिवासी ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित हैं। लेकिन इन केंद्रों की कुल संख्या प्रवास करने वाले परिवारों के बच्चों तक सेवाओं की नियमित पहुंच की गारंटी नहीं देती।
मौजूदा व्यवस्था में आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना मुख्य रूप से आबादी के आधार पर होती है। मैदानी और शहरी इलाकों में 400 से 800 की आबादी पर एक केंद्र, जबकि आदिवासी, पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में 300 से 800 की आबादी पर एक केंद्र का प्रावधान है, लेकिन खानाबदोश परिवारों की जरूरतें केवल किसी एक स्थान की स्थायी आबादी से तय नहीं होतीं।
उनका जीवन मौसमी प्रवास से जुड़ा है। गर्मियों में परिवार ऊंचे चरागाहों की ओर जाते हैं और मौसम बदलने पर वापस निचले इलाकों में लौटते हैं। ऐसे में किसी गांव में स्थायी रूप से संचालित आंगनवाड़ी केंद्र का होना जरूरी नहीं कि उसके लाभार्थी बच्चों को प्रवास के दौरान भी सेवाएं मिलती रहें।
यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है। जम्मू जिले के तीन आंगनवाड़ी केंद्र प्रवास के दौरान कश्मीर के अनंतनाग और गांदरबल में सेवाएं देते हैं। मगर हजारों परिवारों के मौसमी आवागमन के बीच केवल तीन केंद्रों का शिफ्ट होना यह सवाल खड़ा करता है कि बाकी बच्चों तक पोषण, टीकाकरण और स्कूल-पूर्व शिक्षा किस हद तक पहुंच पाती है।
पुंछ में 439 आदिवासी केंद्र, कई पहाड़ी जिलों में संख्या शून्य
जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, जम्मू में सबसे अधिक 2643 आंगनवाड़ी केंद्र हैं। बारामूला में 2407, कुपवाड़ा में 2320 और अनंतनाग में 2210 केंद्र कार्यरत हैं। आदिवासी ग्रामीण केंद्रों की संख्या पुंछ में 439, राजौरी में 318 और बांडीपोरा में 170, अनंतनाग में 13, कुपवाड़ा में 43, रामबन में 23 जबकि रियासी में 13 है।
वहीं, डोडा, गांदरबल, किश्तवाड़ और रामबन जैसे पहाड़ी जिलों में आदिवासी ग्रामीण केंद्रों की संख्या शून्य दर्ज की गई है। इसका अर्थ यह नहीं कि इन जिलों में कोई आंगनवाड़ी केंद्र नहीं है, बल्कि संबंधित श्रेणी में केंद्र दर्ज नहीं हैं। स्कूलों और आंगनवाड़ियों की भूमिका अलग-अलग है।
मौसमी स्कूल बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में मदद करते हैं, जबकि आंगनवाड़ी केंद्रों का दायरा पोषण, शुरुआती बाल देखभाल, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ाव और स्कूल-पूर्व शिक्षा तक फैला है। इसलिए मौसमी स्कूलों की मौजूदगी अपने आप में आंगनवाड़ी सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करती।
आंगनवाड़ी सेवाओं की निरंतरता पर सवाल
प्रवासी बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए मौसमी स्कूलों की व्यवस्था भी है। शिक्षा विभाग की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार, उस वर्ष गुज्जर-बकरवाल समुदाय के 30142 बच्चों को 1417 मौसमी केंद्रों के माध्यम से शिक्षा दी गई थी। हालांकि, स्कूलों की व्यवस्था आंगनवाड़ी सेवाओं का विकल्प नहीं है।
तीन से छह वर्ष के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी पोषण, शुरुआती देखभाल और स्कूल-पूर्व शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। दूरदराज ढोकों में सेवाओं की उपलब्धता और विभागों के बीच तालमेल कितना प्रभावी है, यह अब भी अहम सवाल है।
नए केंद्रों के लिए मंजूरी का इंतजार
राज्य मंत्री सकीना इट्टू ने बताया कि मिशन सक्षम और पोषण 2.0 के दिशा-निर्देशों के तहत आदिवासी क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हैं। केंद्र सरकार से नए केंद्रों की मंजूरी मिलने पर चिन्हित पात्र क्षेत्रों में नए केंद्र खोलने के प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे।
प्रवासी बच्चों की शिक्षा के सवाल पर सरकार ने कहा कि स्कूल शिक्षा विभाग के साथ समन्वय कर रहा है, ताकि बच्चों को मौजूदा स्कूली व्यवस्था के तहत कवर किया जा सके। सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है कि प्रवासी गुज्जर-बक्करवाल परिवारों के बच्चे शुरुआती देखभाल और शिक्षा से वंचित न रहें।
