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जम्मू-कश्मीर में पढ़ी-लिखी महिलाएं रोजगार को तरस रहीं, खून की कमी ने बढ़ाई टेंशन, रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

Published: Wed, 14 Oct 2026 04:56 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर में महिला सशक्तिकरण की तस्वीर विरोधाभासी है, शिक्षा में प्रगति के बावजूद रोजगार और स्वास्थ्य में गंभीर चुनौतियां हैं। ...और पढ़ें

जम्मू-कश्मीर की महिलाएं शिक्षा में आगे, लेकिन रोजगार में चुनौतियां। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर की महिलाएं शिक्षा में आगे, लेकिन रोजगार में चुनौतियां। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. शिक्षा में प्रगति के बावजूद महिलाओं को रोजगार संकट।

  2. जम्मू-कश्मीर में महिलाओं में एनीमिया का स्तर बढ़ा।

  3. कौशल विकास और महिला उद्यमिता पर जोर आवश्यक।

नवीन नवाज, जम्मू। जम्मू-कश्मीर में महिला सशक्तिकरण की तस्वीर विरोधाभासों से भरी है। एक ओर महिलाएं उच्च शिक्षा, उद्यमिता और सामाजिक भागीदारी में आगे बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षित महिलाओं के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। इसके साथ महिलाओं में एनीमिया का बढ़ता स्तर स्वास्थ्य और पोषण संबंधी चुनौतियों को भी उजागर करता है।

राजीव गांधी इंस्टीट्यूट आफ कंटेम्परेरी स्टडीज के अध्ययन 'हरा भरा स्वराज: जम्मू-कश्मीर के लिए नई दृष्टि और उसे साकार करने की नई रणनीति' में पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के विश्लेषण के आधार पर विकास की चुनौतियों को रेखांकित किया गया है।

अध्ययन के अनुसार, महिलाओं की प्रगति का आकलन केवल शिक्षा में उनकी भागीदारी से नहीं, बल्कि रोजगार, स्वास्थ्य, पोषण और निर्णय लेने की स्वतंत्रता से भी किया जाना चाहिए।

शिक्षित महिलाओं के सामने रोजगार का संकट

श्रम बल सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की शहरी महिलाओं की बेरोजगारी दर 27.2 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों में यह 4.8 प्रतिशत थी। 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में शहरी महिलाओं की बेरोजगारी दर 28.6 प्रतिशत और पुरुषों की 5.2 प्रतिशत दर्ज की गई।

सबसे चिंताजनक स्थिति माध्यमिक या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त शहरी महिलाओं की है। इस वर्ग में बेरोजगारी दर 41.1 प्रतिशत रही, जबकि पुरुषों में यह केवल 7.1 प्रतिशत थी। ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा हासिल करने के बाद भी महिलाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल पा रहा है।

रिपोर्ट में इस चुनौती से निपटने के लिए कौशल प्रशिक्षण, निजी क्षेत्र में रोजगार, सुरक्षित कार्यस्थलों और महिलाओं की शिक्षा को बाजार की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया गया है।

ऊंची श्रम भागीदारी, लेकिन नियमित रोजगार कम

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 52.1 प्रतिशत थी, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 41.7 प्रतिशत रही।हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की बड़ी संख्या स्वरोजगार से जुड़ी है।

सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण महिला कामगारों में 93.6 प्रतिशत स्वरोजगार करती थीं, जबकि केवल 6.4 प्रतिशत नियमित वेतनभोगी रोजगार में थीं। कृषि और पारिवारिक कामों में योगदान देने वाली महिलाओं की आर्थिक भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे हमेशा स्थिर आय और वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होती।

महिला उद्यमिता और स्वयं सहायता समूहों से उम्मीद

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक महिला उद्यमिता रोजगार की चुनौती से निपटने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग में पंजीकृत 333 स्टार्टअप का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं।

वर्ष 2020 के बाद जम्मू-कश्मीर में पंजीकृत स्टार्टअप की संख्या में 287 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।ग्रामीण क्षेत्रों में ‘उम्मीद’ योजना के तहत लगभग 7.84 लाख परिवार 96 हजार स्वयं सहायता समूहों से जुड़े हैं। वर्ष 2013-14 से अब तक 67 हजार से अधिक समूहों को 2,912.66 करोड़ रुपये का बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया है।

इन पहलों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए महिलाओं को वित्तीय सहायता, बाजार तक पहुंच, तकनीकी प्रशिक्षण और उत्पादों की बिक्री के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने होंगे। कृषि, बागवानी, हस्तशिल्प, पर्यटन और खाद्य प्रसंस्करण में महिला उद्यमों को बढ़ावा देने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है।

एनीमिया के बढ़ते आंकड़े चिंता का विषय

महिला सशक्तिकरण की दूसरी बड़ी चुनौती स्वास्थ्य और पोषण है। अध्ययन में उद्धृत राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे और पांचवें चरण के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की महिलाओं में एनीमिया का स्तर लगभग 49 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गया। पुरुषों में भी यह लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर 37 प्रतिशत दर्ज किया गया।

ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा और सामाजिक विकास में प्रगति के बावजूद पोषण संबंधी समस्याएं गंभीर बनी हुई हैं। एनीमिया महिलाओं की कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने के लिए परिवहन की कमी, आर्थिक सीमाएं और सामाजिक बाधाएं भी समय पर उपचार में मुश्किल पैदा कर सकती हैं।

सामाजिक भागीदारी और सुरक्षा भी जरूरी

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू हिंसा, कम उम्र में विवाह, दहेज संबंधी विवाद और महिलाओं की आवाजाही पर पाबंदियां भी उनकी प्रगति को प्रभावित कर सकती हैं। महिला सहायता केंद्रों और सुरक्षा सेवाओं की पहुंच जिला तथा ब्लॉक स्तर पर मजबूत करने की जरूरत है।

पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी से स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार संबंधी योजनाओं को बेहतर बनाया जा सकता है।