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पहाड़ों में जमा पानी बन सकता है तबाही का सैलाब, जम्मू-कश्मीर में 68 ग्लेशियल झीलें खतरनाक; सरकार ने बढ़ाई निगरानी

Published: Tue, 29 Sep 2026 11:14 AM (IST)

जम्मू-कश्मीर में तापमान वृद्धि और ग्लेशियरों के पिघलने से हिमनद झील फटने (GLOF) का खतरा बढ़ गया है, जहाँ 68 ग्लेशियल झीलें संभावित रूप से खतरनाक चिन्हित की गई हैं।

जम्मू-कश्मीर में 68 ग्लेशियल झीलें खतरनाक (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर में 68 ग्लेशियल झीलें खतरनाक (फाइल फोटो)


HighLights

  1. जम्मू-कश्मीर में 68 ग्लेशियल झीलें खतरनाक चिन्हित

  2. GLOF खतरे के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित

  3. स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारियों और जागरूकता पर जोर

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की ऊंची पहाड़ियों और बर्फीले इलाकों में मौजूद ग्लेशियल झीलें अब सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती का हिस्सा नहीं, बल्कि संभावित आपदा का कारण भी बन सकती हैं।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने विधानसभा में बताया है कि तापमान बढ़ने, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लेशियल झीलों के विस्तार के कारण हिमनद झील के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) का खतरा बढ़ रहा है।

सरकार ने किश्तवाड़, गांदरबल, कुलगाम और अनंतनाग समेत कई इलाकों को जीएलओएफ जोखिम वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया है।
जादिबल के विधायक तनवीर सादिक के विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब सरकार ने यह जानकारी दी।

सरकार के मुताबिक कश्मीर यूनिवर्सिटी ने जम्मू-कश्मीर के 12 जिलों में 616 ग्लेशियल झीलों की पहचान की है। इन झीलों का कुल क्षेत्रफल 28.62 वर्ग किलोमीटर बताया गया है। इनमें से 68 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक हिमनद झीलें (पीडीजीएल) के तौर पर चिन्हित किया गया है। इनकी पहचान (एनडीएमए) के निर्धारित मानकों के आधार पर की गई है।

24 झीलें बनीं हाई-प्रायोरिटी

सरकार ने बताया कि 17 अलग-अलग जोखिम मानकों के आधार पर हाई-रिस्क ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया गया है। इसके लिए सितंबर 2024 में एक विशेष कोर कमेटी बनाई गई, जिसने 24 हाई-प्रायोरिटी झीलों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा है। गंगाबल, कोसरनाग, हरनाग, मुंडिकसर, हंगू झील, बाउंड सर और शेषनाग जैसी झीलों पर विशेष निगरानी की जरूरत बताई गई है।

इसके अलावा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) ने भी 546 ग्लेशियल झीलों की मैपिंग की है। यानी खतरे को समझने और संभावित प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए अलग-अलग संस्थाएं मिलकर काम कर रही हैं।

संभावित खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी देने के लिए सरकार ने सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट ऑफ़ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डीएसी) को जीआइएस आधारित स्वदेशी जीएलओएफ पूर्व चेतावनी प्रणाली तैयार करने की जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया शुरू की है। प्रस्तावित सिस्टम में पानी के स्तर की निगरानी करने वाले सेंसर, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, कैमरा आधारित विजन यूनिट और रियल-टाइम अलर्ट के लिए वेब पोर्टल शामिल होंगे।

गांवों और संवेदनशील इलाकों पर भी फोकस

सरकार ने बताया कि जिला स्तर पर खतरे, संवेदनशीलता और जोखिम का आकलन (एचवीआरए) कराने और जीएलओएफ जोखिम कम करने के लिए एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। संवेदनशील गांवों, बस्तियों और महत्वपूर्ण ढांचों की पहचान के साथ सुरक्षित निकासी स्थलों की मैपिंग भी की जा रही है।

वहीं आइटीबीपी और सशस्त्र बल की उन चौकियों के साथ भी समन्वय शुरू किया गया है जो हाई-रिस्क झीलों के आसपास स्थित हैं, ताकि आपात स्थिति में मैनुअल अर्ली-वार्निंग नेटवर्क के जरिए नीचे बसे इलाकों तक सूचना पहुंचाई जा सके। प्रशासन की तैयारी केवल तकनीक तक सीमित नहीं है। डीडीएमए, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ को नियमित मॉक ड्रिल कराने, आपदा मित्रा स्वयंसेवकों और स्थानीय समुदायों को शामिल करने तथा लोगों को निकासी प्रक्रिया की जानकारी देने के निर्देश दिए गए हैं।

एनडीएमए की स्थानीय भाषाओं में जागरूकता सामग्री और ग्रामीण विकास विभाग के अभियानों के जरिए पंचायतों और प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को भी जीएलओएफ से बचाव के उपायों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी, समय पर चेतावनी और स्थानीय स्तर पर तैयारियां किसी भी संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।