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कश्मीर की गुरेज घाटी में फिर लौटेंगी पारंपरिक फसलें, किसानों की कमाई बढ़ाने पर भी फोकस; वैज्ञानिकों ने कसी कमर

Published: Mon, 26 Oct 2026 02:39 PM (IST)

कृषि वैज्ञानिक कश्मीर की गुरेज घाटी में पारंपरिक खेती, खासकर मोटे अनाज को बढ़ावा दे रहे हैं। इसका उद्देश्य किसानों ...और पढ़ें

गुरेज घाटी में लौटेगा पारंपरिक खेती और मोटे अनाज का दौर।

गुरेज घाटी में लौटेगा पारंपरिक खेती और मोटे अनाज का दौर।

HighLights

  1. गुरेज घाटी में पारंपरिक खेती और मोटे अनाज को बढ़ावा।

  2. किसानों को वैज्ञानिक खेती, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ना।

  3. जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसलों पर विशेष जोर।

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। देश में जब मोटे अनाज (मिलेट्स) को पोषण सुरक्षा और टिकाऊ खेती के विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, तब कश्मीर संभाग की दुर्गम गुरेज घाटी से भी इस दिशा में नई पहल सामने आई है। यहां पारंपरिक फसलों की खेती को दोबारा मजबूत बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कमर कसी है। मकसद सिर्फ खेतों में उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि पहाड़ों के किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाना और स्थानीय कृषि को बदलते मौसम के अनुरूप मजबूत बनाना भी है।

शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कश्मीर के कृषि संकाय, वाडूरा और कृषि विज्ञान केंद्र, गुरेज ने खेती को पुनर्जीवित करने के लिए किसानों को प्रशिक्षित करना भी शुरू कर दिया है। इसमें किसानों को वैज्ञानिक खेती, प्रसंस्करण, उत्पाद विकास, पैकेजिंग, लेबलिंग और बाजार में अपनी उपज बेचने के बेहतर तरीकों की जानकारी दी जा रही है। 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, गुरेज की कुल लगभग 732.54 हेक्टेयर कृषि भूमि में आलू खेती का क्षेत्र 243.64 हेक्टेयर, राजमा का 169.86 हेक्टेयर जबकि गेहूं का 164.73 हेक्टेयर है। इसमें पारंपरिक खेती मात्र 3 प्रतिशत हिस्से में ही की जा रही है। यही वजह है कि स्कास्ट-के अब इस ओर ध्यान दे रहा है।

मौसम की चुनौती के बीच मोटे अनाज से उम्मीद

गुरेज में खेती करना आसान नहीं है। ऊंचे पहाड़, कड़ाके की सर्दी और सीमित कृषि मौसम किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी करते हैं। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसलों की पहचान और उनका वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन महत्वपूर्ण हो जाता है।

स्कास्ट-के के मुख्य वैज्ञानिक प्रो. लाल सिंह ने बताया कि इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मोटे अनाज इसमें बाजरा, ज्वार, रागी आदि शामिल हैं, कि बदलते जलवायु के बीच उपयोगिता और गुरेज की कृषि-जलवायु परिस्थितियों में उनकी संभावनाओं पर जोर दिया। मोटे अनाज की कई किस्में कम संसाधनों में उगाई जा सकती हैं और पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।

हालांकि, गुरेज में किस प्रजाति की खेती कितने क्षेत्र में सफल होगी, इसका आकलन स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर ही किया जा रहा है।

सिर्फ अनाज नहीं, किसानों की कमाई बढ़ाने का रास्ता

पारंपरिक फसल उगाने के बाद किसान को उसका उचित बाजार न मिले, तो खेती आर्थिक रूप से आकर्षक नहीं रह जाती। इसी चुनौती को देखते हुए गुरेज में इसके प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, किसानों को कच्चा अनाज बेचने तक सीमित रहने के बजाय उससे तैयार उत्पादों की संभावनाएं भी तलाशनी चाहिए। उचित सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के जरिए स्थानीय उपज को अधिक व्यापक बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए बाजार से सीधा जुड़ाव और सामूहिक विपणन भी जरूरी होगा।

स्कास्ट-के वैज्ञानिकों ने बताया कि वर्ष 2027-28 की कार्ययोजना में भी विरासत वाली फसलों के पुनरुद्धार और प्रोत्साहन के लिए इस तरह के कई प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। किसानों को वाडूरा स्थित कृषि संकाय का भ्रमण कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है ताकि वे नई तकनीकों को समझ सकें।